*लोक सोचते हैं.. हम एक्सपर्ट है *
हमने एक लाईफ स्टाईल – वेडिंग के एग्जीबिशन में एक्सक्लिुसिव्ह वेडिंग कार्डस् का स्टॉल लगाया था। ताकि सबको रिमाइन्ड हो जाए, की ‘मल्हार ‘ कस्टमराइज्ड कार्ड बेहतर बनाते हैं।
सोचा छोटेसे स्टॉल पर भीड कैसे लाएँगे? व्हिजिटर्स स्टॉल पर क्यों रुकेंगे?
हमने एक थीम चुनी..
दुसरी शादी कब करोगे? लोगों को यह सपना दिखाएँगे… खुशियों के अनमोल पलों को अपने पार्टनर के साथ फिरसे जिने का अलग तरीका बताएँगे और अपने कार्ड उन्हे
बताकर व्यवसाय बढाएँगे।
टीम ने भी डन किया…
स्टॉल पर फुल एवं बोल्ड साईज में लिखा …
‘दुसरी शादी कब करोगे?’
इव्हेंट का पहला दिन शुरु हुआ.. सभी स्टॉल पर भीड और मल्हार के स्टॉल पर इक्का दुक्का लोग.. शाम तक प्रदर्शनी में महिलाओं की भीड ज्यादा थी। वे तो ‘दुसरी शादी कब करोगे?’ ये पढकर स्टॉल को अनदेखा कर निकल जाती थी। शाम के बाद मियाँ – बिवी साथ आने लगे फिर भी स्टॉल पर कोई फरक नही। दोनों भी लाईन पढते, पति स्टॉल के समिप आना चाहता मगर पत्नी उससे आगे खिंच लेती…
रात को विचार मंथन हुआ। निर्णय किया की स्टॉल पर केवल महिला ही खडी रेहेंगी पुरुष नहीं और‘दुसरी शादी कब करोगे’ इस लाईन को बदल कर ‘पाटर्र्नर वही.. शादी नई’ यह लाईन लिखेंगे।
दुसरा दिन शुरु हुआ। दुसरे दिन भी स्टॉल पर लोक रुकते नहीं थे। युवा वर्ग रुकता और कहता हमारी पहिली शादी ही होनी बाकी है। कोई कहता मुझे 1 साल हुँआ है शादी करके.. पर हाँ कुछ मल्हार से परिचरीत लोग रुकते भी…देखते, हँसते और चले जाते। हमारी सेल्स टीम लोगो को रोकने में सफल नहीं हो रही थी।
रात को फिरसे सोचा गया, तब साथमें हमारी डॉक्टर मॅडम भी थी। निर्णय हुआ की तीसरे दिन मॅडम खुद स्टॉल पर बैठेगी और
‘पार्टनर वही.. शादी नई’ यह लाईन बदलकर ‘अपने मम्मी-पापा की दुसरी शादी कब करोगे?’ यह लिखना तय हुआ। क्यों कि माता-पिता की दुसरी शादी का जिम्मा बच्चों को ही लेना होता है।
तिसरा दिन शुरु हुँआ। मॅडम स्टॉल रुकी थी, ज्यो पिछले 25 सालों से पढाने का काम करती है। भीड बढ गयी। बच्चे, युवा अपनी टीचर को देखर भागकर आने लगे। पॅरेन्टस् भी मॅम को देखकर रुकने लगे और मॅडम ने दुसरी शादी की बात सबको उत्साह से बताना जारी रखा। कुछ लोग भीड को दखकर रुकते, लाईन को पढते और मैडम को सुनकर चले जाते। कुछ सिनिअर सिटीजन लोग कहते.. अब तो धर्म, ध्यान का वक्त आ गया है, कहाँ दुसरी शादी करेंगे? कुछ कहते ..एक में ही थक गए हैं, कहाँ फिरसे फेरे लेना…
खैर यह सब आपसे शेअर करने का एक ही मक्सद था.. हम जो जो सोचते हैं, उस सोच को लोगो तक पहुँचाने में, उसे कारगर बनाने में कितना चिंतन, कितने बदल, कितने प्रयोग करने पडते हैं। तब कहीं हम सफलता के थोड़े करीब पहुँच पाते हैं।
पर लोग सोचते हैं .. हम एक्सपर्ट हैं।
और देखो एक विडंबना….
यहाँ हमने देखा की हर व्यक्ति, महिला, पुरुष, युवा, बालक अलग है। उसकी समझ अलग है, उसका बर्ताव अलग है, चुनाव अलग है, स्वभाव अलग है। सभी को एक बात समझेगी यह मुमकिन नहीं । पर जब हम डॉक्टर के पास जाते हैं.. वह ब्लड प्रेशर, शुगर के स्टॅण्डर्ड मानक के उपर या नीचे अपनी रिडिंग को देख हमें बीमार करार दे देते हैं और हम भी ज्यादातर उस बात को मानकर गोलियाँ खरीदकर उसे लेना चालू कर देते हैं।
– आनंद मल्हारा


