Yadi beti ke bajaay… Beta sasuraal jaane lag jaen to….

Yadi beti ke bajaay… Beta sasuraal jaane lag jaen to….

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यदि बेटी के बजाय………….. बेटा ससुराल जाने लग जाएँ तो…

थोडा अटपटा विषय है… सदियों से चली आ रही प्रथा के बिलकुल विपरीत … पर जब यह खयाल आया और उसपर सोचा तो लगा विषय में दम है…. मुमकिन है और ज्यादा कारगर भी।

हुँआ युँ कि मैं अपने बेटे से मिलने सेंट झेवियर्स कॉलेज में हो रहे उसके ड्रामा परफॉरमन्स को देखने और शाम को उसके होस्टल में जाकर उसके दोस्तों को मिलने.. क्या खाता है? आदी जानने की उत्सुकता से मुंबई गया था।

ट्रेन फुल चल रही थी तो लक्झरी बस से जाना पडा। बस भी बोरीवली की थी और मुझे जाना था सीएसटी.. सायन उतारना पडा। जहाँ बेटे का होस्टल है… सोचा पहले उसीके यहाँ चले जाते हैं… ।

सुबह के करीब ६ बजे थे। फोन लगाया वह निंद में था। पुछा “होस्टल आ जाऊ क्या”? बोला ..”पापा इतने जल्दी आकर क्या करोगे? हम कॉलेज में तो मिल ही रहे है। फिर भी आपको लगता है तो आ जाओ…”

सुनकर थोडा बुरा लगा। बुरा इसलिए लगा की.. तब मेरे सामने मेरी दोनों बेटियाँ आ गई, जो कभी मुंबई-पूना में पढती थी.. होस्टल में रहथी थी। जब भी हम उन्हे मिलने जाते तो वह जबरदस्ती हमें होस्टल बुलाती थी। सहेलियों से प्राऊडली मिलवाती थी। तब हमें वहाँ जाना अटपटा लगता था। क्योंकि वह लडकियों का होस्टल होता था।

हम अक्सर सुनते हैं… देखते हैं.. अनुभव भी करते हैं.. कि बेटियाँ हमेशा माँ बाप की रहती है। उनके ज्यादा करीब होती है। आखिरतक उनका खयाल भी रखती है। जबकी उन्हें पराये घर जाना होता है। और यह भी अक्सर देखा जाता है कि बहुत कम बेटियाँ ससूराल को अपना घर और सास ससूर को अपने माँ-बाप मान पाति है। उन्हें वह काफी मुश्किल जाता है। नतिजा ज्यादा तर घरों में वे अपने बेटों को लेकर अपना अलग छोटा घर बसाना पसंद करती है। बेटा माँ-बाप को अकेला छोडकर सर्विस के नाम पर मजबुरन या फिर बीबी की खातिर अलग बस जाना पडता है..।

इस केस में हम देखते हैं कि दोनों माँ-बाप दुखी है। एक तरफ बेटी अपने माँ-बाप से बिछडी है… उधर बेटा भीअपने माँ-बाप से दूर रहता है।

दुसरी अहम बात.. बेटी को ससुराल जाना है.. पराये घर जाना है इसलिए हम भी उन्हें अक्सर ज्यादा बडे सपने देखने नहीं देते। अलग अलग कला और जरुरी शिक्षा जरुर देते है, ताकि विपदा में वह अपने पैरों पर खडी हो सके।

यदि यह सिस्टम उलटा हो जाए तो…? बेटा शादी करके बेटी के घर आ जाए तो सोचो क्या होगा?

१) बेटी अपने माँ-बाप के पास रहेगी, उनकी लाडली बनकर उम्रभर!
२) बेटी अपने परिवार का व्यवसाय भी संभाल लेगी.. क्योंकि लडिकियाँ ज्यादा जिम्मेदार और सिरीअरस होती है।
३) घर में सांस बहु का द्वंद खत्म हो जाएगा।

दुसरी ओर बेटा ससुराल आ जाएगा। वह ससुराल के व्यवसाय में अपना योगदान देगा… सास ससूर को अपने माँ-बाप मानेगा.. वैसे भी.. सही मायनो में आज के दौर में पुरुष ही ज्या एडस्टेबल होते है।

यदि हम परिवार का सोचें तो जिस घर में बेटा और बेटी दोनों है उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पडेगा.. बहु के बजाए दामाद आ जाएगा। जिस घर में केवल बेटा है उनका घर कायदे से सुना हो जाएगा, जैसे आज बेटी वालों का होता है। पर उन्हें भी.. बेटा बीबी के साथ अलग स्वतंत्र घर में रहता है यह कहने की नौबत नहीं आएगी।

खैर बहुत लिख दी उटपटांग बातें…

उस दिन मैं सीएसटी रुका, बेटे का परफॉरमन्स देखा, उसके प्राचार्य से मिला.. परफॉरमन्स के बाद वह मूड में था… उसने उसके सभी गर्लफ्रेंड – बॉयफ्रेंड से मिलवाया… कॉलेज घुमाया.. साथ में सबवे में अच्छा खाया। मुझे रात को ही पूना निकलना था। …उसका होस्टल देखना बाकी ही रह गया।

(यह मेरा निजी तर्क है.. अनुभव है। आप के विचार भी जरूर शेयर करें। )