दुसरे देश में या लंबे सफर में मौत आ गई तो… क्या करोगे भाया..?
बात है..
पिछले वर्ष मानससरोवर यात्रा की … सफर के पहले पडाव में हम भुसावल से लखनऊ ट्रेन से जा रहे थे। हमारे साथ जो बातुनी गाईड था वह अलग अलग किस्से नॉन स्टॉप सूना रहा था.. सेल्समन और गाईड में ज्यादा अंतर नहीं होता तब समझ में आया ।
उसका एक किस्सा आज भी याद है..
कह रहा था… आनंदजी पिछले साल इसी मानसरोवर की टूर में हिलसा, नेपाल के गांव में टीम के एक यात्री की अटॅक आने से मृत्यु हो गई थी। हमने जो जो संभव था इलाज कर वाया.. पर बचा नहीं पाए.. कहाँ कहाँ लेकर गए.. कैसे डॉक्टर को बुलाया.. सब बताया.. ।
हम ग्रुप के सभी यात्रियों ने भी स्वीकार किया… जीवन में कभी भी, कुछ भी हो सकता है और यात्रा में भी। हमने गाईड को मजाक में हिंमत के साथ कहा.. बाळू, चिंता मत करो अबकी बार एसा कुछ नहीं होगा।
कुछ देर के बाद मैने फिर से वह टॉपिक चेडा और उससे पुछा बाद में क्या हुआ? डेड बॉडी का क्या किया? उसे कैसे अपने देश पहुँचाया?
और स्टोरी का और भी दर्दनाक
पार्ट – २ वह बताने लगा..
कह रहा था हम हमारे हेड ऑफिस को रेग्युलर अपडेट कर रहे थे.. । हमारे हेड आफिस ने मृत व्यक्ति के घर मेसेज दे दिया था। हमारे ग्रुप के बाकी के लोगों की यात्रा चलती रहे इसलिये दुसरे टीम लिडर के साथ उन्हें आगे भेज दिया। मुझे रुकना पडा.. फिर डेड बॉडी को टिका कर रखने शवपेटी का बडे मुश्किल से इंतजाम हुआ। डेथ सर्टिफिकेट लेने फिरसे वही मुश्किले आ रही थी।.. उनके घरवाले दो व्यक्ती इंडिया से निकल चुके थे । उनका पासपोर्ट, अन्य फॉर्मेलिटीज पूरा करने में भी समय लग। मिडिल क्लास फैमिली को वे बिलोंग करते थे।उन्हें वहाँ पहुँचने में करीब 3 दिन का समय लग गया। फीर डेड बॉडी को हवाई जहाज से ले जाना भी काफी मुश्किल काम सिद्ध हुआ।। उसके स्पेशल चार्जेस भी देने पड़े। अलग अलग टेस्ट .. रिपोर्टस, परमिशन्स में काफी समय लगा। परिवार वालो के पास अतिरिक्त पैसे भी नहीं थे। तब इधर उधर से मॅनेज कर के उनकी तिकट निकाली। फिर भी ३-४ लाख का अतिरीक्त खर्च उन्हे करना पडा और जो मानसिक, शारिरीक तकलिफे हुई वो सब अगल थी।
यह सब सुनकर मैं सुन्न हो गया.. दिमाग में अलग-अलग विचार आने लगे… यदि अपने साथ ऐसा कुछ हुआ तो? हम एन्जॉय करने जा रहे हैं, खुश हैं, अगर यदी सफ़र में मौत होती है तो क्या होगा?.. क्या अलग करेंगे अपने घरवाले ?
क्या सचमुच डेड बॉडी के लिए इतना करना जरूरी है? क्यों डेड बॉडी का इतका मोह.. उसे घर लेजाना.. दर्शन करवाना और उसपर अनेकों संस्कार करना.. शरीर को मिट्टी में जब मिलना ही है तो क्यों इतने आडम्बर? क्या हासिल होगा उससे?
मैने उसी वक़्त सोचा.. तय किया और सभी सहयोगियों को कहा, मेरे साथ यदि ऐसा होता है तो मेरे घरवालों को सूचित करना.. किसी एक को बुला लेना और जहाँ.. जिस जगह शरीर ने आत्मा छोडी है उसी जगह.. .उसी देश में… उन्हीं की प्रथानुसार उसका दहन करना। यदि वहाँ कोई मेडिकल कॉलेज होगा तो उसे बॉडी दे देना ताकि काम और आसान हो जाए साथही बॉडी सार्थक हो जाए।
मृत्यू के बाद अपने कर्म को ही लोग याद रखते है ।पर ऐसा करने से अपनों को बॉडी जलते वक़्त कुछ मिनिटों के लिए “स्मशान वैराग्य “की जो अनुभूति मिलती है उससे वंचित होना पड़ेगा.. इस सच.. मज़ाक को भी हम झुठला नहीं सकते.
– आनंद मल्हारा


