अंकल से नाना नहीं…
मैं तो फिरसे नटखट बच्चा बनना पसंद करूँगा।
दो दिन पहले ही हमारी बिटिया ने एक बालक को जन्म दिया। डॉ तुषारजी की , हम सबकी कोशिश थी नार्मल डिलीवरी हो … दर्द भी सहन किया बेटी ने… पर अंत में सेज़रिअन ही नसीब हुआ। शायद लगता है आज की लाइफ स्टाइल और लक्ज़री
सेज़रिअन प्रो हो गई है।
बच्चा दो दिन पहले जन्मा..
बेबी बॉय। दोनों परिवार के लोग अंदर से ज्यादा खुश थे आखिर लड़का जो हुआ है।
पर जैसेही सुंदर बरखुरदार ने माँ के पेट (जन्नत) से बाहर कदम रखा कि उसने हम सबके होश उड़ा दिए। उसकी नसीब में दो दिनका nicu (बच्चों का ICU) का टूर लिखा गया। उसे माँ से 48 घंटे दूर जाना पड़ा। कारण उसे सांस लेने मे थोड़ी तकलीफ होते दिखी थी ।
पर NICU की टूर मेरे हिसाब से काफी hi-fi होती है,..स्पेस शटल जैसे थी ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा.. कारण इसमें भी एक सभी सुविधाओं युक्त स्पेस शटल जैसा चैम्बर होता है ..जहाँ बच्चे को रखा जाता है, जो कि आजके हाईटेक , एडवांस्ड मेडिकल ट्रीटमेंट का अविभाज्य पार्ट सा लगता है।
मैं डॉ. तुषारजी, डॉ. अजयजी को मिला , उन्हें थैंक्स कहा , उनकी मेहनत से , उनकी केयरिंग से सब कुछ ok हुआ पर साथमें यह भी कहा कि जन्मतेही बच्चेको माइल्ड एन्टी बायोटिक लेना पड़ा इसका थोड़ा दुख हमेशा साथ रहेगा।
पर छोटा बालक 48 घंटों मे वहाँ से रुबाब के साथ बाहर आ गया। उसने वो मिशन सर कर लिया था। सांस की तकलीफ गायब हो गई थी। पर nicu के 48 घंटो के लाड़ प्यार ने उसकी थोड़ी आदत बिगाड़ दी..। उसे चम्मच से… बगैर मेहनत करे.. दूध पीने की आदत लग गई।
बाहर आकर उसने वही नखरे शुरू कर दिए, माँ के पास सोता लेकिन ब्रैस्ट फीडिंग के लिए नाटक करता। और चम्मच से मस्त दूध पी लेता।
माँ, दादी, नानी सब पीछे पड़े है उसके ताकि वो जल्द से जल्द ब्रैस्ट फीड लेना शुरू करदे। डॉक्टर ने भी कहा थोड़ा सख्त होना पड़ेगा। उसके रोने को थोड़ा अनदेखा करना पड़ेगा,कटोरी और चम्मच दूर रखना होगा और उसे ब्रैस्ट फीड के लिए मजबूर करना पड़ेगा।
सच कहूँ.. .जब हमारे बच्चे हुए, एक नहीं तीन..तीन.. तबभी डिलीवरी के वक़्त बीबी को होने वाला पेन , तकलीफ महसूस नहीं कर पाया जो अब बेटी के डिलीवरी के वक़्त महसूस कर रहा हूँ। तब डिलीवरी के दो महीने पहले बीबी मायके चली जाती और डिलीवरी होने के बाद ही हम बीबी को कम बच्चे को ज्यादा देखने जाते…।अब बेटी के डिलीवरी के वक़्त बेटी को देखते रहते है, उसे फील करने की कोशिश करते है,उसके दर्द,खुशी को समझते है.. उसे जीते हैं। और फिर उसके शरीर से जन्मे बालक को करीब से देखते है..अपने अंश को निहारते है।
उधर दोस्त लोग बधाई दे रहे थे, कोई मजाक भी कर रहा था… कह रहे थे कल अंकल थे अब नाना बन गए। सुनकर अच्छा भी लगता था। बेटी और दामाद बड़े हो गए, माँ बाप बन गए और हम फिरसे बच्चे। कहते है ना पोते पोतियों के आने के साथ दादा दादी , नाना नानी का बचपन लौट आता है।
चलो नाना के साथ नटखट बच्चे भी बन जाते हैं।


