kal mainne jaanee “Pocket Telephone Diary” kee kimat kya hoti hai.

kal mainne jaanee “Pocket Telephone Diary” kee kimat kya hoti hai.

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कल मैंने जानी “पॉकेट टेलीफोन डायरी” की कीमत क्या होती है।

पर्स में छोटी टेलीफोन डायरी भी उतनी ही ज़रूरी होती है जितना आधार कार्ड, डेबिट/क्रेडिट कार्ड हो या ड्राइविंग लाइसेंस का होना।

जी हाँ, अपनी पुरानी छोटी वाली पतली पॉकेट टेलीफोन डायरी बहुत जरूरी लगती है आज के डिजिटल, मोबाइल के जमाने में भी। सफर में तो वह बहुत अनिवार्य हो जाती है।

इसका अनुभव आया कल जब हम संबलपुर में थे। काम समझते समझते रात हो गई थी, क्लाइंट ने हमें कारसे गेस्ट हाउस जो 10 KM दूरी पर था वहाँ छोड़ा। फ्रेश होने के बाद बिस्तर पर बैठे और हमारे हाथ मोबाइल से खेलने लगे। मैं मैसेजेस चेक करने लगा। मेरा जोड़ीदार मनोज भी अपना मोबाइल ढूंढ रहा था, शायद मिला नहीं इसलिए पूछने लगा “मेरा मोबाइल आपके पास है क्या”? मैन कहा “देख यहीं कहीं रखा होगा, बाथरूम में देख, जेब चेक कर”
वगैरे वगैरे ।पर मोबाइल कुछ मिल नहीं रहा था। पूरी जाँच करने के बाद समज़ा मोबाइल कार में ही छूट गया , हमने क्लाइंट को फ़ोन कर कन्फर्म कर लिया। रिलैक्स हो गए कि चलो मोबाइल मिल गया,हमारे नये जमाने की लाइफ लाइन सेफ है वगैरे और आराम से सो गए।

दूसरे दिन हमारे क्लाइंट का सुबह सुबह फ़ोन आया, कब मिलना वगैरे तय हुआ और उन्होंने कहा “मोबाइल पर घर से फ़ोन आये थे , मनोज को घर कॉल करने बोल देना”। मैंने मनोज को बोला “ले मोबाइल और घर पर फ़ोन कर दे, घर से फ़ोन आये थे , याद कर रहे हैं “। उसने फ़ोन लिया नहीं, तो मैंने फिरसे फोन करने का कहा तो वो बोला ” मोबाइल नंबर याद किसको है? बड़ा प्रॉब्लम है। पुराना घर का लैंडलाइन नंबर और बीबी का पहला मोबाइल नंबर तो याद है पर अभी का नया बदला हुआ नंबर याद नहीं है और लैंडलाइन तो बंद कर चुके हैं….।

हम दोनों जोर से हँसने लगे। कुछ वक्त तक हँसते रहे।

फिर जल्द तैयार हो गए और मीटिंग के लिए निकल पड़े, हमारे बेचलर क्लाइंट अनुराग बाबू भी आ गए, सबसे पहले उन्होंने मोबाइल हैंड ओवर किया और पूछा “मनोज बाबू घर पर बात हो गई ना”?
वहीँ पर कॉलेज की pro मैडम भी साथ खड़ी थी।
तो मैंने जानबूझ कर नंबर याद न होने का वो किस्सा शेयर किया।
सभी जोर जोर से हँसने लग गए। मैडम भी बोल उठी “वेरी ट्रू”।

हँसने के बाद मैंने सीरियस नोट मे कहा “यह हकीकत है आज हमारी,हम अनेकों की। मनोज ही नहीं सचमें मुझेभी आज बीबी का नंबर याद नहीं है। बीबी का ही नहीं मुझे न मेरे बेटे का नंबर याद है ना बेटी का। ना फैक्ट्री का न किसी महत्व पूर्ण व्यक्ति का। हाँ मोबाइल में हजारों नंबर है, सैकड़ों ग्रुप्स है। इसलिए याद कुछ नहीं।

यदि मोबाइल गुम जाता है तो क्या करेंगे? और वो भी बाहर गांव, सफर में गुम होता है तो ? तो अल्ला, जीसस ही मालिक है।

आज मैंने सोचा लिया है, पर्स में एक छोटी फ़ोन डायरी रखुँगा, सभी imp 50 -100 नंबर उसमें फीड करूँगा, मालूम नहीं कब जरूरत पड़ जाए। इतनाही नहीं मेरे दोस्तों को भी वो छोटी फ़ोन डायरी भेंट करूँगा। प्रिंटिंग प्रेस घरकी जो है।

एक और मजेदार बात … पिछली पोस्ट में मैन जाते वक्त का सेकंड ऐसी का किस्सा शेयर किया था और यह भी लिखा था कोई भी क्लास हो मैं एन्जॉय करता हूँ और ऊपर वाले ने सुन ली । आते वक्त न थर्ड ऐसी का मिला ना सेकंड ऐसी का और नाही फर्स्ट ऐसी का। मिला तो स्लीपर क्लास का रिजर्वेशन।अनुराग बाबू को बहुत शर्मिंदगी या बुरा फील हो रहा था, मनोज के चेहरे पर भी परेशानी झलक रही थी। मैंने अनुराग बाबू को कहा “नो प्रॉब्लम” पर प्लीज ओढ़ने की चद्दर साथ दे देना, हमने लायी नहीं है”।

उन्होंने घर से चद्दर भेजी वगैरे पर मुझे लगता है ट्रेवल बैग में एक शाल या पतली चद्दर भी बहुत जरूरी है। हाँ टॉवल भी । आज लोगोंका स्टैण्डर्ड सुधर रहा है तो बैग से ये दोनों आइटम बहुत बार गायब हो जातें हैं। रहे तो ज्यादा अच्छा यह मेरा अनुभव कहता है।

आनंद मल्हारा,
age 56
14 दिसंबर 2019