“डॉक्टर साहब चेक ही नहीं करतेफिर  दवाई का क्या फायदा ??”

“डॉक्टर साहब चेक ही नहीं करते
फिर  दवाई का क्या फायदा ??”

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“डॉक्टर साहब चेक ही नहीं करते
फिर  दवाई का क्या फायदा ??”

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Continued…

हमारी श्रीमतीजी की यह शिकायत हमेशा रहती, कहती “डॉक्टर साहब स्टेटस स्कोप से ना सही हाथ से नाड़ी भी नहीं चेक करते तो दी हुई दवाई क्या फायदा करेगी?” सही है, हमारे डॉक्टर दोस्त शायद ही पेशंट को हाथ लगा कर चेक करते , पर मरीज का पुराना रिकॉर्ड, ऑब्जर्वेशन, पूछताछ और उनके 6th सेंस की मदद से वे दवा देते और मरीजों को दर्द से आराम मिलता, राहत मिलती। जो तकलीफ, दर्द किसिसे नहीं गया वह काम इनकी दवाई कर देती।

पर डॉक्टर प्रैक्टिस में पूरी ईमानदारी बरतते। जो सही है वही बताते, समझाते। इलाज नहीं है तो नहीं कहेंगे। दवा की जरूरत नहीं है तो नहीं देंगे। मैंने एक बार बीवी के कहने पर पूछ ही लिया ” सिर के बाल कम हो रहे हैं, कुछ दवाई वगैरह?” तो वह बोले “अन्नू जाने दे.. गंजा अच्छा दिखेगा।” बात खत्म। बाल जानेका मेरा टेंशन ही ख़त्म हो गया। आजभी मेरे बच्चों को डॉक्टर की दवा कम, दवा के साथ मिलनेवाली चॉकलेट ज्यादा याद आती है।

एक पाठशाला के टीचर को जितनी छुट्टी मिलती है उससे ज्यादा छुट्टी हमारे डॉक्टर साल भर में लेते हैं, ऐसा हर कोई कहता है। बीबी की यह भी कंप्लेन रहती “जब जब बीमारी आती है तो डॉक्टर साहब गायब हो जाते हैं, छुट्टी पर चले जाते हैं। सही है, प्रैक्टिस के कुछ सालों बाद उनका साल भर का छुट्टी का कैलेंडर पहलेसेही तयार हो जाता। ये मेरे पहले और अंतिम डॉक्टर है जिनके दवाखाना बंद रहने की सूचना के अनगिनत विज्ञापन कितने सालों तक देते रहा। हो सकता है यह उनका लोगों के सामने आने का एक अनूठा तरीका रहा हो ।

छुट्टी में डॉक्टर कहां जाते हैं ? क्या करते हैं ? शायद ही किसे पूरा पता हो ,पर मैं उन्हें पूछा करता था। इन दिनों वे अपने आप पर काम करते यह पक्का। एकांत में वे चले जाते। साधना करते, पूजा पाठ करते। गुरुजनों का दर्शन करते और अपने आप को अपग्रेड करते।

डॉक्टर दोस्त.. डॉक्टर के साथ एक कुशल संगठक, लीडर भी है। वे उनके मेडिकल कॉलेज में जीएस रह चुके हैं यह इस बात का सबूत है। जिद्द है, बड़े सोचने की ताकत है, नयापन है और काम के प्रति समर्पण है। लोगों पर विश्वास रखते हैं लोगों को जोड़ते है, जोड़े रखते है। उन्हें अलग-अलग कार्यक्रम रखना अच्छा लगता है।

मुझे याद है, एक बार उन्होंने उनके आदरणीय महाराज की भागवत कथा आयोजित की थी। शायद आखरी दिन या हर रोज वे उनके करीबी लोगों को पूजा/ यज्ञ में बैठनेका मान देते थे। एक दिन मुझे भी बुलाया गया, पर मैं पूजा में वहां नहीं पहुंचा। भूल गया था, काम में था या मुझे वह इतना महत्व का नहीं लगा, मालूम नहीं पर बाद में पता चला, या मेरे एक शुभचिंतक ने बताया  मेरे न आने से डॉक्टर बहुत दुखी हुए । उनकी आंखें भर आई। कारण मैं नहीं..कारण था उनका एक दोस्त उस यज्ञ के लाभ से वंचित रह गया था, इसलिए वे द्रवित हुऐ थे। तब से मुझे लगता है शायद उन्होंने मुझे दोस्तों की एक अलग कैटेगरी में शिफ्ट कर दिया। पर वे अपने दोस्तों की बहुत केयर करते है।

डॉक्टर मस्त मौजी तो है ही, पर उन्हें गप्प लड़ाने का भी बड़ा शौक है। धीरे-धीरे व्यस्तता के कारण उनके गप्प डायलॉग में बदल गई (कम शब्दों में ज्यादा असरदार)। बोलने की उनकी अपनी ही एक मजेदार स्टाइल है…जैसे ” रिपोर्ट अन एक्सरे ला रोज दिवा-उदबत्ती लाव, डॉक्टर वेडा आहे , त्याला काय अक्कल?, मजेत मरायचे असेल तर नियमित औषध घे।” वगैरे वगैरे।

जब भी मैं डॉक्टर से मिलने जाता, बीमारी या ऐसेही तो वे मुझे अक्सर उनके ब्रेक टाइम ( इंटरवल पीरियड ) में बुला लेते। पान का शौक, मुंह में पान रख कर वे बात करते , बहुत बार क्या बोलते समझ ही नहीं आता। हमारी श्रीमतिजी को तो वैसेभी उनकी भाषा समजती ही नहीं थी।
वे पेशेंट की स्टोरी बहुत इंटरेस्टिंग स्टाइल में बताया करते।

उन्हें ड्राइविंग का भी बड़ा शौक। कभी केरला, तो कभी कन्याकुमारी से कश्मीर तक ट्रेवल किया। साहस तो उनकी ना नस में बसा है। अपनी यात्रा को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में  दर्ज करवा दिया। उस यात्रा में भी कुछ दोस्त थे साथ में।

उनके सेवा कार्य में भी अलग पन है। ट्रस्ट का नाम रखा “अबोली प्रतिष्ठान”, पंच लाइन थी “जनसेवा न बोलता” । पर यह सच भी है जब हम बगैर अपेक्षा के, निस्वार्थ भाव से सेवा करते है तभी लोग जुड़ते है। उन्हें विद्यार्थियों के लिए, मंदिर के जीर्णोद्धार में विशेष रुचि रही है। इन सेवा कार्यों से भी उनके काफी दोस्त ज्यादा करीब आए।

डॉक्टर का “विश्वास” पर अपार विश्वास है। We treat, He cures यह दवाखाने में लिखा है। उनका उनका गुरुजनों पर, उनके दोस्तों पर, उनके मरीजों पर विश्वास अटूट विश्वास है, वैसेही या उससे ज्यादा उनके गुरुजनों का, दोस्तों का और मरीजों का उनपर विश्वास है। और जहां विश्वास होता है वहां समस्या खत्म हो जाती है। तकलीफे दूर हो जाती है। वे सामने वाले पर इतना विश्वास डालते है कि सामने वाले का स्वार्थ ही खत्म हो जाता है।
मुझे आज भी याद है उनके पुराने दवाखाने में विवेकानंद जी की एक लाइन लिखी हुआ करती थी….
If you have faith, You can fly.

डॉक्टर दोस्त पर लोगों का विश्वास धीरे धीरे श्रद्धा में बदलता गया, दाढ़ी कटती बढ़ती गई। पर देखते देखते लोगों के लिए वे डॉक्टर से बाबा बन गए।

बीच में क्या हुआ पूरा मालूम नहीं पर उनकी रिसेप्शनिस्ट शायद कुछ समय के लिए आई नहीं या अज्ञानता से शायद उस की अपेक्षा कुछ ज्यादा बढ़ गई थी जिससे डॉक्टर काफी नाराज भी हुए और दुखी भी। डॉक्टर ने उसे फिर से नहीं बुलाया।  और तब उस समय उनके दोस्त मदत करने आगे आ गए ताकि काम रुके नहीं। और काम चलता रहा। और देखते देखते दिन साल बित गए और आज डॉक्टर के सभी दोस्त कंपनी डॉक्टर के विधायक काम में हाथ बटा रही है, काम में मदद कर रही है, उन्हें ऊर्जा दे रही है ताकि डॉक्टर डॉक्टरी कर सकें, मरीजों की तकलीफे दूर कर सकें। और उन मरीजों की मिलने वाली दुवाओं के कुछ हिस्से से अपने जीवन में थोड़ी खुशी ला सकें।

But लाइफ is beautiful.

आनंद मल्हार a
16 नवंबर 2020

(हमारे डॉक्टर दोस्त का नाम है..
डॉ. सुनील दत्त)

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