जैन मुनियों के,
आचार्यों के प्रवचन
काश बिना माईक के सभी को
सुनने आने लग जाए तो
कितना अच्छा रहता।
जैन मुनि अक्सर अपनी साधु परंपरा , मान्यताओं के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं। अनेकों बार हमें लगता है रास्ते पर चलते वक़्त वे पैर में चप्पल डालें, प्रवचन के वक़्त माइक सिस्टम का इस्तेमाल करें या मुँह पर लगाई मुपत्ती( कपड़ा) न लगाएं, ताकि श्रावक उन्हें सुन सके , समज सकें।
बात है..संवत्सरी के दिन मैं प्रवचन सुनने और मित्रजनों से क्षमा याचना करने हमारे धार्मिकस्थल पर गया था। लेट था तो पीछे जगह मिली। जगह इतने पीछे थी कि वक्ताओं का, पूज्य साध्वी जीकी आवाज को मेरे कान सुन नहीं पा रहे थे। कभी उनकी सूरत देखकर तो कभी आँखे बंद करके उन्हें सुनने – समझने की कोशिश करता। सफलता नहीं मिलती तो फिर दिमाग कहीं और भटकने लग जाता।
तभी एक खयाल आया, याद आया दौलताबाद की गुफाओं में , अजंता की गुफाओं में या एमपी के मांडू में जो पुरातन
रंग भवन है,
कला भवन है या
सभागृह है,
जहाँ गायक अपनी गायकी पेश करते थे या कोई कलाकार अपनी कला पेश करता था जिसे राजा और उसके साथ सैकड़ों लोग उसे बगैर माईक के सुन पाते थे, उसका लुफ्त उठा पाते थे।
ऐसी व्यवस्था आज क्यों नहीं हो सकती?
यदि ऐसे धार्मिक स्थल बनने लगे गए तो दोनों उद्देश्य सफल हो जाएंगे.. आचार्यो के रूल भी नहीं टूटेंगे और श्रावकों को सुनने का लाभ भी मिलेगा। ऊपर से पर्यावरण को भी जो फायदा होगा वो बोनस।
मैंने घर आतेही मेरे बम्बई के आर्किटेक्ट दोस्त राजाध्यक्ष को फ़ोन लगाया । उसने भी माना कि पुराने धार्मिक स्थलों को ऐसा बनाना मुश्किल लगता है पर नए बनने वाले धार्मिक स्थलों के लिए ये संभव है। एकॉस्टिक सायंस के सहारे यह मुमकिन है। आवाज को हॉल के चारों और घुमाया जा सकता है। इसके विशेष कन्सल्टेंट होते हैं… जो आज ऑडिटोरियम , थिएटर , स्टूडियोज वगैरे के लिए काम करते हैं। आज वो टेक्नोलॉजी के सहारे इको को कम करने, आवाज की क्लैरिटी बढ़ाने का काम कर रहे हैं। और हम आवाज को.. इको के सहारे ज्यादा ट्रेवल कराकर हॉल में दूरतक पहुँचाने की सोच रहे हैं। पर साइन्स एक ही है, संभव है।
दोस्त ने यह भी कहा कि इन एक- दो दशकों में विश्व में इस प्रकार के जो प्रोजेक्ट बने है, जिसमें एकॉस्टिक सायंस का बेहतरीन उपयोग किया है,मैं उसकी जानकारी निकालकर तुझे भेजता हूँ।
मुझे इंतेज़ार है उसका, उस जानकारी का।
इस विवेचन का सार यही है…
जैन मुनि , जैन आचार्य बदले या न बदले पर जैन श्रावक जरूर ऐसे धार्मिक स्थल का निर्माण कर सकता है जहाँ हर कोई पूरा प्रवचन पीछे बैठ करभी सुन सकता है।
वैसे तो मुश्किल है ..
पर जैनियों के लिए कदापि नहीं।
यदि ऐसा एक भी धर्मस्थल बनता है तो फिर अनेकों धर्म के धर्म स्थलों के लिए यह एक रोलमॉडल बन जायेगा ऐसा मेरा मानना है।
आनंद मल्हारा


