Learnings from Online workshop

  • 194 Views

लॉक डाउन में ली वर्क्शाप ने सिखाई 5 बातें

*

वाट्सएप पर , मेल बॉक्स में आए दिन ऑनलाइन ट्रेनिंग , वेबिनार आदि की पोस्ट देखता था। सोचा चलो हम भी कुछ ऑनलाइन करते हैं। लॉक डाउन में घर पर बैठे बैठे कुछ तो नया करते हैं.. कुछ नया सिखते है… टेक्नोलॉजी के साथ कुछ खेलते हैं कारण कल की वो जरूरत बनेगी मेरे लिए, आपके लिए, हम सभी के लिए।

“संभाषण कला” सिखनेकी की ऑनलाइन ट्रेनिंग की एक पोस्ट देखी तो मैंने भी सोचा कि हम भी कुछ नॉलेज शेयर करेंगे। पहले सोचा चलो “क्रिएटिविटीकी”, “आइडिएशनकी” ही क्लास लेते हैं, पर उसके लिए हमारे एक क्रिएटिव डायरेक्टर कि जरूरत थी। और उसने कोरोना को काफी सीरियस लिया था , मालूम नहीं वो कितना उत्सुक रहेगा इसके लिए…, इन दिनों उसका फोन भी नहीं था तो फिर घर के बच्चे सामने आ गए। कोई भी नया काम घर के बच्चों के साथ करना आसान हो जाता है, कारण उन्हें पैसे देने नहीं होते।

“तनय” को पूछा “ऑनलाइन “डांस” सिखाएगा क्या?” इंटरेस्ट कम दिखा, वैसेभी लड़के मना ज्यादा करते है और सुनते कम हैं। फिर “तनवी” को पूछा जो “रेडियो जॉकी” रह चुकी थी और अलग अलग कॉलेज, स्कूल जाकर बच्चों को रेडियो जॉकी के बारे में बताती थी और बच्चे बड़े चाव से उसे सुनते थे। उसने

“हां ” भर दी ऑनलाइन वर्कशॉप के लिए।

फिर क्या… काम शुरू कर दिया, “ऑनलाइन वर्कशॉप ऑन रेडियो जोकिंग एंड पब्लिक स्पीकिंग” नाम रखा और अलग अलग क्रिएटिव पोस्ट बनाकर वाट्सएप , फेसबुक, इंस्टग्राम पर वायरल किए। कुछ विडियोज बनाकर भी डाले। दोनों बच्चों के फैन फॉलोअर्स काफी होने से दिक्कत नहीं आई। कुछ “पोस्ट” को पैसों के सहारे “बूस्ट” भी किया फेस बुक और इंस्टा ग्राम पर ।

तीन दिनों में १८ बच्चे जुड़ गए, जिसमें १५ साल से लेकर ६० साल तक के विद्यार्थी शामिल थे। ज्यादा तर स्टूडेंट्स रेफरेंस से ही आए थे। ५ दिन की वर्कशॉप शुरू हो गई “ज़ूम” ऐप पर। पहला प्रयास था, शुरू में काफी दिक्कत आई। ज़ूम का फ्री वर्जन होने से उसमे काफी मर्यादा थी। पर रोज उस टेकनोलॉजि को सीख रहे थे, समझ रहे थे और आखरी दिन तक सब सेट हो गया था।

तनवी का अनुभव, तनवी का बोलना, सिखाना साथमे दर्शना, वेदांगी और खुशी इन तीनों “आर.जे.” के सेशन्स से वर्कशॉप में जान आ गई। हर दिन लाइव प्रैक्टिकल्स लिए गए, असाइनमेंट्स दिए गए। हर एक पार्टिसिपेंट को “रेडियो जॉकी” बनाया गया। अवॉर्ड्स दिए गए।

५ दिन कैसे खत्म हो गए समज ही नहीं आया। सभी ने वर्कशॉप को काफी सराहा।

जैसे ही पहली वर्कशॉप खत्म हुई हमने दूसरी वर्क शॉप का प्लान कर लिया, फिर से नई पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली गई। कुछ पुराने रेफरेंस से और कुछ नए स्टूडेंट्स मिल गए। अबकी बार २० बच्चे बैच में थे। ज्यादातर मुंबई, दिल्ली, और पुना के थे। अच्छी इंटरेस्टिंग बैच थी। काफी कुछ सीखा उन्होंने इन ४ दोनों में। सभी बेहद खुश थे.. स्टूडेंट्स, तनवी और हमारी टेक्निकल टीम भी।

टीम का जोश और बढ़ गया, सबने तीसरी बैच की तैयारी शुरू कर दी। इस वक़्त कुछ साहस करने का मन हुआ…

जायज़ कारण भी था, दूसरी बैच में एक स्टूडेंट ने कहा कि आप इतनी कम फीस क्यों ले रहे हो? आपने तो कमसे कम ५००० लेना चाहिए। जबकि हम ले रहे थे ७८९ और स्कूल स्टूडेंट्स से केवल ५००। हमने सोचा चलो अबकी बार फीस बढ़ाते है, देखते है कितना रिस्पॉन्स मिलता है। फीस डिसाइड हुई “बीबी” की सलाह से २१०० और ११०० कारण “तनवी” को दो पंडितों ने कहा था .”.मां की सुनो, फायदे में रहोगी “।

फिर से एड कैंपेन शुरू किया.. खासकर मुंबई और दिल्ली में, सोचा वहां लोग खर्च करना जानते है । दो दिन एड बूस्ट की पर रिस्पॉन्स कम था। जो इंटरेस्टेड लोगोंके नाम मिल रहे थे , उसमें नाममात्र लड़कियां या महिलाएं थी जबकि पहली दोनों वर्कशॉप में लड़कियां और महिलाएं ज्यादा थी। दो दिन हो गए थे, कोई भी फाइनल नहीं हुआ। लगने लगा कि फीस ज्यादा हो गई है… खासकर महिलाओं के लिए और शायद अमीर लोगों को एड अपील नहीं हो रही है या फिर २ अप्रैल तारीख उन्हें असुविधाजनक लगी हो।

फिर क्या..सबको टेंशन, फिर से वही पुरानी फीस ७८९ को प्रमोट किया पर डेढ़ दिन में ८ स्टूडेंट्स ही मिल पाए।

८ स्टूडेंट्स से तनवी खुश नहीं थी। तनवी ने कहा हम तारीख को पोस्ट पोंड करते हैं। लॉकडाउन का क्या होता है देखते हैं और फिर नई डेट्स फाइनल करेंगे। जिनके ऑनलाइन पैसे आए थे उनसे बात की और जिसे आगे संभव नहीं था उन्हें उसी दिन पैसे लौटा दिए ।

तनवी ने यह बात अपने करीबी सहेलियों से शेयर की तो उन्होंने भी उसे हंसते हंसते ताने मारे, कहा “लॉकडॉउन में लोगोंके पास पैसे नहीं है और तू थ्री टाइम्स फी कर उन्हें एक्सप्लोइट कर रही है, कैसी है रे तू!

उसे वह सुनकर बुरा लगा, कारण फीस में बढ़ोतरी करना हमारा एक्सपेरिमेंट था उसका नहीं।

खैर, अब आगे देखते हैं क्या होता है… अपडेट्स लिखूंगा।

# ऑनलाइन ट्रेनिंग, ऑनलाइन बिजनेस – सर्विस, वर्क फ्रॉम होम ये कॉन्सेप्ट ही वक़्त की मांग है।

पर इस वर्क शॉप ने हमें बहुत कुछ सिखाया…जैसे…

# ऑनलाइन सोशल मीडिया पर विज्ञापन देना शायद ज्यादा असरदार, किफायती है, बशर्ते वह उतना क्रिएटिव हो।

# प्रोडक्ट की या सर्विस की कीमत क्या होनी चाहिए यह एक बड़ा गहन, सेंसिटिव विषय है आज हर एक बिजनेस के लिए।

# जब हम चाहते है लोग सर्विस को ट्राय करें उस वक़्त उसकी कीमत अत्यल्प ही चाहिए। और जब सर्विस चल पड़ती है तब भी उसकी कीमत रीजनेबल ही चाहिए क्योंकि तबतक जरूर कोई कॉम्पिटीटर सामने आ ही जाता है।

# एक और यह बात समझी की जो अपने स्टूडेंट्स होते है, परिचित होते है, कस्टमर होते है वही हमारी पब्लिसिटी (सही या ग़लत) करते हैं, वहीं हमें बगैर कुछ खर्च करें दूसरे कस्टमर देते हैं। जबकि हम नए कस्टमर मिलाने के लिए ही ज्यादा वक़्त देते हैं, ज्यादा खर्च करते हैं।

तो हो जाओ तैयार ऑनलाइन के नए युग के लिए । क्योंकि लाइफ का हर नया दिन कुछ नया सिखाता है। इसीलिए कहते हैं लाइफ इस beautiful.

Anand malhara

१st may २०२०