तब जन्नत था “कूपे ”
और
आज जैसे ‘जेल’।
फिरसे ट्रैन में हूँ, गीतांजलि से संबलपुर ,उड़ीसा के क्लाइंट ‘अनुराग बाबू’ के यहाँ दूसरी बार मार्गस्त हूँ।
साथमें ‘मनोज’ क्रिएटिव डायरेक्टर भी है।
क्लाइंट ने ही टिकट बुक किये थे। हो सकता है थर्ड एसी के मिले नहीं होंगे तो सेकंड एसी के करवाये होंगे। या फिर पिछली बार सेकंड ऐसी के मिले नहीं होंगे तो थर्ड ऐसी के किये होंगे। खैर, कोई भी क्लास में जाओ मुझे मज़ा आता है और कम्फर्ट फील करता हूँ।
ट्रैन में चढ़े … शायद आखिरी नंबर थे 49 और 50 । लास्ट कम्पार्टमेंट था जो था आधा और साइड में पड़दा। मानेकी वहाँ चार नहीं केवल दो ही बर्थ थी।
मनोज बोला कहाँ आ गए , छोटा कम्पार्टमेंट, ऊपर से अंधेरा। टीसी को बर्थ बदलने को कहेंगे। मैंने सर हिलाया। फिर हमने एक प्रोजेक्ट पर बात की और वो उसपर काम करने लग गया और मैं पुराने खयालों में खो गया।
छोटा कम्पार्टमेंट को देख मुझे याद आयी मेरी शादी… शादी के बाद का उदयपुर से जलगाव तक का भीड़ भद्दक्का वाला ट्रैन सफर और उसकी प्लानिंग।
प्लानिंग के साथ याद आता है मेरा खास हम उम्र दोस्त ‘देवेंद्र’ जो आज हमारे बीच नहीं रहा। इंदौर से था, खुशमिज़ाज़, शौकीन और बहुत केयरिंग। उसने शादी में बहुत काम संभाला था। शादी उदयपुर के करीब कानोड़ गांव में थी। जब हम ट्रैन के टिकट्स बुक करवा रहे थे तो उसने कहा “आनंद, तेरा और भाभी का रिटर्न टिकट ‘कूपे’ में ही करवाएँगे, मेरे दोस्त बलविंदर ने भी हनीमून को जाते वक्त ‘कूपे’ में ही रिजर्वेशन करवाया था”।
मैंने पूछा “क्या है भाई ये कूपे”? उसने कहा “कुछ खास ट्रेनों में जस्ट मैरिड कपल के लिए फर्स्ट क्लास में एक कूपे कम्पार्टमेंट होता है जिसमें केवल दो ही बर्थ होती है..स्लाइडिंग दरवाजा होता है.. नो डिस्टर्बेंस.. पर बहुत एडवांस में बुक करना पड़ता है”। वगैरे वगैरे।
अभी भी याद है.. वो सुनकर मेरे मन में गुदगुदी हो रही थी। बस फाइनल हो गया वहीं करेंगें। ‘कूपे’ में ही रिजर्वेशन करेंगे। पैसे लगे तो लगे। मेरी शादी में मैं ही डिसिजन मेकर था तो किसीको पूछने की तब ज्यादा जरूरत नहीं थी।
आज इस आधे कम्पार्टमेंट कूपे की प्रतिकृति को देख यह सब याद आ गया। जिस टाइप के कम्पार्टमेंट के लिए 3 -4 महीने पहले बुकिंग करना, एक सपना सा होता था और आज वैसाही कम्पार्टमेंट हम बदलने की सोच रहे थे। तब दिल प्राइवेसी चाहता था तो आज वही प्राइवेसी हमें वीरानी लगती है।
वक़्त वक़्त की बात है। सोचता हूँ आज यदि ‘मनोज’ की जगह ‘बीबी’ ही साथ होती तो क्या करते? क्या 24 घंटो का सफर केवल एक दूसरे के साथ हंसते खेलते पूरा कर पाते? या आधा हंसते और आधा ज़गड़ते? या दोनों में से कोई एक मस्त सो जाता और दूसरा कुछ पढ़ते लिखते रखवाली करता ।
तब भी… बदकिस्मती से उस गाड़ी में कूपे नहीं था… तो वो कूपे वाली इच्छा अपुरी रह गई और आज 30 वर्षों बाद वैसा कम्पार्टमेंट है तो साथ में बीबी नहीं ।
आनंद मल्हारा


