“रायपुर” का यादगार  शोक मिलन !

“रायपुर” का यादगार शोक मिलन !

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“रायपुर” का यादगार शोक मिलन !

  • भाग

जीवन में दूसरी बार किसीका शोक निवारण करने जा सद्भाग्य मिला था। शहर था “रायपुर”, यह शोक मिलन एक याद बन गई।

तन्वी के रायपुर निवासी नाना ससुरजी श्रीमान पृथ्वीराजजी तालेडा के देहांत की खबर मिलती है, उम्र ८५ के करीब थी। शादी के बाद तन्वी अपनी व्यस्तता के कारण रायपुर जा नहीं पायी थी तो हमने सोचा ऐसे वक्त हमें जरूर जाना चाहिए। “कब आए?” पूछने पर अहमदाबाद निवासी समधीजी ने हमें शोक मिलन के दिन आने को कहा।

कार्यक्रम सुबह १०.३० को था। ट्रेन, टिकट की पूछताछ की, एक ट्रेन सुबह ८.३० के क़रीब और दूसरी रात ११.०० बजे रायपुर पहुँचने वाली थी। फिर सोचा इतनी दूर जा रहे हैं , सुबह की सुविधा जनक ट्रेन यदि लेट पहुँची तो ? कार्यक्रम मिस हो गया तो? अंत में रात को पहुँचने वाली ट्रेन फाइनल करते हैं और टिकट बुक कर लेते हैं। रिटर्न का टिकट भी सहज एक दिन बाद का करवा लिया ताकि भाग दौड़ ना हो, एक दिन आराम भी हो जाए। रायपुर वैसे भी पहली बार जा रहे थे। आज तक रायपुर का नाम मैंने अनेकों बार विवाह पत्रिकाओं में प्रिंट किया था, रायपुर की काफ़ी बेटियाँ जलगांव ब्याही गई थी ।लगता था जलगांव और रायपुर की कुंडली सचमुच मिली हुई है।

तन्वी से बात होती है, सोचते हैं एक नहीं, दो रात रुकना है, कहाँ रुकेंगे? सामने शोक मग्न परिवार होगा। पहली बार जा रहे हैं, शादी के बाद पहली बार मिल रहे हैं, तो होटल बुक कर ही लेते हैं ।

समधीजी ने ट्रेन के डिटेल्स मंगाए, हमारे दो दिन का स्टे देखने पर दामादजी का कॉल आता है, कहते हैं “हम कार्यक्रम के दिन ही शाम को अहमदाबाद और मुंबई रवाना हो रहे हैं।” हम कहते हैं “ कोई बात नहीं, पहली बार रायपुर आ रहे हैं तो एक दिन रुक जाएँगे।” मुझे याद है जब हमारे पिताजी का देहांत हुआ था तब हमारे राजस्थान के सगे संबंधियों के फ़ोन आते हैं और आने का पूछते हैं तो हम कहते हैं पिताजी की बॉडी हॉस्पिटल में डोनेट की है, शोक मिलन या शोक निवारण जैसा कुछ प्रोग्राम रखा नहीं है। आप मिलने जरूर आए पर आराम से आइए, फुर्सत से आइए ताकि बातें कर सकें, उनकी यादें को ताज़ा कर सकें ।

ट्रेन समय पर थी। रात को हमने दामादजी को मेसेज भेज दिया “हमारा खाना हो गया है , ट्रेन समय पर चल रही है।” रात ११.३० के करीब हम रायपुर पहुंचते हैं, स्टेशन पर दामादजी और उनके जीजाजी हमें पिकअप करते हैं। वैसे शोक निवारण तक घरके व्यक्ति बाहर नहीं निकलने की प्रथा होती है फिर भी हमें वो लेने आते हैं ताकि हमें दिक्कत ना हो।

कार में मैं उन्हें कहता हूँ “देखो इतना लेट हो गया है, करीब १२.०० बज रहे हैं, हमें होटल छोड़ दो, हम सुबह समय पर कार्यक्रम स्थल या घर पहुँच जाएँगे।” दामादजी कहते हैं “आप पापा से बात कर लो”। उनसे बात होती है तो वे साफ़ कहते हैं “परिवार वालों का आदेश है आपको घर ही आना है, यहीं रुकना है”। मुझे भी यह सही लगा। सोचता हूँ सबसे मिलना हो जायेगा, परिचय भी हो जाएगा। वैसे भी शादी में कहाँ हम एक दूसरे परिवारजनों को जान पाते हैं, सही में मिल पाते हैं ? तब हर कोई अपने रंग में, अपने रोल में व्यस्त रहता है ।

हम १२.०० के करीब घर पहुंचते हैं। शोकाकुल पर अपनत्व से भरे परिवार के सभी सदस्यों से मिलना होता है, वे भी हमारा ही इंतेजार कर रहे होते हैं। हॉल में स्वर्गीय नानाजी की तस्वीर लगी होती है, उस पर हार चढ़ा होता है , हार के अंदर से उनका खिलखिलाता, चमकता और कुछ कहता हुआ चेहरा दिखता है जो निश्चित ही दुःखद वातावरण को सहज बनाये रखते दिखता है।

उनकी तस्वीर को नमन करने के बाद श्रद्धेय नानाजी के बारेमें बातें होती है, उनके हंसमुख, मिलनसार और परिवार के मुखिया के रूप की खूबी तथा उनके समर्पण को जान पाते हैं । उनके अंतिम क्षणों की सहज घटना पर भी बातचीत होती है। और अंत में आग्रह के साथ एक कप दूध का दौर चलता है और वे हमारी सफ़र से आई थकान को समझते हमें गेस्ट रूम में आराम से सोने का आग्रह करते हैं। सही है दिन भर का सफ़र भी थका ही देता है भलेही हम कुछ काम ना भी करें । बेड पर गिरते ही नींद आ जाती है ।

सुबह समय पर नींद खुल जाती है। रूम के सामने फुल साइज स्लाइडिंग डोअर और बाहर बड़े बड़े पेड़ नज़र आते हैं … उठ कर देखता हूँ तो सामने गार्डन था। जिसके पेड़ रूम में से सुहावने दिख रहे थे। प्रकृति के दर्शन से दिन की शुरुवात होती है। रात को सोने से पहले तन्वी की मामी सास ने कहा था “सुबह उठने पर एक बार टेरेस चले जाना आपको टेरेस गार्डन पसंद आयेगा।” शायद उन्हें मालूम था मेरे गार्डन के शौक के बारेमें। टेरेस गार्डन देखने का मोह हम दोनों को सुबह सुबह टेरेस पहुँचा देता है । सुंदर गार्डन था। खिली फुलवारी थी। हर पौधा अलग अलग रंग के फूलों से सजा था। देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।

क्रमशः भाग २
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है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल?

आनंद मल्हारा
८ मार्च २६, जलगांव
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  • भाग २

रूम में तैयार होकर,नाशता कर “शोक मिलन” कार्यक्रम के लिए दादावाड़ी आते हैं। “रायपुर की दादावाड़ी कला-कुसर से सजी सवरीं थी”। कार्यक्रम समयपर शुरू हो जाता है। अनेक मान्यवरों द्वारा दिवंगत आत्मा के समृद्ध जीवन को सुनते हैं, उनके फ़ार्मा व्यवसाय का बेदाग जीवन, सामाजिक योगदान के साथ परिवार को एक संघ रखने की कला को सुनते है, उन्होंने दो भाइयों के भरे पूरे परिवार में बखूबी “cousin” शब्द लापता कर दिया था। उनके समर्पण को, उनके सिद्धांतों को समझते हैं तो लगता है हमें बहुत कुछ सीखना बाक़ी है।सबसे पहले..सबको विश करते,सब बच्चो की पढ़ाई की ख़बर रखना । सबको स्टेशन पर रिसीव करना और उन्हें सीऑफ़ करने का उनका जुनून प्रशंसनीय था। वे इतने आधुनिकतावादी थे कि जब वे अपने बेटे के लिए रिश्ता तय कर रहे थे , तब बहू को कहते हैं “ससुराल आने के पहले कार चलाना जरूर सीख लेना “।

कार्यक्रम के अंतिम दौर में दामादजी का शोक निवारण हेतु उनकी टोपी उतारने का सदभाग्य मुझे मिलता है ।
कार्यक्रम के आयोजन में एक ख़ास अनुकरणीय विशेषता थी, जिसका ज़िक्र में अगले किसी अंक में विस्तार से करूँगा ।

भोजन पश्चात घर आते हैं । रात तक अलग अलग परिचित घर आते रहे। जिसे लेट मालूम पड़ा, जो कार्यक्रम में आ नहीं पाए या जिनके यहाँ कोई शुभ कार्य रहा होगा वे दिन भर आकर मिलते रहे, उनसे मेरा भी परिचय होता रहा। नानाजी के साथ की उनकी प्रेरणा दाई यादें सुनते रहे। “संथारा ( इच्छा मरण) देह दान, अवयव दान, सही उम्र में सहज मृत्यु आना, सही कर्मों का फल होता है” ऐसी चर्चा बीच बीच में होती रही।

शाम को समधीजी अहमदाबाद के लिए निकल गए। उन्हें ड्राप करने और एयरपोर्ट के क़रीब बस रहे “नवा रायपुर” को देखने दामादजी के साथ सगीसा ( समधनजी ) ने हमें भेज दिया। आते वक्त एक नए कॉफ़ी शॉप “पॉज़”में कॉफ़ी पी कर घर लौटे। रात ९ .०० बजे दामादजी भी मुंबई के लिए निकल गए। अब बाहर से आए मेहमानों में हम ही बचे थे घर में। थोड़ा अटपटा मुझे भी लग रहा था।सोच रहा था ऐसे वक्त कोई इतना ज़्यादा रुकता है भला, उपर से घूमने का सोचना …!

रात को बड़ी हिम्मत जुटा कर हमने बिनती की “अब हमें भी इज़ाज़त दो, आप भी आराम करो चार दिनों से आप सब दिन रात अंतिम कार्य के रीति रिवाज़ में व्यस्त हो, थक चुके हो , हम भी होटल चले जाते हैं, होटल वैसेभी बुक कर रखी है।”

बड़े भाई साब हमें सहज पूछते हैं “यदि हम आपके यहाँ आए होते तो क्या आप हमें होटल जाने देते? मैं निरुत्तर हो गया। “ मैंने कहा “सवाल होटल का नहीं है, हम तो आपके ही शहर में हैं, आपके ही स्नेहभरी कस्टडी में है, कल सुबह फिर से आ जाएँगे, पर मुझे लगता है आज आप भी जल्दी सो जाओ, थोड़ा आराम कर लो “। बड़े मिश्र भाव से उन्होंने हमें होटल छोड़ा । निकलते वक्त उन्होंने साफ़ कह दिया “सुबह का नाश्ता , खाना सब ईधरही होगा।

होटल के रिसेप्शनिस्ट ने हमें पूछा “आप तो कल आने वाले थे,” हमने कहा “रायपुर की मेहमान नवाज़ी ही ऐसी है, हमें होटल आनेही नहीं दिया”। सुनकर रिसेप्शनिस्ट भी प्राउडली हँसने लगा। हम रूम में पहुँचे , टी २० शुरू थी। भारत की जीत देखकर सो गए।

सुबह लेट उठे । सोचा ब्रेकफास्ट यहीं कर लेते हैं , वैसे भी वो रूम के साथ इंक्लूड था। सामने से समय पर नाश्ते के लिए फ़ोन आ जाता है। हमें १० बजे गाड़ी लेने आ जाती है। घर जाते हैं, ११ बजे तन्वी की नानी सास हमें वहाँ के कैवल्य धाम देखने सगीसा ( समधनजी) के साथ भेजती है। पुराने रायपुर की गलियों से होते हुए, सगीसा के पुराने घर , दुकान देखते जैन मंदिर भरी दोपहर पहुंचते हैं जहाँ २४ जैन तीर्थंकरों की अलग अलग मूर्तियां स्थापित की हुई थी। आजतक मैं इन २४ तीर्थंकरों के मुख में क्या फ़र्क़ है समज नहीं पाया। वहाँ एक भव्य भगवान महावीर का मंदिर भी था। मंदिर देखने पर दिल अभिमान से भर जाता है जब वहाँ लगी हुई कोन शिला पर जलगांवके आदरणीय सुरेश दादा जैन का नाम मंदिर के निर्माण में योगदान हेतु सर्वोपरि लिखा था। हम वहाँ भोजन रूपी प्रसाद लेकर घर पहुंचते हैं।

थोड़ी इधर उधर की बातें होती है। और सगीसा के मौसाजी कमलजी हमें चाय पर उनके घर ले जाते है।
मिलनसार और स्नेह पूर्ण उनका व्यवहार सराहनीय था। रास्ते में वे हमें रायपुर की खूबियों से अवगत कराते रहे । उनका घर एक बुटीक हाउस जैसे सजा था। फिर मालूम पड़ा उनकी बेटी आर्टिस्ट है और वो थिमेटिक इवेंट बहुत ही डिटेलिंग के साथ एक्सीक्यूट करती है। काम इतना अच्छा की उसकी अवेलेबल तारीख़ के हिसाब से कुछ इवेंट शिफ्ट हो जाते।…


कमलजी ने बुलाया चाय पर लेकिन नारियल
पानी के बाद डाइनिंग टेबल पर
अंगूर से लेकर रबड़ी तक, कचौड़ी से लेकर भेल तक , काजू बदाम से लेकर बिस्किट तक एक के बाद एक आईटम टेबल पर आते रहे , और अंत में चाय भी आ गई। आव भगत ऐसी की लग रहा जैसे लड़की या लड़का देखने गए हो। रायपुर की कौनसी डिश फेमस है यह जानना, पूछना रह गया पर उनकी मेहमान नवाज़ी को ज़रूर एक नंबर देना होगा।

इसकी पुष्टि हमारे साथ दिए टिफिन से भी आप लगा लोगे। शाम ७.०० बजे हमारी ट्रेन थी जो सुबह ७.०० बजे जलगांव पहुँचने वाली थी । ट्रेन थी एक “हॉलिडे स्पेशल”। हमारे टिकट एजेंट गोपाल भाई को भी वही ट्रेन मिली थी। हॉलिडे स्पेशल ट्रेन की एक खूबी होती है, इन ट्रेनों का कुछ सच्चा नहीं होता। कभीभी, कहीं भी वो लेट हो सकती है। तन्वी की मामी सास ने टिफिन पैक किया था। रात का पूरा खाना तो दिया ही था जिसमें पराठे, थेपले, सब्जी , कचौड़ी, आचार, पानी, प्लेट, नैपकिन आदि सब कुछ था, पर उसमें खास बात यह थी की उन्होंने टिफिन में सुबह के नाश्ते के लिए ब्रेड और बटर भी रखा था और श्रीमतिजिको कहा था यदि कदाचित ट्रेन लेट हो गई तो नाश्ता रखा है, कर लेना। सचमें इतने दूर की तो हमने कभी ख़ुद के लिए भी नहीं सोची तो दूसरों की क्या सोचेंगे? यह थी तालेडा परिवार की या कहो रायपुर की मेहमान नवाज़ी।

गाड़ी समयपर रायपुर आती है , रात को खाना खाकर सो जाते हैं , सुबह जब नींद खुलती है तो शेगांव स्टेशन दिखता है और घड़ी में ७.३० का समय। थोड़ा फ्रेश होते हैं और करीब ८.०० बजे के करीब हमारी श्रीमतीजी घड़ी देखकर कुछ सोचते हुए कहती है “अपनी गाड़ी करीब २ घंटे देरी से चल रही है, अब जलगांव ७.०० बजे नहीं ९.३० तक आयेगा “।
”तो “? मैं पूछता हूँ। वो फिर थोड़े धीमे आवाज में कहती है “अरे वो तन्नू की “आरती मामी”ने जो नाश्ता दिया है, क्यों ना उसे कर लिया जाए? गाड़ी लेट जो हो गई है “। यह सुनकर हम दोनों जोर से हँसने लग जाते हैं। मुझे तो पूरा विश्वास है श्रीमतीजीने जरूर भगवान से प्रार्थना की होगी कि ट्रेन लेट हो जाए और नाश्ता ट्रेन में हो जाए ताकि घर पर जातेही नाश्ते का सोचना ना पड़े । हम साथमे ब्रेड का पैकेट खोलते हैं और बटर के छोटू छोटू पैकेट को खोलकर ब्रेड पर लगाते हैं और नाश्ता कर ही लेते हैं ।
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है ना लाइफ फुल ऑफ़ स्वीट मोमेंट्स?

आनंद मल्हारा,
९ मार्च २०३६, जलगांव.