Khounf Jain Muniyon Ka, unki kathin jiwan pranli Ka.

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खौंफ

हमारे जैन मुनियों का..

उनके कठिन साधु जीवन प्रणाली का…

कल की बात है ,सुबह के साढ़े छह बजे थे। हम दोनों मिया बीबी घर के बरामदे में चाय का लुफ्त उठा रहे थे। वैसे तो चाय रोज ही पीते हैं, पर कल उसका लुफ्त उठा रहे थे… कारण भी था… सुबह के योगा क्लास को “कोरोना” के कारण छुट्टी जो मिली थी।

सुबह बिस्तर से उठे भी लेट जबकि शरीर समय पर जग गया था, बीबी बोली आज योगा नहीं है, चलो घूमने जाते है.. मैंने नींद में ही कहा soooo जाओ, लगेतो सोते सोते योगा कर लो। कुछ भी कहो मनुष्य प्राणी है तो आलसी ही। दोनों ने मुक समर्थन दे दिया “योगा” की उस कल्पना को, थोड़ा योगा हुआ और फीर शवासन के नाम आधा घंटा और आराम कर लिया।

हां.. तो बात चल रही थी चाय के चुस्की की…बाहर थोड़ा अंधेरा ही था, चाय की चुस्की लेते लेते मेरा ध्यान गेट की तरफ गया, देखता क्या तो “मारासाब ” आते दिखाई दिए।

मारासाब अर्थात जैन मुनि जो अपने खाने के पदार्थ भिक्षा स्वरूप इक्कठा करने जाते है अलग अलग घर। ज्यादा तर वे सुबह ही आते हैं।

जैसे ही मैंने उनकी झलक देखी मैंने बीबी को बताया और जैसे ही बीबी ने वो सुना लगा जैसे उसे भी झटका लगा हो, भागकर किचन की और गई। और मैंने हमारे दोनों के चाय के आधे भरे कप तपाक से उठा कर दूर पड़े टेबल पर रख दिए ताकि वो दिखे नहीं। क्यों छिपाए मालूम नहीं पर शायद वो एक आदर पूर्वक खौंफ था उनका मेरे लिए।

उधर मेमसाब भी किचन में फटाफट कुछ चीजे समेट रही थी और कुछ साफसफाई। गैस बंद किया। डायनिंग टेबल पर पड़ी हरी सब्जियां ,कच्ची कैरी उठा ली, किसमिस उठा ली, और टेबल पर घी , शक्कर, दूध,केले और कुछ ड्रायफ्रूट रख दिए। जिसे जैन टर्मिनोलॉजी में अन सुस्था को सूस्था करना कहते हैं।

फिर भी मुझे हमारी “बेनी” का डर सता रहा था क्योंकि वो भोंक रही थी।

बीबी अंदर का काम क्षणों में निपटाकर भागते – हांपते बाहर आती है ताकि वो मारा साब का स्वागत कर सकें, उन्हें मानवंदना दे सकें।

हम दोनों झांककर देखते है, बीबी दरवाजे से और मैं दूर की खिड़की से..और पाते है जिसे हम “मारासाब” समझ रहे थे वो थी सफेद कपड़ों में एक महिला योग साधक जो मुंह पर मास्क याने कपड़ा बांधकर योगा क्लास के लिए आई थी और क्लास बंद देखकर वापस अपनी गाड़ी की ओर जा रही थी।

हम दोनों जोर से हंस पड़े, साथ ही दोनों का बढ़ा बीपी भी नॉर्मल हुआ। बीबी ने श्रीमती कांकलिया मैडम जो सचमुच में काफी धार्मिक प्रवृत्ति की है, को चाय पीने आमंत्रित किया , उन्होंने “फिर कभी” कहा, मैंने कहा

“आप मुझे मारासाब दिख रहे थे।” सुनकर शायद उन्हें गर्व अनुभव हुआ होगा पर वे भी हंसने लग गई।

सवाल चाय का, अंधेरे में कम दिखने से हुई गलत फहमी का नहीं पर उस खौंफ का है जो मेरे ऊपर हमारे जैन साधुओं का है। खौंफ उनके ज्ञान का, उनके प्रभाव तो ठीक है, पर उनकी सादगी का, उनके आहार – विहार के कठिन नियमों का है जो आजतक मुझे समझ नहीं आए।

वे भिक्षा में क्या लेते है- क्या नहीं लेते, क्यों लेते है – क्यों नहीं लेते, कब लेते है – कब नहीं लेते, किसके हाथों से लेते हैं -किसके हाथों से नहीं लेते, मेरे लिए आज भी एक मिस्ट्री है।और इसीलिए मैं अक्सर इधर उधर छुपता रहा जब जब मारासाब घर आए। डर इसलिए भी ज्यादा बना रहा कि अनेकों बार वे घर आए पर ज्यादातर वे बिना कुछ लिए जाते दिखे। क्योंकि हर वक्त कुछ गलत हो जाता उनके हिसाब से। हर साल अलग अलग जैन मुनि आते और हरेक के कानून कायदे भी अलग अलग दिखते। मुझे याद है बचपन में एक बार घर आई जैन साध्वी के स्वागत में उनके पैर क्या छू लिए , जैसे कोई बड़ा गुनाह कर दिया ऐसा एहसास करवाया गया घर पर मुझे। शायद इसलिए डर और भी बढ़ गया।

डर में भी मज़ा है और इसीलिए

लाइफ है ब्यूटीफुल।

आनंद मल्हारआ,

22 मार्च 2020