हमारी रिक्षा क्या पलटी हमारी दिपावली यादगार बन गयी…
लंबी
घुट्टी के आखिरी दिन हम १२ में से ८ लोग सुबह सुबह गोदावरी नदी के उगम स्थल को देखने त्र्यंबकेश्वर की पहाडी निकल पडे… कुछ बडे, कुछ छोटों ने रिसोर्ट में सोना ज्यादा पसंद किया..
काही चढाई थी, रास्ता भी मोडवाला और हम गाडी चलानेवाले कच्चे खिलाडी… काफी उंचाई तक पहुंचे करीबन ७० प्रतिशत .. पहले-दुसरे गिअर में दोनों गाडियाँ चढ़ी थी।
सामने से एक रिक्षा क्रॉस हो रही थी। हमने उसे रुकाया और आगे का रास्ता पुछा। उसने भी डरा दिया.. रास्ता खराब है, मोडवाला है। वहाँ कार नहीं जा सकती… हम लेकर जाएँगे केवल २५० रुपये में ..सिडियों तक और वापस लेकर आएँगे यहाँ तक.. डरते क्या नहीं करते? आज हर कोई इसी तकनीक से अपना व्यवसाय – प्रोफेशन कर रहा है। फिर वह डॉक्टर, वकील, प्रोफेशनल या कोईभी सरकारी अफसर हो।
हम ने रिक्षा की और चल पडे गोदा उगम को देखने।
सचमुच रास्ता कठिन था.. पर सोचा जब बजाज रिक्षा वहाँ ५ लोगों को ले जा सकती है, तो अपनी इंपोर्टेड कार क्यो नहीं? पर ‘डर’ बडी चीज है।
पक्का रास्ता खत्म हुआ और शुरु हुआ कच्चा, खड्डेवाला ,उबड खबड रास्ता.. पर रिक्षावाला बडी मुश्किल से आगे बढ रहा था। गाडी बॅलेन्स करते करते आगे निकल रहा था। ५वे – ७वे दशक के पिक्चर का फील दे रहा था। शरीर का हर पुर्जा हिल रहा था। पर हम खुश थे। सफर का मजा ले रहे थे।
सिडियों तक पहुँच गए और फिर हम पैदल १०० सिडियों को पार कर गोदावरी के उगम स स्थल पर पहुँच गए। दर्शन किए और बहुने बॉटल में पवित्र पानी भर लिया। कोई कह रहा था इसे आँखों पर लगाओ तो आँखे अच्छी रहती है। शायद किसीने मजाक में पर सिरीअसली श्रीमती को कहा भाभी माथे पर लगाओ तो बाल कम गिरेंगे। मुझसे रहा नहीं गया तो बोल पडा, “”अरे सूनो इस पानी को अपनी जबान पर भी डालो ताकि वह द्वेश, निंदा, जली -कुटी बातों की जगह अच्छी बाते करें… लोगों की तारिफ करें। तो सब महिलाएँ हँसने लग गई..कहने लगी यह तो मुश्किल लगता है।
फिर वापसी शुरु हुई.. वही पैदल १०० सिडियाँ और रिक्षावाला इंतजार ही कर रहा था। कहने लागा निंबू पानी पिलो साब .. थक गए होंगे। अदरक मारा हुआ निंबू पानी पिया.. अच्छा लगा। बंदर को खिलाने बीक रहे चने भी खरीद लिए खुद खाने के लिए।
रिक्षा चल पडी.. एक में सभी महिलाएँ और बड़ा भाई, दुसरी रिक्षा में हम भाई और तनवी। ३ लोग पिछे और एक ड्रायव्हर के पास…
फिरसे वही कच्चा रास्ता..७ D मूवी का फील देने वाला .. पर सही सलामत हम पक्के रास्ते तक पहुँच गए.. ड्रायव्हर की तारीफ के पुल भी बांध रहे थे।
पक्के रास्ते पर स्लोप था.. गाडी की स्पीड भी बढी.. थोडी दुरी पर हमें हमारी कारे दिखने लगी। तब हमारी रिक्षा दाहिनी ओर …राँग साईड जाने लगी। कुछ सेकंड बाद जोर से आवाज आया। लग रहा था की रिक्षा एक साईड जोर से खिची चली जा रही है। अनजाने हर किसी का शरीर सतर्क हो गया। जैसा संभव था हर किसीने रिक्षा को कसकरपकड लिया था और कुछ कहने.. कुछ समझने के पहले हादसा हो गया। धडाम का आवाज आया।
जब आँखों के समाने का अंधेरा दुर हुआ तब समझा हमारी रिक्षा रोड के किनारे पलट गयी थी और सुखे नाले में गीर गई थी। हम चारों एक दुसरे को देख रहे थे। सभी होश में है का अनुभव कर रहे थे और फिर हम अपनी और देखने का प्रयास करने लगे। किस हाल में गिरे.. रिक्षा में हम सब एक दुसरे में फँसे फँसे उसे देख रहे थे और फिर जबान से शब्द निकले तो विकास पुछ रहा था.. आनंद कैसा है? मैं पुछ रहा था..कैसी है तन्नु? तन्नु पुछ रही थी.. कैसे हो पापा?
मै सबसे निचे, मेरे साईड में उपर तनवी और उसके उपर विकास जिसने कहा.. मैने रिक्षा का पाईप पकड लिया था जिससे मैं तनवी के उपर धीरे गिरा.. प्रशांत जो ड्रायव्हर के साईड में था वह ड्रायव्हर के उपर गिरा था। वह पहले बाहर निकल गया और फिर ड्रायव्हर.. उन्होंने बताया… अपनी रिक्षा का अगला पहिया निकल गया .. उसका एक्सल टुट गया है। आगे की रिक्षा रुकी, उन्हें जोर से आवाज जो आया था। जब उन्हें समझा की उनके परिवारवालों की वह रिक्षा है तो उनके होश उड गए.. ओ बापरे.. ओ बापरे… चिखने की आवाज आई। जब उन्होंने हमें देख लिया तो थोडे शांत हुए.. पिर मिसेस जोर जोर से पुछ रही थी.. कहाँ है तन्नु.. मेरी तन्नु? जो साईड में दबी थी, उपर से दिख नहीं रही थी। जब उन्हें वो दिखी तो उनके जान में जान आई..
हमें बाहर निकाला गया.. मैं सबसे निचे था.. ज्यादा मुझे लगी थी.. पैर हिलाकर देखे.. हिल रहे थे.. हाथ हिलाकर देखे.. ठिक थे.. पैंट उपर कर के देखी.. घुटने पर काफी खरोंचे आई थी। बाहर निकलकर भाई के सहारे चलकर देखा.. पुराने हड्डियां टुटने के अनुभव से लग रहा था सभी हड्डियां सही सलामत है, पर मसल पर इन्ज्युअरी हुई है। तनवी का हाथ और कंधों में पेन था.. हाथ हिलाकर देखा.. ठिक था.. पर उसे भी कंधों पर बेजुबान मार लगी थी।
औरतों की आवाज आ रही थी। हमारे साथ ही ऐसा क्यो हो रहा है.. किसी की नजर लगी है वगैरे.. ।लंघडाते लंघडाते भी बोलने का.. बात काटने का मैंने मौका नहीं छोडा.. मैंने कहा.. किसी की नजर नहीं दुआ लगी है.. नहीं तो रास्ते की दुसरे छोर में यह हादसा हुआ होता तो हम चारों नाले में गिरने की बजाए खाई में गिरते और शायद गिरते गिरते उपर भी पहुँचते।
अनेकों बार हम “बस दरीत कोसळली’ की न्यूज पढते है। बस वैसा ही, प्रॅक्टिकल अनुभव हम कर पाए इस रिक्षा के माध्यम से.. त्र्यंबकेश्वर की कृपा से गोदा के पवित्र पानी से..फीर याद आया.. हमारे ४ सदस्यों का जो रिसोर्ट में आराम फर्मा रहे थे .. क्या कहे उनके किस्मत के बारे में..? वह इस हादसे का शिकार होने से बच गए या इस यादगार लाईव्ह अनुभव से वंचित रह गये…?
आप ही बताएँ..!
बट लाईफ इज ब्युटिफूल…!
– आनंद मल्हारा


