रविवार को हरा दिया
आज के रविवार ने।
रविवार का रुबाब रुतबा सालों दर साल साल, महीना दर महीना, सप्ताह दर सप्ताह रविवार का रुबाब , रुतबा हर किसी के लिए वही था,राजा हो या रंक हर किसे उसका इन्तजार होता था। शुक्रवार से या शनिवार से ही उसके आने की सुखद आहट शुरू हो जाती थी। और रविवार भी सबकी थकान, टेंशन, परेशानी को किसी हद तक कम करने का बरगस कोशिश करता था।
पर आज सुबह जब आराम से उठकर रोज के बखेड़ों से बेखबर होकर चाय पीने बैठे तो दिन की याद ही नहीं आई। चाय पीते पीते दिन का जीक्र आया तो श्रीमतीजी ने “रविवार” बताया।
“रविवार?” मैंने चौक कर कहा, पर आज का दिन तो पीछे गए हर रविवार से ज्यादा रिलैक्सिंग, फ्री है । क्या सचमुच “रविवार” से ज्यादा सुखद दिन भी कोई हो सकता है?
हो सकता है.. जैसे आज का दिन।
कहते हैं ना किसी की मोनोपोली ज्यादा नहीं चलती, सेर को सवा सेर मिलता ही है, रिकॉर्ड टूटते हैं, नए बनते हैं।
हो गया होगा ना रविवार अब परेशान, जिसने अनेकों की परेशानी, उनका टेंशन कम करने का जिम्मा जो लिया था।
पर लाइफ है ब्यूटीफुल!
आनंद मल्हार a
२९ march २०२०


