कब करेंगे हमहमारे “गेस्ट रूम” कोआबाद ?


कब करेंगे हम
हमारे “गेस्ट रूम” को
आबाद ?

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कब करेंगे हम
हमारे “गेस्ट रूम” को
आबाद ?
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किस्सा मजेदार है… हाल ही का है, धनतेरस का है… हमारे एक “कलाकार  कहो या जिगर बाज ” क्लाइंट का है जो हाल में औरंगाबाद स्थित है, जिसने करीब चार साल पहले छपे विज्ञापन के पैसे नहीं चुकाए। पेमेंट के लिए केस भी कर रखी है। अमाउंट जो बड़ी है।

मैंने उसे रूटीन वाला मैसेज किया “इतने साल हो गए, अब तो पेमेंट करो” और उसने जवाब दिया “10 तारीख तक हो जाएगा।” मैंने लिखा “11 तारीख को मैं औरंगाबाद आ रहा हूं।” उसने लिखा “मैं मुंबई में हूं, कल आऊंगा।”  फिर मैंने ” तो 13 तारीख को आता हूं” लिखा। उस महाशय ने “ओ.के.” लिखा। मैं खुश हो गया।  मैंने यह भी लिखा “साथ में मेरी बेटी तन्वी भी आ रही है… जो फला- फला है। आप चाहो तो आपकी ” क्लासेस में उसका मोटिवेशनल टॉक भी रख सकते हो, जिसकी बाद में “प्रेस नोट” बन जाएगी, पेपर वाले उसे छाप भी देंगे।” उसने यह पढ़ा पर रिप्लाई नहीं किया।

औरंगाबाद जाना तय हो गया। मैंने उस क्लाइंट के लिए एक दिलसे ग्रीटिंग कार्ड भी बनाया। ग्रीटिंग में क्लाइंट की तारीफ के पुल बांधे। लगा था, क्लाइंट अब पटरी पर आ गया है।बहुत सालों बाद पैसे देने के भाव जागे है। घर पर बीवी को भी तैयार किया, मैंने कहा “चलो पिकनिक हो जाएगी । रात को भूषण के यहां रुकेंगे और सुबह दूसरे दोस्तों को मिलेंगे फिर ग्रेट क्लाइंट विनायक को मिलकर, उससे पैसे लेकर जलगांव शाम तक पहुंच जाएंगे।” “धनतेरस” सही मायनों में सेलिब्रेट हो जाएगी।

भूषण मेरा दोस्त, जवानी का दोस्त, काफी वर्ष एक दूसरे के लिए काम किया। वह किसी कारणवश शादी के बाद औरंगाबाद शिफ्ट हो गया। मुझे याद नहीं इन 20 वर्षों में कितनी बार में उसके यहां गया या रात को गप्प लड़ाने रुका। पर मुझे याद है एक बार रात के 2 बजे गए थे गप्प लड़ाते- लड़ाते.. बहुत मजा आया था जो कि उम्र के साथ न के बराबर हो जाता हैं।

औरंगाबाद पहुंचते पहुंचते रात हो गई। रास्ते में ही खाना खा लिया। पहला कारण था दोस्त को तकलीफ देने की हिम्मत नहीं हुई। दूसरा कारण था हमारी वही छोटी सोच।

15 साल पहले जब एम.ए. की परीक्षा हम मिया बीबी दोनों साथ में औरंगाबाद देने जाते तब बच्चे भी साथ रहते। बच्चे भूषण के घर पर रहते और हम होटल में रुककर पढ़ाई करते और एग्जाम देने जाते। इस वजह से हमारे बच्चे उनसे, उनके यहां कंफर्ट फील करते है और उनका परिवार भी हमारे बच्चों से अटैचेड है।

रात को फिर भी खूब गप्प लड़ाई। आइसक्रीम खाया और करीब 1 बजे सो गए, नींद जो आ रही थी। सुबह उठे, आगे प्रस्थान करने से पहले “पोहे” खाते समय मेरे मन में एक विचार आया, अच्छा लगा तो भूषण से शेयर किया… कहा “हम बहुत बार अपने दोस्तों को, प्रिय जनों को घर पर खाना खाने, नाश्ता करने, चाय पीने बुलाते हैं.. या जाते हैं और
खा-पीकर फिर से अपने अपने अपने घर लौटा कर आ जाते हैं..
तो क्यों ना हम भी बच्चों की तरह दोस्तों के यहां नाइट आउट पर जाए या दोस्तों को अपने यहां बुलाए … तो कैसा रहेगा? हम बाहर गांव जाते हैं घूमने, नई जगह का अनुभव लेने, क्यों ना हम ऐसा कुछ करके वहीं अनुभव अपने गांव में, अपने घर में ही उठाएं? मालूम नहीं, कितनों को  यह आइडिया पसंद आई होगी?

जलगांव लौटते वक्त हम दो दोस्तों से मिले जो मानसरोवर यात्रा में हमारे साथ थे। उनके यहां बनी दीवाली की मिठाइयों का हमने सबसे पहले स्वाद लिया। फिर हमारे अफलातून क्लाइंट के यहां मिलने ,पेमेंट लेने गया। वहां का किस्सा मेरे लिए ठीक ठाक था पर बीबी और बेटी के लिए पूरा नया लाइफ टाइम एक्सपीरियंस था जिसे मैं बाद में कभी शेयर करूंगा।

वापसी के सफर में मेरे दिमाग में “नाइट आउट” की जो आईडिया आई थी उसी पर चिंतन कर रहा था। हर कोई जब नया घर बनाता है तो घर में 1 “गेस्ट रूम” या कोई बड़े बड़े घर में 2 या ज्यादा गेस्ट रुम भी बनाते हैं। उसे साफ सुथरा रखते हैं, सजाकर रखते हैं। जब घर किसे बताते है तो गर्व से कहते है.. ये हमारा गेस्ट रुम है।

बड़े सिटी की छोड़ दो पर छोटे शहरों में घर में अक्सर “गैस्ट् रुम” रहते ही हैं। अब बताओ अपने “गेस्ट हाउस” में या अपने “गेस्ट रूम” में कितनी बार गेस्ट आते हैं? और उसमें रुकते है? गेस्ट रूम अपने “दामाद” के लिए या फिर “सगे संबंधियों” के लिए ही होते हैं क्या? चलो माना उनका उस पर “ज्यादा” हक है पर वे साल में आते कितने बार हैं? ९५% तो वो खाली ही रहता है।

कल ही मेरे एक मुंबई के संबंधी श्री डूंगरवालजी से बात हो रही थी, जिन्हें हम अक्सर जलगांव आने के लिए आमंत्रित करते हैं। वह जरूरी भी है.. कारण मुंबई में अक्सर हम उनके घर पर रुकते है। उन्होनें कहा “अब रिटायर्ड हो गए हैं,
अब जरूर आएंगे। “

क्यों ना हम हमारे “गेस्ट रुम” को “आबाद” करने की सोचें? अपने दोस्तों को, गांव के ही क्यों ना हो बुलाएं, रात को रुकने को कहे। शाम का खाना साथ बनाए, साथ खाएं। गप्प लगाएं और अपने वक्त को, अपने दिन को घर बैठे अनमोल बनाएं, यादगार बनाएं।

आज हर परिवार न्यूक्लियर बन रहा है।और उसमें बढ़ रहे बच्चों का तो पूछो मत। रातको जब हम अपने घर में देखते है तो हर कोई मोबाइल में , टीवी में मशगूल होता है। आज वक्त की जरूरत है हम हमारे “गेस्ट रुम” को “आबाद” करें, यदि गेस्ट रुम नहीं भी है, पर दिल में प्रेम है, अपनापन है तो दोस्त कंपनी अपने साथ हॉल में, गैलरी में,या छत पर भी सो सकती है।  उसमें १००% ज्यादा मज़ा आता है।

“अतिथि देवो भव” कहते है.. तो दोस्तों को क्या कहेंगे? इस आइडिया में बुलाने से भी जो व्यक्ति आएगा, आमंत्रण स्वीकारेगा वो महान कहलाएगा ये पक्का।

यदि आपको यह आइडिया अच्छी लगती है तो अमल में लाओ, शेयर करो।

और हां .. हमारे घर में “गेस्ट रुम” है, घर भी खुला खुला है, दिल भी छोटा नहीं है। It’s an open invitation. जरूर पधारे।

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Life is beautiful .. let’s explore it.
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आनंद मल्हार a
१९ नवंबर २०२०