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- ‘शोक निवारण’ शब्द सुना होगा पर कभी ‘एसhock निवारण’ के बारे में सुना है?
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क़िस्सा नया है, मजेदार है अपने दिमाग़ की परतों को खोलने वाला है । हुवाँ यूँ हम लंदन में तेस नदी के किनारे “दलondon eye “ के पास पर घूम रहे थे। ‘लंदन ऑय’ एक बहुत बड़ा झूला है जिसमें बैठकर आप पूरा लंदन का नज़ारा देख सकते हो , बहुत ऊँचा है। इतना ऊँचा की हमारी मैडम ने उसे देखते ही सक्त ताकीत दे दी कि आप इसमें बैठोगे नहीं।
कहाँ कुछ ऊँच नीच हो जाए तो..?
वैसे मेरी भी हिम्मत नहीं हो रही थी उसका टिकट देख कर। यदि हम तीनों उसमें बैठते तो क़रीब १२-१५ हज़ार रुपयों का खर्च हो जाता। शायद वो लंदन का दूसरा ही दिन था तो ‘पाउंड’ को ‘रुपये’ में कन्वर्ट करने के बाद ही निर्णय लेना सहज स्वाभाविक था।
हम रिवर साइड के बेंच पर बैठे शायद घर से साथ लाए ठंडे पर स्वाद वाले जैन्स के थेपले खा रहे होंगे कि श्रीमतीजी को वाट्सअप पर कॉल आता है। चचेरे छोटे भाई का फ़ोन था। ‘कहाँ हो, कैसे हो , आपके तो मज़े है,’ और इधर उधर की बात होने के बाद कहता है ‘एक खुश खबर है, ‘ ‘क्या ?’ पूछने पर बताता है ‘बेटी का रिश्ता पक्का कर लिया।’ ‘बधाई हो, बधाई हो’ हम सब कहते हैं। ‘ लड़का पंजाबी है , दोनों कैनेडा में साथ पढ़ते थे।’ पंजाबी सुन कर थोड़ा चौंकते है और कहते है ‘अरे वाह! बहुत अच्छा.. लड़का कैसा है? परिवार कैसा है?’ हम पूछते हैं। वह कहता है ‘बहुत अच्छा परिवार है, बहुत ही सज्जन लोग हैं। लड़का भी बहुत सरल स्वभाव का है।’
‘चलो एक बड़ा काम हो गया’ मैं कहता हूँ और फिर हमारी मैडम उसकी बीवी को फ़ोन पर लेती है और गप शप चालू हो जाती है। कहती है ‘देखो लड़की कितनी होशियार है, अच्छा लड़का ख़ुद ही ढूँढ लिया, अरे फोटो तो भेज…’
उधर से फटाफट फोटो ट्रांसफ़र हो जाते हैं। फोटो हम सब देखते हैं। लड़का खूबसूरत है, लंबा झंबा स्मार्ट है, मैं और तन्नु दौनों कहते हैं क्या मस्त जोड़ी है।हमारी मैडम थोड़ा परेशान दिखती है , पूछ ही लेती है ‘ये तो सरदार है … पगड़ी…?’
उधर से भी थोड़ी निराशा भरे स्वर में आवाज़ आती है ‘हाँ भाभी, बच्चों की पसंद के आगे हम क्या कर सकते हैं। ये भी तो कुछ नहीं बोलते।’
‘नहीं लड़का तो अच्छा है, बस यह पगड़ी …! बराबर है, आपाँ कई कर सकाँ।’ हम सब एक बार फिर से उन्हें बधाई देते हैं और फ़ोन कट जाता है।
हम घूमने आगे निकल जाते हैं। पर बीबी का दिमाग़ वहीं अटक जाता है। घूमते वक्त वही टॉपिक वो मेरे सामने या तन्नु के सामने निकालती है। सोचती है ,कहती है पंजाबी तो ठीक है लेकिन वो हाथ में कड़ा, माथेपर पगड़ी… कल बच्चे होंगे वो भी सरदार…! कैसा लगेगा?
उस दिन तो रात में भी उसे वही सपने आ रहे थे। लंदन में तो वैसे भी बहुत सरदार हैं , वो उन्हें देखती और कहती ‘अपने घर में बच्चे अब ऐसे दिखेंगे? बात कुछ जम नहीं रही।’
लंदन में जब भी घर से किसी का फ़ोन आता तो इसी बात पर चर्चा होती। पगड़ी पर बात अटक जाती । अंत में सभी यही कहती या कहते ‘हम क्या कर सकते हैं, बच्चों की पसंद है।’
१० दिन बाद हम लंदन , स्कॉटलैंड घूम कर अपने देश पहुँचते है। शायद रविवार को ही पहुँचते है। रात को सब भाई मिलने घर आते हैं। ट्रिप कैसी रही, क्या क्या देखा सब पूछते है। लायी हुई गिफ्ट बाँटी जाती है और फिर से वही सरदार के साथ के हुए रिश्ते की बात निकलती है। तो सभी उस पर अपनी अपनी राय रखता है । ५०% महिला पुरुष उसे ok कहते है और ५०% पसंद नहीं करते। कहते है ‘जैन और सरदार’ की जोड़ी कैसे जमेगी? प्यार व्यार एक दो साल में ख़त्म हो जाएगा फिर क्या?
तब परिवार की नई जनरेशन के दो तीन बच्चे भी होते हैं, वो कूल थे। उन्हें इसमें कुछ अलग, अटपटा नहीं लग रहा था। वो तो बस बोल रहे थे ‘लड़का स्मार्ट है। अच्छा है और क्या चाहिए?’
सुबह दामाद जी का भी फ़ोन आता है , वो भी सहज भाव से कहते हैं मल्हारा परिवार india होता जा रहा है.. पहले पारसी, फिर गुज़राथी, ब्राह्मीण और अब पंजाबी..! क्या बात है।
चर्चा के अंत में एक भाई कहता है ठीक है जो हुआ सो हुआ, ऊपर वाले ने ही यह जोड़ी बनाई है उसे स्वीकार करो और दिल को बड़ा करो, अपना मनोबल बढ़ाओ और इस शुभ समाचार की ख़ुशियाँ मनाओ। याद रहे इस न्यूज़ ने जो हमें शॉक दिया उस shock का आज निवारण हो गया है।
और अब मन की तैयारी करो यदि रिसेप्शन यहाँ जलगाँव में होता है तो गेस्ट का स्वागत हम सबको आगे खड़े रहकर करना है। सुनकर सब लोग बहुत हँसते है और हाँ-ना, हाँ-ना करते मीटिंग ख़त्म हो जाती है।
आनंद मल्हारा
०४ फरवरी २०२५, जलगांव.
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