। ख मा ऊ सा…।
। मि च छा मि दु क ड म.. ।
का मैसेज किस लिए भेजे?
क्या महज एक फॉर्मेलिटी के लिए?
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अक्सर हम जिन्हें ये मेसेज भेजते हैं उनमें से आप ही बताओ …
कितनों से हमारा रोजाना संबंध आता है?
कितनों से हम साल भर में कितनी बार मिलते हैं?
या कितनों से साल भर में कितनी बार (फेसबुक और वाट्सएप) के अलावा बात कर पाते हैं?
माना १०% लोगों से हमारा ऐसा संबंध आता होगा जहां मन दुखना स्वाभाविक है… उन्हें मैसेज भेजना या मिलकर क्षमा याचना करना जायज है, जरूरी है।
पर बताइए… उसके लिए भी क्या सालभर रुकना जरूरी है ? नहीं ना?
और कभी में खुद को देखता हूं , सोचता हूं .. जिस किसी के साथ मेरा मन मुटाव हुआ हो चाहे वो कोई भी समाज, पंथ या घटक का हो.. क्या मैं उन सबसे क्षमा याचना करने कि हिम्मत जुटा पाता हुं ? कदापि नहीं। खैर छोड़ो ज्यादा पर्सनल ठीक नहीं।
अब बोलो.. जब हम पूरी तरह से एक दूसरे को मिल ही नहीं पाते तो झगड़ा क्या खाक करेंगे ? झगड़ा ही नहीं होगा तो क्या खमाएंगे, क्या क्षमा मांगेंगे और क्या क्षमा करेंगे ?
मेरा तो मानना है आज के इस वर्चुअल लाइफ में अब हमें मिलना जरूरी है , मिलकर जुड़ना जरूरी है, जुड़कर दिलसे काम करना जरूरी है, मिलकर नव निर्माण करना जरूरी है । जहां विवाद होना जरूरी है और
मन दुखना जरूरी है …
मन दूखेगा तभी तो खुले दिल से वीरों के भांति माफी मांगना, या माफ करने की हिम्मत जुटा पाएंगे । एक दूसरे के विचारों को सुनना या उसका आदर करना सीख पाएंगे…
और… शायद तभी सही मायनों में क्षमा पर्व को मैत्री दिवस के रूप में सेलिब्रेट कर पाएंगे , आपसी मैत्री को और घनिष्ठ बना पाएंगे।
ये मेरी निजी सोच है, निजी विचार है।
मेरे लिखने से , मेरे आचार विचार से यदि किसी ठेस पहुंची हो या पहुंचती हो तो
तहे दिलसे….
मि च छा मि दु क ड म।
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तो है ना लाइफ है beautiful?
आनंद मल्हार a
२२-अगस्त २०


