Riding on a Sunbeam

Riding on a Sunbeam

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आज लेट ही सही मैं helpfair२ के लाइव इंटरव्यू देने के बाद कांताई हॉल में दिखाई जारही फिल्म “राइडिंग ऑन अ सनबीम” को देखने का मोह छोड़ नहीं पाया।

फिल्म शुरू हो चुकी थी.. शुरू में ठीक ठाक लगी, पर धीरे धीरे ग्रिप पकड़ रही थी । सच में इंडिया एक मजेदार देश है , देखने -घूमने-समझने। जस्ट अतुलनीय ।

पिक्चर खत्म हुई और पिक्चर के क्रिएटर मौक्तिक कुलकर्णी स्टेज पर आए और बच्चों को पूछ रहे थे… किसीको कुछ सवाल? अलग अलग सवाल पूछे जा रहे थे..कोई अच्छे बुरे अनुभव, कोई प्रेरणा कहाँ से मिली पूछ रहा था और फिर मैंने हिम्मत करके एक सवाल पूछने का दुहसाहस कर ही लिया,

पूछा ..

“माफी चाहता हूँ एक तो मैं देरसे आया, पहले क्या हुआ, आपने क्या कहा मालूम नहीं फिरभी मैं जानना चाहता हूँ कि आपका ये जो ट्रेवल का, मोटरसाइकिल पर घूमने का जुनून है जिसे हम मराठी में ‘आवली पन’ कहते हैं.. आप कैसे मैनेज करते हो?
मेरा मतलब है ..आपके इस शौक को फंडिंग कहाँ से मिलती है? आप कहते हो 12 साल पहलेसे आपको इसकी लत लगी,अमेरिका में पढ़ाई की,दुनिया देखी , केवल दस पंद्रह दिन नहीं.. साल साल घूमते हो, साथमें दोस्तों को भी घुमाते हो। आप खुद के कमाए पैसे से ये शौक पूरा करते हो या कोई गॉड फादर है पीछे? ”

मुझे मालूम था.. नहीँ सुना था उनके पिताश्री जानेमाने डॉक्टर है।
यह सवाल सुन कर हर कोई हँसने लग गया। अमलकरजी भी हंस रहे थे।

मौक्तिक ने पूछा “अंकल आप का नाम क्या है?” मैन कहा..” मैं तेरा बड़ा भाई हूँ,और तुम्हारे अमलकरजी का भी दोस्त हूँ और तेरे जैसाही थोड़ा आवली भी । मैं भी ऐसे पर कुछ अलग शौक के काम करता हुँ पर एक या दो महीने में ही नानी याद आ जाती है। पैसों के लिए बीबी के अलावाअनेकों बार बेटे के या बेटीके पैसों का सहारा भी लेना पड़ता है..
तुम क्या करते हो, कैसे कर पाते हो ये सब? जनता बैंक देती है क्या घूमने के लिये पैसे? ”

मौक्तिक कहता है ..” अंकल बच्चों के पैसे? पापाके नहीं है क्या?” मैंने कहा ..”वो तो तुम्हारे डुप्लिकेट थे ,पूरे आवली थे ..
जाते वक्त सब कमाया खर्च करके चले गए।

यह सुन कर पापा के परिचित गायकवाड़ सर मुस्कराने लगे। “सच? पर मुझे पापा ही देते हैं पैसे..”मौक्तिक ने क्लियर किया।
“पर अंकल मैं भी रास्ते ढूंढ रहा हुँ ऐसे शौक को कैसे सेल्फ सस्टेन करें ..?

यह सुनकर मुझसे रहा नहीं गया ,मैंने कह ही दिया “यहाँ एक व्यक्ति बैठा है जो ‘भन्नाट’ आइडिया दे सकता है पैसे कलेक्शन के और हाँ वो तुम्हारा परिचित भी है”। उसने पूछा “बताओ अंकल कौन है वो?” मैन कहा “500 लोगों के सामने वो नाम डिस्क्लोज़ करना ठीक नहीं होगा , अकेले में तुम्हे जरुर बताऊंगा”। पड़ोस के लोग चिल्लाने लगे, सब पूछने लगे.. भाई कौन है वो इंसान? हमें भी बताओ”। मैन कहा “आज वो बड़ा आदमी है, कद में, उम्र में छोटा है पर बहुत होशियार है , शार्प है और बिज़ी भी ,उनसे पूछे बगैर बताना ठीक नहीं , माफ करीये।

किस्सा खत्म। मन घडंत कहानी खत्म।
दोस्तों… ऊपर लिखी पूरी दास्तान हकीकत नहीं ,ख़यालों में ही इसे मैंने बुना है। मैं सवाल पुछनेकी वहाँ हिम्मत जुटा नहीं पाया ..शायद मुझे लगा ..वो मेरा पर्सनल सवाल है..कमजोरी है ..हेल्प फेयर के फंडिंग से जुड़ा है..नहीं पूछ पाया और बेमन से हॉल से घर की ओर निकल पड़ा। नैनो चलाते वक़्त बस यही खयाल आ रहे थे।सोचा फिरसे जाते हैं और सवाल पूछ ही लेते हैं.. पर तब तक घर आ चुका था। फिर एक आईडिया क्लिक हुई.. मैंने सोचा पूछ नहीं पाया तो क्या हुआ , लिख तो सकताही हुँ,अपने मन के मुताबिक ..
सवाल भी मेरे ..उत्तर भी मेरे –

तो बस लिख दिया।

आनंद मल्हारा