जलगांव की चैतन्यमयी “छठ पूजा”.. और हमारी बेचारी “बेनी”।
हम सच में किस्मत वाले हैं जो लेक के सामने, मंदिर के करीब और तालाब के किनारे बने नये गणेश घाट के पड़ोस में रहते हैं।
इसलिए दशहरा कहो या गणेशजी का विसर्जन,दुर्गा देवी का विसर्जन हो या नवरात्रि के नौ दिन… हमारे घर के सामने जश्न होता है,उत्सव होता है।
दशहरे के रावण दहन का फायर वर्क को देखने हजारों लोग शामको आते हैं और रावण जलते ही चले जातें हैं। गणेश विसर्जन, देवी विसर्जन तो रात भर चलता रहता है, ढोल ताशे, लेज़ीम, डीजे आदि की आतिशबाजी होती है। परिसर उत्साह से भर जाता है और दूसरे दिन फिरसे सब शांत हो जाता है।
नवरात्रि के नौ दिन तो सुबह चार बजे से मंदिर में देवी के भजन या पिक्चर के गानों की धुन पर देवी के गानों की बरसात होती रहती है। बीच बीच में ढोल भी पिटे जातें हैं जब किसी भक्त भगिनी के शरीर में देवी प्रकट होती है।
उस आवाज से, जोर आवाज में बजते वही भजनों से अनेकों बार सर दर्द होने लगता है। नींद की तो बैंडबाजा बज जाती है। मुझे याद है उन दिनों के आसपास ही 10 वी , 12 वी की परीक्षाएं भी होती है , बच्चों को उस आवाज का, उन गानों की जगजाहिर तकलीफ होती है। उन दिनों मंदिर में जाकर आवाज कम करवाना या कभी कभी तो पोलिस में भी शिकायत करना हम पड़ोसियों का नित्य कर्म बन जाता है।
अब एक नया उत्सव यहाँ सम्पन्न होना शुरू हुआ है। करीब पिछले 4 -5 सालों से बड़े जोर शोर से उसे मनाया जाने लगा है जिनका नाम है “छठ की पूजा” ।
पूरे रास्ते पर लाइटिंग की जाती है। घाट पर भी लाइटिंग लगती है, टेंट लगता है, स्टेज सजता है, साउंड सिस्टम लगती है। सही मायनों में “गणेश घाट” परिसर सजता है
“छठ पूजा” की रात को। उत्तर प्रदेश के हमारे भाई, बहन, माताओं की यहाँ जमघट लगता है, घाट पर पूरी आस्था के साथ पूजा होती है, तालाब में दिये आदि छोड़े जाते हैं।
और जैसे रात होती है स्टेज पर भजन मंडली अपना रंग जमाने लग जाती है। शायद भजन के लिए , छठ के कार्यक्रम में रंग भरने दूर शहर से कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है। उनका जोशभी मानना पड़ेगा करीब रातभर भजन तथा गानें चलते रहते हैं, कभी हिंदी तो कभी भोजपुरी। मध्य रात्रि में आवाज कम की जाती है पर सुबह फिरसे कलाकार अपने रंग में आ जाते हैं, स्पीकर शुरू हो जाते है।
उत्सव की शुरुआत में धूम धड़ाके से आतिशबाजी की जाती है। इस बार तो करीब 2 घंटे चली और उतनेही जोश से फिर सुबह 5 बजे से बच्चों द्वारा फटाके फोड़े जातें हैं.. नॉन स्टॉप करीब डेढ़ घंटा । घर तक उसका धुंआ पहुंच जाता है। तालाब के पानी के ऊपर भी धुआँ धुंद जैसा छा जाता है। इतने शोरगुल में नींद तो नदारद होती ही है पर…
घर में पाला हुआ कुत्ता “बेनी” शोर,फटाकों की आवाज के डर के मारे शाम से ही बगीचे से भाग कर ऊपर बाथरूम में छुप जाता है। उसकी धड़कन बढ़ जाती है, शरीर कप कंपाने लग जाता है। हम भी समझते हैं फटाकों की या कोई भी बड़ी आवाज से उन्हें कितनी तकलीफ होती है।
पर सुबह जब उठकर हम देखतें हैं ..तो पातें हैं.. उसने किचन में “शीट” की हुई थी। शायद पटाख़ों का खोंफ उसे इतना ज्यादा हुआ होगा कि उसे घर में ही शीट हो गई.. जैसे इंसानों के साथ डर के मारे या मार की खोंफ से या हाई डिग्री की यातना देनेसे होता है।
और हाँ , हम जब टेरेस से रावण दहन में हो रही मन मोहक आतिशबाजी मनोरंजन के लिए देखते हैं उसी वक़्त आजु बाजू के घने पेड़ों पर रहते , पानी में तैरते पंछियों के जत्थे के जत्थे पटाख़ों की एक एक आवाज से तीतर बितर हो जाते हैं, डरकर इधर से उधर , उधर से इधर बेबस भागते उड़ते दिखते हैं। मालूम नहीं उनके साथ उसवक्त क्या गुजरती होगी।
हमारे घर इस दीवाली में 5-6 वर्षों के बाद बेटे “तनय” ने 500 रुपये के पटाखे बड़े शौख से खरीद के तो लाये पर उसे फोड़नेकी हिम्मत नहीं जुटा पाया। पूरे पटाखें यहीं छोड़ मुम्बई चला गया।
मानना पड़ेगा “नेचर इज बेस्ट टीचर”।


