Dipawali ki lambi chhutiya…. kabhi khushi kabhi gham 50 – 50

Dipawali ki lambi chhutiya…. kabhi khushi kabhi gham 50 – 50

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दीपावली की लम्बी छुट्टियां..
कभी खुशी कभी गम ५०-५० ।

5 दिन की लम्बी छुट्टियों में से आखिरी 3 दिन को एन्जॉय करने 4 भाईयों के 12 सदस्य निकले घर से बाहर 3 गाडियों में त्रंबकेश्‍वर की ओर… कौनसी गाडी में कौन बैठेगा इसकी चिठ्ठियाँ निकाली गई, ताकि गाडी में गॉसिप-चर्चा करने नए विषय मिल पाएँ.. हँसी खुशी के साथ एरंडोल से कार ढाबा और फिर नासिक में हमारा 3रा पड़ाव था।

बेटी के अपार्टमेंट के नीचे जैसेही गाडी पार्क की.. वॉचमन भागता आया। बोला गाडी से जलने की बू आ रही है.. इंजिनिअर भाई ने बोनट खोला जो काफी गरम हो गया था। रबर जलने जैसी गंधी बू आ रही थी। सर्वीस सेंटर को फोन किया.. नो रिप्लाय आया। छुट्टी। लोकल गॅरेज वाले को बुलाया। उसने देखकर तुरन्त बताया, की यह क्लच प्लेट जलने की बू है। मैने कहा यह तो 20 दिन पहले ही बदली थी। खैर इस दुःख को बाय करके गाडी को वहीं छोडकर बाकी दो गाडियों में एडजस्ट होकर फायनली हम त्रंबकेश्‍वर की ओर निकल पडे।

मै जिस गाडी में था.. भाई ने कहा, “लगता है गाड़ी पर लोड आ रहा है।” रास्ते का अंतीम छोर खराब था.. खड्डे थे.. कभी कभी गाडी जमीन से टकराने की आवाज आ रही थी। रिसॉर्ट पहुँचकर गाडी से उतरतेही देखा की गाडी का पिछला पहिया पंक्चर हो गया था। इसी वजह से गाडी भारी लग रही थी या आवाज आ रही थी। रुम में चेक इन हुए और सबसे पहले पंक्चर टायर को टना टन स्टेपनी से रिप्लेस किया।

चेक इन के वक्त ही मॅनेजर ने कहा की 2 दिन के पूरे पैसे पहले पे करें.. शायद उन्हें अपनी सर्वीस या फिर लोगों की नियत पर भरोसा कम था। बाद में ज्ञात हुआ, उनके सर्वीस में सचमुच काफी कमियाँ थी। अच्छा हुआ पैसे ले लिए थे.. वरना पैसे काटते।

पहली सुबह मेरी तबीयत नरम हो गई। एसीडीटी एवं पेट की गडबड के वजह से मैने आराम करना पसंत किया जबकि टीम के बाकी सदस्य नासिक की वाइनरीज देख कर आए। दुसरे दिन हम गोदावरी नदी के उगम स्थान को देखने काफ़ी दूरी तक पहाडी पर गाडी और फिर रिक्षा से गए। वहाँ हमारे साथ एक दर्दनाक हादसा हो गया। उस हादसे के दुख़ को हमने अपनी किस्मत समझकर एन्जॉय किया। जिसका जिक्र अगले पोस्ट में खास करुंगा..

दोपहर में चेक आऊट किया और वापसी का सफर शुरु हुआ.. दो गाडियों से…3 सदस्य नासिक में ही रुक गए। अब दो गाडीयों में 10 सदस्य थे। सोचा था रात तक जलगाँव पहुँच जाएँगे । पर मैं जिस गाडी में था उसमें कभी कभी डिझल की बू आ रही थी। टोल नाके पर रुककर हमने पहिये चेक कर लिए थे। चाय पिने के लिए हम कार ढाबा पर रुके। दूसरी गाडी पहले से वहाँ पहुँच चुकि थी । गाडी से उतरे तो हमारी गाड़ी के बोनट में से धुवाँ निकल रहा था ।

आजुबाजु के ड्रायव्हर्स को बुलाया। एक ने कहा “देखो डिझल लिक हो रहा है और वह इंजिन पर गिर रहा है। उसकी वजह से ही धुवाँ निकल रहा है।” पूरे इंजिन पर डिझल दिख रहा था। छोटे भाई ने कहा, की “15-20 दिन पहले तो गाडी सर्वीस सेंटर पर सर्वीस करवाई थी, फिर यह समस्या कैसे आई?” सर्वीस सेंटर को फोन लगाया.. नो रिप्लाय आया। छुट्टी। फिर उस गाड़ी को भी वहीं आराम करने छोड दिया और एक गाड़ी में 5 सदस्य निकल पडे। बाकी के सदस्य वहीं रुके। जलगाँव के एक सज्जन व्यक्ती की गाड़ी और उनके इन्सानियतवाले ड्रायव्हर ने हमें लिफ्ट दी। रात 8 बजे तक पहुँचने वाले हम रात 12 बजे सही सलामत जलगाँव पहुँचे।

यह सब लिखते हुँए मुझे लग रहा था की यह सब क्या है? कभी खुशी दिखती है तो कभी तकलिफे सामने आ जाती है। तकलिफ के वक्त फिर कोई अचानक से मदत करने भी आ जाता है और रास्ता मिल जाता है।

सुख पाने हम कितनी भौतिक वस्तुओं को अपनाते हैं और वही अक्सर हमारे दु:ख का कारण भी बनती है। जिंदगी को हम कितना पेचिदा बनाते रहते हैं और फिर उसमें से बाहर निकलने के रास्ते ढुँढते रहते हैं।

अमर भाई कहते है ‘मेक लाईफ सिम्पल’
सही है… पर आज सिम्पल रहना कितना कठिन बन गया है।

फिर भी लाईफ इज ब्युटिफूल!

– आनंद मल्हारा