Aapakee Najar Mein kya Hoti Hai Achchhee Paravarish?

Aapakee Najar Mein kya Hoti Hai Achchhee Paravarish?

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घर में नन्हा बालक आनेको है..और जीग्न्यासु दामाद पूछते हैं.. “पापा कुछ बताओना.. कुछ लिखोना… आपकी नजर में क्या होती है अच्छी परवरिश?”

बापरे, क्या लिखें? सोचने लगा…बच्चें हुए, देखते देखते बड़े हो गए। दिन ,साल कैसे बीते समझ नहीं आया,जो ठीक लगा करते गए..

पहली सुंदर बच्ची हुई..सब खुश थे।मैंने सोचा चलो बाप बन गए,एक काम पूरा हुआ..। पर घर में दो बच्चेतो चाहिए इस मान्यता से कुछ वर्षों बाद घर में दूसरा बच्चा आ गया।दूसरी भी बेटी होगी ये मानने हमारी श्रीमती कतई तैयार नहीं थी। बच्चे बदल गए कहकर डॉक्टर से जगड़ने लगी। एक लड़की के बाद भगवान लड़का ही देगा ऐसा उसका सरल , स्पष्ट मानना था।

खैर चलो दो लड़कियाँ ही सही मैं संतुष्ट था। सब ठीक चल रहा था पर बरसों से हमारे दिमाग में फिट हुए संस्कार बेगम साहिबा को कभी कभी विचलित कर देते थे, उनका मानना था लड़का तो चाहियेही, लड़का नहीं तो जीवन व्यर्थ। मैं प्यार से समझाता तीसरा बच्चा याने.. नो सरकारी नोकरी , इलेक्शन में भी खड़ा नहीं हो सकुंगा, तुम्हारा पति राष्ट्रपति नहीं बन पाएगा वगैरे वगैरे। पर वो मानने तैयार नहीं थी। और एक दिन डॉ.रवि मिले.. कहने लगे हमने भी तीसरा चांस लिया था,.. लड़का हुआ है..तुम भी एक चांस लो..। फिर क्या मैडम लग गई काम पर..अलग अलग नुस्खे अपनाने.. वैद्य की पूडियां या सिस्टर की दी डेट्स की टिप्स या दोस्त डॉ.सुनील की गोल गोल छोटी छोटी गोलियाँ ..। बहुत पापड़ बेलें। एक दो बार गलत काम भी किये पर अंत में 7 साल के अंतराल के बाद मैडम जीत गई ..लड़का हो गया। खैर तीन बच्चों की कहानी का सारांश यही है कि दोनों लड़कियां तो जवानी में हो गई, दोनों देखते देखते बड़ी हो गई.. मैं काम में, व्यसाय में मशगुल था और वे भी बड़ी हो रही थी, मालूम नहीं पड़ा। पर जब 7 साल के गैप के बाद, मेरी 40 साल की उम्र में तीसरा बच्चा हुआ तब हम उसका बड़ा होना देख सक रहे थे, उसकी खुशी ले पा रहे थे। उसे कंधों पर बिठाकर घूमने -घुमानेका ज्यादा वक़्त मिल रहा था। दोनों बेटियां भी उसकी देखभाल करने में मदत कर रही थी। भाई को एन्जॉय कर रही थी। तीन बच्चों को में कतई प्रमोट नहीं करूंगा पर हां तीसरे बच्चे को हमने एन्जॉय जरूर किया। थैंक यू डॉ रवि।

“सॉरी हार्दिकजी, लगता है विषय भटक गया है, फिरसे पॉइंट पर आते है…परवरिश पर। ”

सबसे पहले जरा सोचते हैं कि इस धरा पर या कहो अपने आंगन में बच्चे क्यों जन्म लेते हैं..?

मेरे दोस्त श्रीकांत भाई कहते हैं .. बच्चा हमारा है ..हमारा खून है, हमारी खुशी के लिए उसे लाया है,उसे हमारा काम संभालना है, बुढ़ापे का सहारा बनना है ।जो मैं उसकी भलाई के लिए सोचूंगा उसे वही करना है।

मेरी बीबी भी बच्चों को गुस्से में उल्टा पकड़ती और कहती … “याद रखों ..मैं तुम्हें जन्म दे सकती हूँ तो मैं तुम्हें मार भी सकती हूं।”

दोनों भी उनकी जगह सही है।
फिर मुझे पिताजी याद आते हैं..
जिन्होंने एक बार हम दोनोंको बगीचे में घूमते घूमते कहा था..बच्चें भगवान की हमें एक देन है, उसे अपने घर इसलिए भेजा है ताकि हम अच्छी देखभाल कर सकें, उसे एक अच्छा स्वस्थ्य बालक, युवक/युवती बना सके और उसे इतना सक्षम बनावे कि वो अपने पंखों से जीवन रथ पार कर सके। वह अपना नया विश्व निर्माण कर सके और कल को बेहतर बना सके।

बच्चों की बगैर आशा के परवरिश करना हर माँ बाप का फर्ज है और फिर वैसेही बच्चा अपने बच्चों की परवरिश करेगा।
मुझे यह सोच ज्यादा ठीक लगती है। ज्यादा सेफ लगती है। अपेक्षा नहीं तो दुःख भी नहीं, सिंपल।

तो सबसे पहले यह मानलें कि आने वाला बालक केवल बुढ़ापे का सहारा नहीं तो वह सृष्टि को सुंदर बनाने वाला एक देवदूत है।

अब आते हैं बालक के परवरिश पर.. हार्दिकजी मेरा स्पष्ट मानना है.. इस धरा पर पूरा सच कुछ नहीं है। सृष्टि के निर्माताने कुछ बायलॉज लिखीत स्वरूप में नहीं भेजे। केवल मृत्यु एकमात्र सत्य है। इसके अलावा
जो भी कोई कहता है..या तो उसका निजी अनुभव है या कही सुनी बातें हैं। मैं मेरे अनुभव शेयर कर रहा हूँ और कुछ नहीं। ठीक,सही, गलत का तुम्हें निर्णय लेना है।

मोस्ट इम्पोर्टेन्ट
बच्चों को गिरने दो..
गिरनेके और फिर खड़े होनेके अनगिनत बहाने दो..केवल जरूरत पड़ने पर सहारा दो,उपलब्धि पर शाबासी दो, पर उनकी बैसाखी कदापि न बनो।
हिम्मत रखो,भरोसा रखो बच्चे बहुत स्मार्ट होते हैं, सजग होते हैं, बहुत जल्द रास्ता ढूंढ लेते हैं, असंभव को संभव कर देते हैं।
जिससे तुम डरते हो विश्वास करो वो नहीं डरते। डर शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं होता।

4 वर्ष की आयु में मैंने तनय को तैरना सिखाया था तालाब में। पानी से खेलते खेलते वह तालाब में मेरे साथ दूर तक आ जाता था , डर नहीं था तब उसे। जब थोड़ा बड़ा हुआ तब किसीने उसे कह दिया.. पानी में साँप होते हैं, मगरमच्छ होते है, डॉल्फिन होती है…तो वह थोड़ा डरने लगा पानीसे । उम्र, और पढ़ाई के कारण उसका डर बढ़ा था।

5 वर्ष की आयु में मैंने उसे मलखम्ब सीखने भेजना शुरू किया, कारण था उसकी एक्टिवनेस .. हाइपर एक्टिव था वो। दिन भर उछल कूद करता था। उसकी एनर्जी को एक दिशा देना जरूरी लगा था तब। चैस सिखानेभी एक को बुलाना शुरू किया।

मेरी हरदम कोशिश रही बच्चों को ऐसी चीजें सिखाओ जो अलग है, बेसिक है, कम ग्लेमर वाली है। जो बच्चे के बॉडी को, उसके स्वभाव को,उसे परिवार से मिली जेनिटिक स्किल के करीब हो। बड़ी बेटी को स्पीच थेरेपिस्ट बनाया जो बड़ी कठिन, केयरिंग वाली फील्ड है, जिसमें बिल्कुल ग्लैमर नहीं था। छोटी को लिबरल आर्ट्स करवाया, पूरी नई सोच थी पर हां ..उनके स्वभाव के, पसंद के अनुरूप था।

बच्चों को पढ़ाई के साथ फिजिकल फिटनेस, मेन्टल शार्पनेस, और इंटरेस्ट के हिसाब से अलग अलग चीजे सिखाते रहा । बहुत एनर्जी होती है उनमें साथही ग्रासपिंग इंडेक्स बहुत हाय होता है। 12-13 साल तक बच्चे पूरी तरह से अपनी सुनते हैं, जो सिखाओगे सीखेंगे। बादमें उनके सोचनेकी क्षमता बढ़ती है तो वे तर्क करते हैं, आसानी से नहीं मानते।तब अपने संस्कार काम आते हैं।

हमने यह सिर्फ तनय के साथही नहीं दोनों बेटियों के साथ भी किया। उन्हें अलग अलग डान्स फॉर्म, अलग अलग कलाएं सिखाई। कम उम्र में दूसरे शहर भेजा कुछ नया सीखने। यह संभव हुआ हमारे दोनोंके प्रयास से और परिवार के सपोर्ट से।
मैं अलग सोच रखता था तो हमारी मैडम कसकर प्रैक्टिस लेती थी,मैं नया ढूंढता था तो वो फॉलोअप का काम कर लेती थी। जगड़े भी बहुत होते.. मैं कहता साईकल से भेजो एन्जॉय करेगा.. वो कहती नहीं गाडीसे भेजो.. वक़्त बचेगा। मैं कहता अकेले भेजो ..सीखेगा। वो कहती जमाना खराब है ..आदमी के साथ भेजो। मैंने तनय को 10 साल की उम्र में मुम्बई अकेले भेजनेका तय किया.. तो बीबी ने खुदकुशी करने की धमकी दी, की नहीं.. पर रात भर भगवान का जाप जरूर करती रही।

पर हम दोनों सही थे।

हाँ,एक और बात बच्चे जो घरमें, आसपड़ोस में अच्छा बुरा देखते हैं वो सब अनजाने में सीखते रहते हैं। जो हम करते हैं, जैसा करते हैं वह बच्चा सीखता रहता है। हमारे कर्मों का इम्प्रैशन उसपर बनते रहता है। घर के संस्कार बच्चों में वक़्त के साथ उतरते रहते हैं।

जब हम हमारे क्षेत्र में , समाज में कुछ अच्छा करते हैं,नया प्रयोग करते है उससे बच्चों को भी प्रेरणा मिलती है, उनका खुदका आत्मविश्वास बढ़ता है।

जब जब हम आपस में ज़गड़ा करते हैं, गलत बातें करते हैं, दूसरोंकी बुराइयां करते है. तो बच्चा टूटता है ,बेबस हो जाता है। जब हम बोलते कुछ है और करते कुछ और है तब उसका विश्वास डगमगाने लगता है। और सभी नकारात्मक , द्वेष भरी बातें उसे अपने लक्ष से विचलित करती है, उसे डिप्रेशन की और ले जाती है।

तनय से मैंने यह विषय छेड़ा तो उसने कहा पापा अपना परिवार एक अच्छा परिवार है पर एक अच्छी टीम नहीं है.. हरकोई अपनी बात पूरी शेयर नहीं करता, हर कोई अपने हाल में मस्त है, और शायद इसीलिए मैं भी सभी बातें शेयर नहीं कर पाता। घर में ऐसा वातावरण होना चाहिए की हर कोई अपनी बात रख सकें, उसे रिस्पेक्ट के साथ सुना जाए। पेरेंट्स पैरेंट के रोल में तो रहनेही चाहिए पर साथ में दोस्त बनकर भी रहना भी उतनाही जरूरी है।

हार्दिकजी, यह सच है मैं बच्चों का अच्छा दोस्त नहीं बन पाया ,शायद कारण यह भी होगा कि हम बच्चों की खेलकूद वाली लाइफ के बजाय उनके नाम , शोहरत , कामयाबी को ज्यादा महत्व देते होंगे , वही बातें ज्यादा करते होंगे जो शायद बच्चों को पसंद नहीं ।

पर विश्वास रहे मेरा निरंतर प्रयास जारी रहेगा उनका एक अच्छा जिगरी दोस्त बनने का।

आनंद मल्हारा