जलगांव का अजूबा…
डॉक्टर के दवाखाने में
दोस्त देते हैं सेवा।
परसों की बात है…
सुबह डॉक्टर के सेवक दोस्त वर्माजी का दवाखाने से फोन आता है, कहता है “क्या आनंद भाई, तुम्हारे नाम का जब पुकारा हुआ, मैंने बाहर आकर देखा.. तुम निकल गए थे।”
मैंने कहा…” इतनी भीड़ देखी और मेरा दर्द भी इमरजेंसी वाला नहीं था, तो निकल लिया।” वे बोले “आज 2:00 बजे फोन करो.. मैं बताऊंगा, तब आ जाना।” मैंने “ओ के” कहा।
2:15 पर फिर से उन्हीं सेवक का फोन आता है.. बड़े प्यार से, शायद गुस्सा पीकर नहीं.. गटककर कहते हैं “क्या आनंद भाई फोन नहीं किया ” और बहुत नम्रता से कहते हैं “जल्दी आ जाओ।” उन्हें गुस्सा आना स्वाभाविक है..बाहर सैकड़ों पेशंट नंबर लगाए, नंबर आने कि राह में खड़े हैं और एक पेशंट जिसने नंबर नहीं लगाया है, फिर भी उसे फोन कर बुलाना पड़ रहा है.. एक नहीं दो- दो बार फोन करना पड़ रहा है। बोलो..ऐसे में सेवक को गुस्सा न आना तो असंभव ही है ।
मैं “सॉरी” “5 मिनट में पहुंचता हूं” कहता हूं । हरदम की तरह काम में भूल जो गया था। फैक्ट्री से दवाखाने के लिए गाड़ी से निकल पड़ता हूं… रास्ते में इतना ट्रैफिक कि 5 के 15 मिनट कब हो गए पता ही नहीं चला। रास्ते में ही फिर से फोन आता है पर इस बार दूसरे सुलझे हुए सेवक दोस्त “पप्पुभाई” का। उनके कुछ कहने से पहले ही मैं कह देता हुं ” बस 5 मिनट में पहुंच रहा हूं, रास्ते में ही हूं”।
दवाखाने पहुंचा तो देखा… अंदर- बाहर वहीं सैकड़ों मरीजों का जमघट लगा था। पर इस बार सेवक दोस्त ने मुझे देखते ही अंदर बुला लिया। गर्दी में भी जब कोई हमें विशेष सम्मान देकर पहले बुलाता है तो मन ही मन में छाती फूल जाती है। मेरी भी अक्सर छाती फूलती है डॉक्टर के यहां।
डॉक्टर को मिला, उन्हें उनकी लंबी दाढ़ी पर हाथ घुमाते हंसते हुए कुछ पल देखा..। सोनोग्राफी की रिपोर्ट बताई, इधर उधर के हाल हवाल पूछे ..। निकलते वक्त डॉक्टर ने खास जोर देकर सेवक दोस्त से कहा “याला चहा बिस्किट पाजुनच पाठव।”
बाहर आ गया, लॉबी में बैठा। सेवक ने चाय और साथ में बिस्किट दिए। चाय पीते और बिस्किट खाते सेवक पप्पू भाई जो मेरे भी शुभचिंतक है.. उसने कहा “यार अपना डॉक्टर बहुत…. जीeee….. लगाता है…बहुत केयर करता है।” मन ही मन में कहा.. मेरे जैसे खुद पसंद, मनमौजी इंसान से भी। वे कुछ नहीं बोले.. केवल हंस दिये। उनकी हंसी मेरे लिए एक पहेली बन गई। उनकी हंसी में समर्थन था या मेरी छोटी सोच पर उपहास? पता नहीं।
चाय पीते पीते मुझे डॉक्टर से जुड़ी पुरानी बात याद आ गई। जलगांव की पहली “अमृततुल्य चाय” की रेस्तरां करीब 30 वर्ष पहले “गोलानी मार्केट” में शुरू हुई थी और वह इसी डॉक्टर की कल्पना थी। रेस्तरां क्यों बंद हुआ, मुझे आज याद नहीं पर डॉक्टर की सोच कितनी एडवांस्ड थी ..आज समझ में आता है। आज शहर के हर नुक्कड़ पर अलग-अलग ब्रांड की चाय के आउटलेट दिखते हैं पर स्पेशल चाय की रेस्तरां की कल्पना डॉक्टर ने 30 वर्ष पूर्व की थी।
यही नहीं, मैं सोचता हूं , देखता हूं तो डॉक्टर की प्रैक्टिस में, डॉक्टर के सेवा कार्य में या उनकी हर बात में एक अलग पन पाता हूं …
क्रमशः
आनंद मल्हार a
8 नवंबर 2020


