*
*
“त्रिलोचन” की डेड बॉडी ने
दिखाया एक नया श्मशान!
हैप्पी होली।
*
क्रमशः भाग२….
*
( यदि आप iphone यूज करते हो तो जरूर इत्तिला करें .. आपको मेरी हर पोस्ट आधी आती होगी।)
***
त्रिलोचन की डेड बॉडी का पुलिस स्टेशन में पंचनामा दर्ज करवाने के पश्चात बॉडी सिविल हॉस्पिटल में पोस्ट मार्टम के लिए भेजी गई। डिपार्टमेंट ने कहा हम २_३ दिन रुकेंगे, उसके सगे संबंधी को बुलाने की कोशिश करेंगे और यदि उसमें सफलता नहीं मिलती है तो हम त्रिलोचन की डेड बॉडी को आपके हवाले कर देंगे। ताकि आप उसकी अंतिम क्रिया कर सको।
तीन दिन बीत गए… रविवार का दिन था, फुरसत का दिन था। डिपार्टमेंट का फोन आ जाता है, हमारे सहयोगी सिविल हॉस्पिटल में पहुंच जाते है। फिर से एक बार स्टेटमेंट, सिग्नेचर्स लिए जाते हैं और पोस्ट मार्टम की गई बॉडी बाहर आती है जो तीन दिन पुरानी होने से थोड़ी फूली लगती है।
मैं पुलिस भाई को पूछता हूं “त्रिलोचन का अंत्य विधि हम अग्नि दहन से करेंगे या विद्युत दाहिनी में?” तो वे कहते हैं “नहीं, हम उसे दफन करेंगे ताकि कभी कोई उनका वारिस या सगा आता है और कुछ बखेड़ा होता है तो हम उसे बॉडी के अवशेष बता सकते हैं, जो अग्नि दाह में संभव नहीं है।” “ठीक है, तो कहां दफनाया जाता है?” मैं पूछता हूं। “चलो बताते हैं” पुलिस भाईसाब कहते हैं।
और बॉडी को शव वाहिनी में रखकर हम सब श्मशान की और निकल पड़ते हैं।
और हम पहुंचते है एक अनजान जगह, एक अनजान श्मशान में, जो शहर की पुरानी नेरीनाका श्मशान के पिछवाड़े बह रहे नाले के दूसरे किनारे पर स्थित थी। यह वो जगह है जहां “लावारिस डेड बॉडी” को दफनाया जाता है।
इस श्मशान घाट पर मैं मेरी ५८ साल की उम्र में पहली बार आया। शायद इसे देखने भी “भाग” लगते होंगे। मुझे भरोसा है आप पढ़ने वालों में से भी यहां कोई शायद ही पहुंचा होगा। कारण साफ है, लावारिस लोगों से हमारा कोई संबंध नहीं होता, लाशों की तो दूर की बात है। नाही नेताओं से उनका संबंध आता होगा, कारण “लावारिस वोट नहीं होता”। और शायद ही समाज के गण मान्य लोगों का उनसे संबंध आता हो।
यहां केवल पुलिस डिपार्टमेंट के सिपाही, शव वाहिनी के ड्राइवर और लाश के साथ आई इक्का दुक्का आम जनता केवल पहुंचती है। यहां खड्डा खोदने वाली एक जोड़ी होती है जो पैसे लेकर खड्डा खोदती है और बॉडी को ठीकसे दफन करती है । और शायद इसी वजह से इस श्मशान के हालात देखकर दिमाग घूम गया।
इसके इर्द गिर्द कचरे का साम्राज्य है, रास्ते से इसे देख पाना मुश्किल है। थोड़ा अंदर आना पड़ता है। यहां पर शहर के कचरे से भरे ट्रैक्टर आते हैं, उसे वहां खाली कर सोर्टिंग का काम होता है, दूर कोई शौच के लिए बैठा होता है। गंदगी से शराबोर बदबू भरा माहौल था।
पर खड्डा खोदनेवाले दो मुकादम हंसते हंसते गाना गाते गाते धूपमें खड्डा खोद रहे थे। ऊपर धूप, बैठने की क्या पीठ को टिकाने की वहां व्यवस्था नहीं तो हम मुकादम को जल्दी जल्दी हाथ चलाने की सलाह देते है तो क्या भड़कता है वो हम पर। कहता है..”अरे तुम क्या लाख_ दो लाख रुपए दे रेले हो तो इतनी जल्दी मचा रहे हो? मूतेंगे नहीं क्या? बोला तो दारू की बॉटल दी नहीं, क्या पूड़ी भी खानेको नहीं देंगे?”
वो भी सही था, अपनी जगह। चुप चाप सुन लिया। पर उसके स्टाइल में फेंके इस डायलॉग ने मेरा मन जीत लिया। तभी के तभी घर पर फोन किया, तनय और तन्वी को कहा यदि तुम्हें डेड बॉडी को कैसे दफनाते है लाइव देखना है तो १० मिनिट में यहां पहुंचो, बच्चे भी मान जाते है पर उन्हें आनेको कमसे कम २० मिनिट लगने वाले थे, तो मुकादम को बिनती करता हुं “कुछ लोग आ रहे है हम रुक सकते है क्या?” वो बोला “नहीं , अब बस दस मिनिट में बॉडी अंदर होगा।” बदकिस्मती थी बच्चोंकी वे इस एपिसोड को मिस कर गए। खैर।
खड्डा पूरा होता है, बॉडी को खड्डे में रखा गया, उसके फोटो लिए गए, उसपर फूल अगरबत्ती लगाई गई, और हम सबका पुलिस बाबू के साथ उस जगह फोटो लिए गए डिपार्टमेंट के रिकॉर्ड के लिए।
सब कुछ पूरा हो गया, कार्य पूरा हुआ, तभी हमारे टीम से कृष्णा बोला “सर, त्रिलोचन के अंतिम संस्कार को हम उनकी पर्सनेलिटी, उसके रहन सहन से मैच नहीं कर पाए।” उनका रेमंड ब्रांड के प्रेस किए कपड़े पहनना, शूज को पॉलिश किए बगैर बाहर नहीं निकलना, अप टू डेट रहना और उनका अंतिम संस्कार इतनी गन्दी जगह होना …. बात तो किसीको भी जमी नहीं।
कृष्णा की बात में दम था, सचाई थी। हम भी “बेबस” थे। अपने में से किसी की अचानक डेथ होना, पुलिस का आना, पोस्ट मार्टम कराना, लावारिस होना शब्द यह सब कुछ नया था हम सबके लिए। जो संभव हुआ वो किया।
फिर मैंने हिम्मत करके पुलिस भाईसाब से पूछ ही लिया “यदि मैं आग्रह करता और अग्नि दाह पर अड जाता तो आप क्या करते?” वे कहतेहैं ” हो सकता था पर उसके लिए काफी सिफारिश, कलेक्टर तक की परमिशन लेनी पड़ती थी।”
चलो एक और बात समझ में आई “त्रिलोचन” के कारण। आगे भविष्य में यदि किसी लावारिस लाश से पाला पड़ा तो अग्नि दाह संभव है।
“त्रिलोचन” ने यह श्मशान हमें दिखाया, जो हम आप सभी को फोटो के माध्यम से बता रहे हैं। इसलिए भी बता रहे हैं कि उसे आपकी,आपके मदद की जरूरत है।
संभव है तो एक बार देखो, मुझे यकीन है यह केवल जलगांव का मसला नहीं होगा, हर शहर में लावारिस लाशों को जहां दफन किया जाता होगा उस जगह के हाल कुछ ऐसे ही परेशान करने वाले होते होंगे।
आज हर श्मशान मॉडर्न हो रहे है, सुंदर बन रहे हैं। अग्नि दाह के साथ अब “विद्युत दाहिनी” लग रही है। दाह संस्कार अब लोग “लाइव” देखते है। तो क्यों “लावारिस लाशों” को कचरे से भरा माहौल मिले? लावारिस का अंत तो हम अच्छा कर ही सकते हैं। पुलिस भाईसाब बता रहे थे “हमने बहुत बार नगरपालिका में निवेदन दिया है पर कोई ध्यान ही नही देता।” यदि कॉर्पोरेशन के लिए मुमकिन नहीं हो कॉर्पोरेट्स , सामाजिक संस्था या हम सब मिलकर जरूर कुछ कर सकते हैं।
विश्वास है “जलगांव” जरूर जल्द ही इस विषय पर पहल करेगा….
*
कलाकार “त्रिलोचन” का पीछे छूटा “अनमोल खजाना” अगले लेख में …. क्रमशः
*
लाइफ इस ब्यूटीफुल। कलरफुल। Paint Every day with new colour।
Happy होली।
*
आनंद मल्हारा
२८ मार्च २०२१
*
***


