*कंकु में जाणो हो …
म्हारे यो लफड़ो पड़ी ग्यो*।
साडू भाई का देहांत हुआ .. शोक मनाकर घर आये और दो दिन बाद फिर राजस्थान से देर रात को फ़ोन की घंटी बजी.. डरते डरते मोबाइल लिया तो खबर मिली
ससुर जी चल बसे..।
साडू गए तब उसका दुःख गहरा था, साथमें सभीको सालीजी की चिंता थी .. उनके भावी जीवन को आसान बनाने हर कोई अपनी जिम्मेदारी ले रहा था। पर वो उस हादसे से ,
दुःख से, रोने से बाहर आ ही नहीँ
पा रही थी..
और अचानक पापाजी की खबर सामने आई … दुःख और बढ़ गया… पर सालीजी और हम सबके दुखी होने का मुख्य “पात्र” बदल गया..सालीजी अपना दुःख भूल कर माँ के दुःख में खो गई।
पहले सालीजी रो रही थी और हम सब भी उसके साथ रो रहे थे.. उसे सांत्वना दे रहे थे, अब सासुजी जोर से रो रही थी और हम सब उनके साथ … पर रोना , शोक मनाना सांत्वना देना जारी था।
सुख और दुख कितने रिलेटिव टर्म है.. सामने ज्यादा दुःख है तो हम हमारा दुख भूल जाते हैं और सामने ज्यादा सुख है तो अपना सुख भी कम हो जाता है।
ससुरजी के लिए रात को दो बजे करीब हमें फ़ोन आया था। जैसेही बीबी ने खबर सुनी .. वह फुट फुट कर रो पड़ी। उसे संभालने और निकलने की व्यवस्था करते याद ही नहीं आया कि मैं उन्हें कहूँ ” नेत्रदान या कोई अवयव दान मुमकिन है क्या?” वहाँ पहुँचनेपर सालेजी को पूछा ” क्या पापा की आँखे डोनेट हो सकती थी?”
उसने कहा” हाँ जीजू, पर मैं खुद इतने टेंशन में था और मुझे इसके बारेमें कुछ मालूम भी नहीं।”
मतलब यही मृत व्यक्ति को नेत्र दान करके जिंदा रखनेका मशवरा कोई अपना ही निकट का व्यक्ति ही परिवार में दे सकता है।
62 वर्ष के साडू गए .. क्या हुआ.. अंत तक पूरा समझ नहीं आया , पर पापा गए उसके कारण सामने आए जिसे हम समय पर समझ नहीं पाए ।
3 दिन पहले जब साडू जाने का दुःख सालीजी और हम सब मना रहे थे.. तब हम सबका ध्यान केवल सालीजी और उनके सुपुत्र पर था। पापाजी बड़े होने के कारण आँसू भी बहा नहीं पा रहे थे, पर उन्हें इसकी कितनी पीड़ा हो रही है… हम समझ नहीं पाये। हुम् सब अलकाजी के पास और पापाजी हार्ट के मरीज अकेले।वे अकेले ये दुःख पी रहे थे। अंदर ही अंदर टूट रहे थे,पर बेटेको, बेटियों को ,दामादों को हक़ से कह नहीं कह पाये कि मेरे पास ठहरो , कुछ और समय साथ रहो..और हम सब भी उनकी आँख, उनकी आवाज़ पढ़ नहीं पाए और अपने अपने काम के लिए निकल गए।
अब समझ में आया.. जब घर में कोई कम उम्र का व्यक्ति जाता है तब घर के बुजुर्ग को संभालना उतनाही जरूरी होता है जितना मृत व्यक्ति की बीबी या शौहर ।
जीवन में कुछ प्रमोशन न चाहते भी लेने पड़ते हैं, पर हमारी किस्मत कुछ ज्यादही मेहरबान हुई .. दो दो प्रमोशन हो गए.. तीन दिनों में।
बैठक में आया कोई शुभचिंतक सहजतासे मेवाड़ी में कह रहा था ..” कुंकु में जाणो हो, म्हारे यो लफड़ो पड़ी ग्यो।
वे दोनों दिल के बहुत करीब थे…
मुझे लग रहा है जैसे बहोत लोग
चले गए।
आनंद मल्हारा


