kaash TC bhi Train mein Ticket upgrade karna shuru kar de

kaash TC bhi Train mein Ticket upgrade karna shuru kar de

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काश TC भी ट्रेन में
टिकट अपग्रेड करना शुरू कर दे।

वाक़या है पिछले सप्ताह का..
दादर स्टेशन पर देर रात अमृतसर एक्सप्रेस की राह देख रहा था। आजके लंबे- लंबे प्लेटफार्म और उसपर यदि कोच पोजीशन के इंडिकेटर खराब हो तो मुश्किल हो जाती है।
हर वक़्त की तरह कोच पोजीशन चेक कर रहा था कि हमारे प्रेमी दोस्त नंदू जी मिल गए।
हाय- हेलो के बाद कब आये, काम वगैरे पूछने के बाद उन्होंने पूछा “अरे कोनसी कोच में हो?” उतनी ही फुर्ती से मैंने कहा ‘बी-1 में’। कारण आज भी आधे वक़्त मैं स्लीपर क्लास में मजेसे सफर करता हूँ। बेटे तनय को आजभी स्लीपर क्लास अच्छा लगता है जबकि बीबी को स्लीपर क्लास में डर।

मुझे याद है मुम्बई के कॉलेज के दिन जब हम दीवाली और गर्मियों की छुट्टियों में 2- 2 महीने पहले कॉलेज के कन्सेशन फॉर्म दिखाकर टिकट बुक करते थे वो भी स्लीपर के नहीं तो सिटिंग के केवल 25 पैसे देकर। एखाद बार तो भुसावल मुम्बई पैसेंजर से भी पैसे बचाने लंबी सफर की थी।

कॉलेज के बाद जब बिज़नेस शुरू किया तब भी इसी अमृतसर गाड़ी से अक्सर सफर करता था। अनेकों बार रिजर्वेशन नहीं मिलता तो भी निकल पड़ते थे,उस वक़्त दो बर्थ के बीच में पेपर डाल उसपर सोना भी बहुत सकून देता था।

” कोच आगे ही आएगी” कहते आगे गए, इंडिकेटर खराब थे, समज नहीं आया, तो फिरसे प्लेटफार्म के पीछे की और गए, तब समज़ा बोगी तो आगे ही आएगी।
फिरसे आगे की और गए।

थैंक्स ट्राली-व्हील वाली बैगेज को..अभी बैग्स को उठाना नहीं पड़ता नहीं तो लंबे- लंबे प्लेटफार्म को चक्कर मारते नानी याद आ जाये।

नंदू सेठ बोले “अनंदभाई मेरे साथ चलो A -1 में , मेरे पास एक टिकट एक्स्ट्रा है”। संकोच भी था, मन दुविधा में था, पर जब उनके पिताजी ने भी आनेको कहा तो मैं मना नहीं कर पाया।

A1 में उनके पीछे पीछे चढ़ा। दुसरेके टिकट पर जा रहा था तो पीछे तो रहना ही था।
नंदू सेठ ने 18 नम्बर की बर्थ बताई जो थी साइड अप्पर। उनके तीनों टिकट अलग अलग जगह थे।दो मिनीट सोचता रहा ऊपर जाऊ या फिर अपनी B-1की 12 नम्बर की लोअर बर्थ पर।

सेकंड टायर AC में यदि साइड अप्पर या लोअर मिलती है तो मुझे बहुत निराशा होती है, लगता है पैसे वेस्ट हुए।

अच्छा नहीं लगेगा सोचकर ऊपर चढ़ गया,
बेंडिंग लगाया, सोने लगा और TC आया, टिकट पूछा, तो मैंने कहा दिया “वो पहले कम्पार्टमेंट में जो साब है उनके पास मेरा टिकट है”। वो चला गया। मैं सो गया।
रात 2 बजे वो वापस आया शायद सभी कोच चेक करके लौटा हो या फिर उसे कोई डाउट या कमाई नज़र आया हो.. फिर उठाकर पूछा “टिकट बताओ” तो मैंने कहा “अरे भाई मेरे मालिक आगे के कम्पार्टमेंट में है, उनके पास है मेरा टिकट”और क्या कहता खुद के पास तो टिकट नहीं था। यह सुनकर तो वो शेर हो गया सोचा होगा नोकर आदमी है ,बोला “तुम खुद चलो और बताओ”। मजबूरन मैं नीचे उतरा..अंकल जी के पास गया तो उन्होंने मोबाइल मैं टिकट चेक किया और फिर बोले टिकट नंदू के पास है और वो 12 नम्बर पर है। फिर 12 नम्बर पर गए। नंदू सेठ को उठाया, वे उठे …टाइम पर नज़र गई तो ज़ल्ला गए, TC को बोले “आधी रात को उठाते हो” वगैरे वगैरे, मेरा टिकट पूछा तो बोले “रात को बोला था ना”, पर वो अड़ा रहा, अंत में मुझे मेरे B -1 का टिकट दिखाना पड़ा , देखने के बाद TC बोला ” ठीक है, डिफरन्स के पैसे भरो” तो मैं बोल नहीं पाया रेल का सॉफ्टवेयर तो टिकट अपग्रेड करता है आपको क्या तकलीफ है, बर्थ खाली तो है। मैंने नंदू की ओर देखते TC को कहा “जानेदो मैं मेरी ओरिजिनल बर्थ पर लौट जाता हूँ”। मैं समान ले निकल पड़ा।

कोचेस जुड़ी होनेसे B-1 में पहुंचा और मेरीवाली 12 नम्बर की लोअर बर्थ पर गया, वो इन्तेजार कर रही थी मेरा। उसपर सो गया। आधे घंटे तक तो नींद नहीं आई, वही विचार आ रहे थे। फिर नींद आ गई।

सुबह गाड़ी से उतरा और अपनी धुन में घर निकल पड़ा। फ्रेश हो आफिस पहुंचा। फ़ोन की घंटी बजी, नंदू सेठ थे, कहने लगे “सॉरी यार मेरी वजह से तुम्हें तकलीफ हुई, और रात को तुम्हे दूसरे बोगी में जाना पड़ा”।
मैंने कहा” सॉरी किस बात की, हमने तो अच्छा ही सोच था, अच्छा इंटेंशन था ” वगैरे वगैरे। “पर नंदू सेठ मुझे बताओ.. हम गलत कहाँ थे”? तो नंदू सेठ बोले “यह सही था हमारे पास 3 टिकट थे , पर उसमें से 2 टिकट पिताजी के ही नाम के थे जो सीनियर सिटीजन है।

अच्छा लगा सुनकर .. भलेही “बीबी” बाल उड़ जाने के कारण बूढा बोलती हो पर हम बूढ़े दिखते नहीं।

क्रमशः..

आनंद मल्हारा