“कोलकाता की आधी रात और ऑनलाइन बुकिंग से मिली तीन सीखें!”…

“कोलकाता की आधी रात और ऑनलाइन बुकिंग से मिली तीन सीखें!”…

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  • “कोलकाता की आधी रात और ऑनलाइन बुकिंग से मिली तीन सीखें!”…

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कलकत्ता ने
सिखाई ३ नई बातें !
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व्यवसायिक काम से दिल्ली और फिर दिल्ली से कोलकाता जाने का कारण बना। दिल्ली से कोलकाता फ्लाइट से जाना था। दिल्ली से रात ९.०० को उड़ी फ्लाइट कोलकत्ता कुछ रात को १२.३० को पहुँची ।एग्जिट गेट तक आते आते रात के १.०० बज गए थे। दिन बदल चुका था मोबाइल पर २५ तारीख़ आ गई थी।

दो दिन रहना था तो दो दिन की होटल पहले से ही बुक कर रखी थी।
पर आज क्या करे ? रात के १.०० बजे हैं ।पहले सोचा था लेट पहुँचेंगे तो एयर पोर्ट पर ही कुछ जुगाड़ करेंगे या एयरपोर्ट पर भी आजकल रेस्ट हाउस बने होते हैं तो सोचा था वहाँ रुक लेंगे ।

एग्जिट के पहले लॉबी में बैठ कर सोचने लगा .. क्या किया जाए? फिर सोचा चलो कोई पास की साधारण होटल बुक कर लेते हैं। आराम से सो तो जाएँगे। ऑनलाइन सर्चिंग शुरू किया, agoda साईट उपर आई hotel near airport ढूँढना शुरू किया। Date में २५ तारीख़ ही आई थी। मैंने फिरसे डेट मोबाईल पर चेक कर ली। २५ ही थी । एक होटल बुक की जो airport से १.५ km की दूरी पर थी। ऑनलाइन पेमेंट भी कर दिया।

चलो होटल बुकिंग हो गया थोड़ा रिलैक्स हो गया, फिर बाहर आकर टैक्सी की पूछताछ की । उबर का काउंटर था ..uber ऐप में एड्रेस डाला, वही सस्ता वाला uber go सिलेक्ट किया ।१५-२० मिनिट हो गए पर कोई cab वाला ट्रिप एक्सेप्ट ही नहीं कर रहा था । फिर से काउंटर पर गया उसने uber prime को सेलेक्ट किया। फिरसे १० मिनिट हो गए कोई ट्रिप एक्सेप्ट नहीं कर रहा था। अंतर कम जो था। फिर क्या सोचा थोडासा तो अंतर है, पैदल चले चलते हैं। वैसे ५-६ km तो हम आसानी से चलते ही हैं । एक सिक्योरिटी ऑफिसर को पूछा तो कहने लगा इतनी रात को क्या अकेले जाओगे ?

फिरभी हिम्मत जुटाई और चल
पड़ा अकेले । रास्ते में एक टैक्सी वाला मिला ही गया उसने पूछा कहाँ जाओगे ? मैंने होटल का नाम बताया उसने कहा बैठो ४०० ₹ लगेंगे । मरता क्या नहीं करता , बैठ गया गाड़ी में । उसी नाम की होटल में उतरा पर होटल दूसरी दिख रही थी । फ़ोन लगा कर पूछा तो मालूम पड़ा यह उसी नाम की दूसरी होटल है ।
ड्राइवर से बात करवाई । फिर बुकिंग वाली असली होटल में पहुँचे। वहाँ जाने के उसने फिर पैसे माँगे । जैसे तैसे १०० ₹ देकर मामला सुलझाया ।

रात के दो बज गए थे ।गेट पर टक टक किया, होटल का दरवाजा खुला। रिसेप्शनिस्ट पूछने लगा “कौनसा रूम चाहिए? “ मैंने कहा “मैंने ऑनलाइन बुक किया है।” उसने कंप्यूटर में चेक किया। “आनंद हो ना ?, पर ये बुकिंग तो कल की है, आज की नहीं।” मैंने कहा “आज की ही तो बुक की २५ तारीख़ की .. आज २५ तारीख़ तो है” उसने कहा “बराबर है पर यह रूम आपको सुबह १२ बजे मिलेगा अभी रात को २ बजे नहीं।” मैंने सर पटक लिया। मैंने उसे समझाया “अरे भाई मुझे २५ तारीख़ दिखी मैंने बुक किया, आप एडजस्ट कर दो, तुम रजिस्टर में कल का दिखा देना और मैं कल सुबह ११ बजे निकल जाऊँगा , प्लीज़ देखो कुछ कर सकते हो क्या?” उसने कहा “आपको फिरसे रूम बुक करना पड़ेगा।” मैंने कहा “ मैंने १२००/- का पेमेंट कर दिया है।”उसने कहा @अब नए रूम के आपको १५००/- देने होंगे, यही हमारा रेट है।” मैंने कहा “ऑनलाइन में कम और तुम ज़्यादा माँग रहे हो”। उसने साफ़ कह दिया “आपको रूम लेना हो तो लो नहीं तो दूसरी होटल देखो, हाँ यदि आपने पेमेंट किया नहीं होता तो आपके पैसे
बच जाते।” फिर क्या झक मारकर पैसे दिए और नया रूम बुक किया और रूम में जाकर सोया।

दूसरे दिन मैंने chatt gpt पर सर्च किया लेट नाईट में ऑनलाइन रूम कैसे बुक करते हैं । उसमें दिखा की अलग अलग बुकिंग पोर्टल पर अलग अलग टर्म यूज़ होती है । book now, last minute deal ऐसी कोई टर्म होती है जिसे सर्च करके रूम बुक करना होता है। ऑनलाइन में हम जो भी तारीख बुक करते हैं उस तारीख को सुबह के चेक इन के समय ही उसमें जा सकते हैं , रात के या कहो सुबह के २.०० बजे नहीं ।
चलो कुछ तो सीखने को तो मिला ।

क्रमशः भाग २
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है ना लाइफ इस ऑलवेज teaching
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आनंद मल्हारा
जलगांव २/३/२५
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“डिजी यात्रा: तकनीक की सरलता और मन की पहेली”

  • कोलकाता एयरपोर्ट पर
    ही सीखा “डिजी यात्रा” को यूज़ करना और किसी के मन को न पढ़ पाना ।
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    अंतिम भाग २

कुछ दिन पहले घरमें तन्वी बता रही थी “प्रथम और मैं “डिजी यात्रा” ऐप के ज़रिए एयरपोर्ट पर बोर्डिंग पास, आधार कार्ड बताए बगैर चेक इन करते हैं”

इस बार मैंने भी सोचा चलो हम भी “डिजी यात्रा” कर कर देखते हैं । कलकत्ता में टाइम था तो ऐप डाउन लोड किया, उसमें आवश्यक जानकारी भरी, अपने चेहरे को स्कैन भी कर दिया। कलकत्ता से मुंबई का टिकट था तो पहले होटल में ही वेब चेक कर लिया और बोर्डिंग पास को डिजी यात्रा में अपलोड कर दिया। एयरपोर्ट पहुँचा । वहाँ देखा एक गेट की लाइन में बिल्कुल रश नहीं था तो मालूम पड़ा वो लाइन “डिजी यात्रा” वालों के लिए ही थी। हिम्मत जुटा कर मैं भी उस लाइन में खड़ा हो गया । एंट्री पर रखे स्कैनिंग मशीन पर डिजी यात्रा का QR code स्कैन किया, सामने कैमरा लगा था जो अपना चेहरा स्कैन कर रहा था, ४-६ सेकंड में ही चेहरा मैच हो गया और गेट के बार्स साइड में हो गए और मैं अंदर चला गया। मज़ा आ गया।

जब भी हम कुछ नया एक्सपेरिमेंट या कोशिश करते हैं और उसमें कामयाब होते हैं तो ख़ुशी तो होती ही है । अंदर सिक्योरिटी चेक की जगह भी डिजी यात्रा के लिए अलग लाइन थी ।

यह एक अच्छा ऐप है अगर आपने उसे डाउन लोड नहीं किया हो तो जरूर करें । “डिजी लॉकर” और “डिजी यात्रा” दोनों जरूरी शासन मान्य ऐप हैं ।

वैसे कोलकाता से मेरा संबंध काफ़ी पुराना है । आजके क़रीब २० वर्ष पहले हमने वहाँ हमारी ऐड एजेंसी के लिए “वांटेड क्रिएटिव आर्टिस्ट” का विज्ञापन दिया था कारण वेस्ट बंगाल क्रिएटिव टैलेंट के लिए जाना माना है । तब हमने कोलकाता जाकर दो टैलेंटेड आर्टिस्ट “सैकत” और “पीयूष”को जलगांव लाया था। तब कोलकाता से महाराष्ट्र में सैलरी स्केल और अपोर्च्युनिटी दोनों ज़्यादा थी। दोनों करीब दो साल तक जलगांव रहे और फिर एक मुंबई में आर्ट डायरेक्टर और एक कोलकाता में बतौर आर्ट डायरेक्टर बन शिफ्ट हो गए। उसके बाद भी हमने “कॉपी राइटर” के लिए वहां विज्ञापन दिया था। उस वक़्त कैंडिडेट्स को हमने जलगांव इंटरव्यू के लिए बुलाया था। इन्हीं कारण कुछ अच्छे कैंडिडेट्स से परिचय हो गया था और वे संपर्क में भी रहे।

अब जब मैं कोलकाता में ही था तो एक सहयोगी से मिलने की सोची, उसे फ़ोन किया, कहा “मैं तुम्हारे शहर में आया हूँ क्यों ना मिला जाए।” उसने उसका सुविधाजनक टाइम बताया पर तब मैंने “शांति निकेतन” जाना पसंद किया, कारण शांति निकेतन देखना मेरे लिए एक पुराना सपना था। मैंने शाम को मिलने की इच्छा रखी पर उसने उसके लिए असमर्थता जताई। मैंने कहा “कोशिश करना बहुत दिन हो गए मिले । पर उसका आना हुआ नहीं और हमारा मिलना बाक़ी ही रह गया । दूसरे दिन सुबह मैं मुंबई के लिए निकल गया।

आप सोचेंगे इसमें ऐसा विशेष क्या हुआ?
पर मेरे लिए वो एक बड़ा लेसन रहा। मुझे लगा था मेरे कोलकाता आने से वो ख़ुश होगा, वो ज़रूर मिलने आयेगा।पर असल में ख़ुशी तो क्या मिलना ही नहीं हुआ। क्या कारण रहा होगा अंत तक समज नहीं पाया । हो सकता है इसमें अहंकार का विषय आ गया हो। मैं चाहता था वो मेरे समय से मुझे मिले और शायद वो उसके समय पर। या और कुछ कारण रहा होगा मालूम नहीं। शायद वो किसी परेशानी में हो , या उसकी कोई मजबूरी रही हो ? भगवान जाने ।

मैंने रियलाइज किया, किसीके बारे में हम जो सोचते हैं, या हम जो चाहते हैं , उसके लिए जो कोशिश, मेहनत करते हैं जरूरी नहीं की वह सामने वाले को भी सही लगे या पर्याप्त लगे। सामने वाले का नजरिया पूरा अलग हो सकता है। उसकी सोच पूरी अलग हो सकती है। उसका रिएक्शन पूरा अलग हो सकता है। किसी के मन को पढ़ना या जानना आसान ही नहीं शायद ना मुमकिन है ।

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है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल येट मिस्टीरियस!

आनंद मल्हारा
जलगाँव, ८/३/२५
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