Sorry for late posting …20 दिन देरी से इस पोस्ट को शेयर करने के लिए क्षमा प्रार्थी।

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45 वर्ष से कम और 16 वर्ष से ज्यादा उम्र के लिए विशेष।

देरी का मतलब है कि मुझे यह आर्टिकल कब से लिखना था पर इस लॉक डाउनलोड और ज्यादा आराम के कारण खुदका जोश कम हो गया। आराम ने मुझे थका दिया, शरीर को भारीपन जो दे दिया।

गर्मी – पसीना… मानेकी अप्रैल-मई का महीना। हिल स्टेशन पर जाने का महीना। 43* से 48* तक के टेंपरेचर को फील करने का महीना। कम कपड़े पहनने का महीना। तालाब में मस्त तैरने का महीना..

ठंडी ठंडी सुहानी हवा में टेरेस पर सोने का महीना। मच्छरदानी यूज करने का महीना और साल भर खुद को

‘फिट n फाइन’ रखने के लिए कड़ी धूप में वॉर्मअप करने का महीना।

मैं एक शिक्षक का बेटा, मिडिल क्लास पर मजेदार जीवन था, मजेदार आज भी है। सभी परिस्थितियों से गुजरे जिसे अक्सर एक मिडिल क्लास को गुजरना पड़ता है। याद नहीं हमारे स्कूल के वक्त घर में सीलिंग फैन था या नहीं, हॉल में लकड़ी का मालोचा था तो शायद ही सीलिंग फैन लगा हो, हां एखाद दीवार पर लगने वाला वॉल पंखा जरूर होगा जो पिताजी के रूम में लगा होगा। इसलिए जब 16 साल की उम्र में मुंबई पढ़ने गया था तब पहली रात जे जे हॉस्टल के जिमखाना हॉल में सोना पड़ा था और सुबह जब उठा तो शरीर अकड़ रहा था.. शरीर भारी फील हो रहा था.. कारण था मैं सीलिंग फैन के नीचे जो सोया था। उस आर्टिफिशियल एक जैसी फैन की हवा ने शरीर की नॉर्मल केमिस्ट्री को हिला दिया था। खैर बादमें धीरे-धीरे की आदत हो गई पंखे के नीचे सोनेकी।

अप्रैल मई का महीना आया कि मैं मेरी दो पसंदीदा एक्टिविटी शुरू कर देता हूं, उसे एंजॉय करता हूं। एक..दोपहर की कड़ी धूप में बाहर एक चक्कर लगा लेता हूं.. किसी ग्राहक के यहां या किसी और काम से शहर का चक्कर लगाकर आ जाता हुं। ऑफकोर्स रुमाल लगा कर जाता हूं। मेरा खुद का खुद के लिए मानना है कि इस एक्टिविटी से मेरी इम्यूनिटी सिस्टम साल भर के लिए अपडेट हो जाती है,

मेरा मानना है कि प्रकृति ने जैसा मौसम दिया है, उससे दूर भागने की बजाय उसे जीना जरूरी है। मेरे खुले खुले ऑफिस में ए सी अभी तक लग नहीं पाया तो ऊपर वाला तर्क मन को बहला देता है।

दूसरी एक्टिविटी है.. टेरेस पर रात को सोने की.. जो दिन भर की गर्मी से परेशान शरीर को सुखद अनुभूति देती है।

मैं टेरेस पर सोना शुरू करता हूं अप्रैल की शुरूवात से जब शहर का तापमान 4० डिग्री सेंटीग्रेड पहुंचा होता है। शुरु-शुरु में मच्छरदानी लगानी पड़ती है कारण छत पर भी मच्छर रहते हैं। टेरेस की हवा को ठंडा होने के लिए रात के 11:12 बज जाते हैं, पर बाद में रात को मौसम ठंडा हो जाता है और अच्छी नींद आ जाती है। धीरे-धीरे टेंपरेचर बढ़ते जाता है। मई तक तापमान 44 तक पहुंचता है, मच्छर कम हो जाते हैं। 45,46 * के तापमान में तो मच्छरदानी की जरूरत ही नहीं होती, मच्छर गायब हो जाते है उस तापमान में। पर रात और सुहानी हो जाती है। 8 बजे गादी बिछाओ, करीब 10 बजे के आसपास वो ठंडी हो जाती है, मौसम भी ठंडा हो जाता है ,रातभर ठंडी ठंडी हवा के झोंके आते रहते हैं। नींद भी अच्छी आती है। सुबह 6 बजे तक आंख खुलती है।

घर में दूसरें तो नहीं पर बीवी पिछले 15 दिनों से टेरेस पर ही सो रही है और कहती है.. ए सी बेडरूम से ऊपर चतपर ज्यादा अच्छी नींद आती है।

बेटे तनय को एक बार ऊपर सुलाने राजी किया। उसे मच्छरदानी में सुलाया। उसे अच्छा लगा। दूसरे दिन उसी ने मच्छरदानी लगाई पर वह ठीक से नहीं लगी और कुछ मच्छर रात मच्छरदानी में घुस गए और तनय रात भर ठीक से सो नहीं पाया। उसे कारण समझाया.. पर बच्चे हैं.. नीचे पंखे में, एसी रूम में या कूलर का सहारा लेकर सोना पसंद करते है, छत पर नहीं।

मेरी आपसे विनती है आपके बच्चों को एक बार टेरेस पर जरूर सुलाओ। आप भी सोइए । यदि मच्छरदानी है तो वह भी लगाओ। यदि बच्चों को इसका फायदा और मजा समझ में आ गया तो हो सकता है हर गर्मी में वे इस सुख की अनुभूति को जन्म भर ले सकेंगे, ए सी, कूलर को बाय कर पाएंगे। । टेरेस पर गंदा पड़ा होगा तो उसे साफ कर लो। पर एक बार जरूर ट्राय करो। मटके का ठंडा पानी पीने की अनुभूति देंगी छत की नींद।

अभी केवल 10 – 15 दिन बाकी है बारिश आने में। देर मत करें…बारिश आ जाएगी और फिर ना चाहने पर भी सब को रूम में ही सोना है।

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आनंद मल्हारa

29 th May 2020