सितम्बर महीने में यह परसों की बात थी, सुबह बारिश आ रही थी, ठंडा मौसम था ऊपर से मुझे थोड़ी सर्दी भी थी।
बेटे तनय को कहा “चलता है क्या तालाब में तैरने “? “नहीं ” तनय बोला।
बेटी तन्वी बोल उठी “पापा सर्दी हो रही है और आप तैरने जा रहे हो , आपका ;;;;;;; सही तो है ना?”
मैंने भी सुना सुनाया Dailogue फेंका.. कहा ” तनु लोहा ही लोहे को काट ता है ” और मैं चल पड़ा अकेला तैरने तालाब में।
इसके पहले भी अनेकों बार सर्दी होते हुए भी तैरा था तो डर नहीं था।
तालाब में उतरने ही वाला था कि बारिश ने ज़ोर पकड़ लिया । सोचा क्या करें? पानी में उतरे या फिरसे पलटी मार लें ?
सोचा वैसेभी गिला हो गया हूँ क्यों ना उतरा ही जाए?
बैग पेड़ पर लटकाई और उतर गया पानी में और शुरू किया तैरना… बहुत मज़ा आ रहा था । ऊपर से बारिश और मैं पानी के अंदर । जो बारिश मुझे बाहर परेशान कर रही थी , डरा रही थी अब वो सुहानी लग रही थी । उसका असर ही मानो ख़त्म हो गया था । बाहर धुवा धार लगनेवाली बारिश पानी में हल्की बौछार लग रही थी, मानो वो हम पर हलके हलके फूल बरसा रही हो।
जो बारिश के छींटे हमें बाहर परेशान करते हैं, वहीं बारिश से बने तालाब से यदि दोस्ती कर लें तो बारिश की तकलीफ़ ख़त्म हो जाती है।
सही कहते हैं जिस चीज का , जिस बात का, जिस काम का हमें डर लगता है… वह डर तब तक खत्म नहीं होता जब तक हम उसे जीते नहीं है, उसमें शराबोर होकर बाहर निकलते नहीं है। उसके साथ खेलते नहीं है।
छोटे बच्चे तो कुछ भी कर जाते हैं कारण उनमें डर ही नहीं होता। जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है.. हमारा डर भी बढ़ते जाता है और शायद हमारा स्वार्थी स्वभाव हमें और डरपोक बनाता है।
घर आया तो बच्चों को जोश में कहा “बारिश से परेशान नहीं होना है तो तालाब में तैरा करो”। बच्चों ने भी कुतुहालता से मुझे सुना। पर तनय ने मुझे निहार कर धिरेसे पूछा “पापा आपकी नाक में से पानी क्यों निकल रहा है? आप तो कह रहे थे लोहा ही लोहा को काटता है?”
क्या बोलता? छींके जोर पकड़ रही थी।सही है उस दिन बारिश की तो मजा ले ली पर बारिश और तालाब ने मेरे नाक की बारा बजा दी थी।
कुछ समय बाद तो इतनी सर्दी हो गई की बीबी ने और डॉक्टर बेटी ने आखिर में एक नहीं दो-दो गोली खिला ही दी। कारण बीबी को लग रहा था जैसे मुझे सर्दी नहीं कॉरोना हो गया है और बस कुछ समय में सब ख़तम होने वाला है।
खैर दूसरे दिन सुबह तक नाक, सर्दी सही हो गई थी।
पर लाइफ होती है रोज नई। अनुभव भी आते हैं रोज नए।
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आनंद मल्हार a
१८ अक्टूबर २०२०
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