“आ बैल मुझे मार” ,
करना
बंद कर अब “आनंद”….।
एक नया किस्सा….मुंबई का।
तनय, तनवी दोनों बच्चे मुंबई में फ्लैट लेकर रह रहे थे। परीक्षा खत्म हुई… और कोरोना का कहर फैलने, लॉक डाउन लगने के पहले ही वे जलगांव आ गए थे। और कोरोना को देखते- जीते 7-8 महीने कैसे बीत गए समझ ही नहीं आया।
और आज “तनय” का कॉलेज एडमिशन ऑनलाइन, कॉलेज की पढ़ाई ऑनलाइन। “तनवी” के ऑडिशन ऑनलाइन। इवेंट ऑनलाइन। सब कुछ शुरू है घर बैठे बैठे।
कहानी अब शुरू होती है…
वह फ्लैट खाली करना तय था। “तनय” ने 2 महीने पहले कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से मालक को बता दिया था। “कोरोना” का डर, उपरसे “लॉकडाउन”। उसमें फ्लैट से सामान खाली करना बहुत मुश्किल था। वहां सामान भी बहुत इकट्ठा हो गया था, उपरसे बच्चों को तकलीफ ना हो इसीलिए फ्रिज और वाशिंग मशीन भी मुझसे बगैर पूछे हमारी मेमेसब ने वहां लगवा दी थी। मैं इसे अक्सर.. मां का बच्चों को बिगाड़ने वाला प्यार ही कहता हुं।
“तनय” के दोस्त “कल्पेश” जो मुंबई में रहता है उसे यह काम सौंपा। उसने फ्लैट का सामान खाली किया, फ्लैट की सफाई की। “ब्रोकर” को बताया… कबूतर ने बालकनी में की हुई “शिट” की सफाई केवल बाकी रखी.. कारण वह गंदगी में बच्चों का हाथ नहीं था। कल्पेश ने पूरा सामान उसके दोस्त के गोडाउन में रखवा दिया था।
फ्लैट में रखा “फ्रिज” और “वॉशिंग मशीन” फ्लैट में ही टेम्पररी रखने की सोची। उन्हें कहा कि …”हम इसे यहीं रख रहे हैं। नए टेनेन्ट चाहे तो उसे यूज करें और यदि नहीं चाहिए तो हमें कहे.. हम उसे उठा लेंगे।” साथमे यह भी कहा था.. “आप यदि चाहो तो उसे खरीद सकते हो.. नहीं तो हम मुंबई जब आएंगे तब उठा लेंगे।” यह बात मैंने मालक “मि.शेट्टी” को कही थी और “कल्पेश” ने ब्रोकर से।
फ्लैट खाली करने के करीब डेढ़ महीने बाद मालिक ने “डिपॉजिट” की रकम लौटा दी। और देखते-देखते छह-सात महीने “कोरोना” में निकल गए। ना हम मुंबई गए, ना उन्हें फोन किया… ना उन्होंने हमें फोन किया…। बीच-बीच में बीवी कहा करती थी.. याद दिलाया करती थी.. अपना फ्रिज, वाशिंग मशीन कहां है… मंगा लो…। मैं बात टाल देता, कहता “चिंता मत करो, फ्लैट में ही रखी है.. मालिक को कहा है… भरोसा रखो” वगैरे वगैरे।
पंधरा दिन पहले मैंने सोचा.. अब बहुत दिन हो गये… ट्रांसपोर्टेशन भी शुरू है.. चलो अपनी गाड़ी भेजते हैं..और मुंबई में पड़ा सामान को उठा लाते हैं। ड्राइवर के साथ “साजिद” को भी भेजते हैं जिसे मुंबई की जानकारी है।
“कल्पेश” को फोन किया, मालक “मि. शेट्टी” को फोन किया… कहा ” गाड़ी भेज रहा हुं, फ्रिज और वाशिंग मशीन उठाने”।सुनकर मालिक थोड़ा सपकपा गया, पहले कहने लगा “तुमने तो वह सामान वहीं छोड़ दिया था, हमें लगा तुमने वह सामान हमें दे दिया..अब वापस क्यों मांग रहे हो? “तो मैंने कहा.. ” मैं इतना अमीर नहीं कि फ्रीज और वॉशिंग मशीन बांटता फिरू।” फिर वे कहने लगे.. “तुम्हारे बच्चों ने फ्लैट बहुत गंदा कर दिया था… उसकी बिल्कुल सफाई नहीं की.. सफाई के लिए हमारे 5-6 हजार रुपए खर्चा हुए हैं, और आपकी 2 व्हीलर गाड़ी यहां थी उसके चार्जेस भी नहीं भरे थे। हमको तुम्हारा सामान उठाना पड़ा… उसका भी खर्चा हुआ…आप ब्रोकर से बात करो।
मैंने एक अच्छा सा मैसेज टाइप करके उन्हें और ब्रोकर को भेजा। लिखा… हमने भरोसे पर कुछ भी ना लिखा- पढ़ी कर तुम्हारे यहां सामान रखा… वापरने को कहा और अभी आप उसे लेजाते वक्त पैसे मांग रहे हो… यह ठीक नहीं है। मैं तनय को, तनवी को क्या कहूंगा..? कि अब भरोसा- विश्वास रखने का जमाना नहीं रहा ?
हमारी गाड़ी मुम्बई पहुंच गई थी। ब्रोकर से बात हुई, उसने भी वहीं कहानी दोहराई, कहा “मालिक को आप 12,000 रूपये दे दो और समान ले जाओ।”
फ्लैट जब लिया था तर ब्रोकर “मारिया” थी.. उससे जब बात हुई तो वह बोली “तुम फ्लैट में सामान छोड़कर ही क्यों गए.. मुझे पूछते तो मैं सामान रखने ही नहीं देती।”
मैंने “कल्पेश” और हमारे “साजिद” से बात की कहा “एक बार मालिक से, ब्रोकर से बात करो… उन्हें फिर से सब बाते समझाओ..फिर भी यदि नहीं सुनते हैं… सामान नहीं देते हैं तो… पुलिस में कंप्लेंट कर दो।” यह जब बात हो रही थी
तब मैं गाड़ी चला रहा था, मेरे साथ मेरा ऑफिस का कर्मचारी “दीपक” बैठा था। हम एक क्लाइंट के पास जा रहे थे। मेरी बात सुनने के बाद वह मुझे कॉन्फिडेंस के साथ पूछता है… “भाऊ काय झालंय? काय प्रॉब्लेम आहे?” जैसा अक्सर हम हमारे कर्मचारी से पूछते है।
मैं उसे संक्षिप्त में यह किस्सा बताता हूं और नेरेट करता हूं “वह आदमी गलत कर रहा है।” “दीपक” प्राउड फील के साथ कहता है… “भाऊ, माझे “काका” मुंबईला “डीएसपी” आहेत। मैं पूछता हुं ” मुम्बईत कुठे?” वह कहता है “‘माहीम’ ला।”
मैंने कहता हूं.. “फोन लाव त्यांना… सांग सर्व… मलाही त्यांच्याशी बोलू दे..।” उसने फोन लगाया.. उन्हें बातें बताई और मुझे फोन दिया। मैंने उन्हें केस समझाई और विनती की कि “आप यदि मालिक को एक फोन करोगे तो शायद वह सामान दे देगा।” उन्होंने कहा कि ” तुम पास के पुलिस स्टेशन चले जाओ.. वहां कंप्लेंन करो.. वे जरूर मदद करेंगे, यदि दिक्कत आती है तो मुझे फोन करो।” यह सुनकर हमारा टेंशन थोड़ा कम हो जाता है। हम थोड़ा रिलेक्स हो जाते हैं।
साजिद को” __ साहब” का मोबाइल नंबर दे देते हैं। साजिद “मेघवाडी पुलिस स्टेशन” जाता है। पहले तो वहां के पुलिस साजिद को डांटते है.. कहते हैं “बच्चे तेरे कौन लगते हैं? मालिक को बुलाओ… तुमने सामान क्यों छोड़ा…. इसमें हम क्या करेंगे?” फिर भी “साजिद” को आर्डर था, वह रुका रहा… अंत में वहां के पीएसआय “श्री मोरे साहब” से मिला। नसीब से वह भी “अमलनेर” के निकले… उन्होंने सब बाते शांति से सुन ली। उन्होंने मुझसे बात की। ब्रोकर से बात की। ब्रोकर अलग-अलग बहाने बना रहा था तो उन्होंने उसे दूसरे दिन स्टेशन आनेका आर्डर दे दिया।
मैंने रात को “मालिक शेट्टी” को फिर से मैसेज किया.. कहा “आपका नंबर हमने पुलिस स्टेशन में दिया नहीं है। यदि आप सामान दे देते हो तो मामला निपट जाएगा।” पर उसने जवाब नहीं दिया ना ही मेरा फोन उठाया।
दूसरे दिन सुबह मैंने घर आए “दीपक” को कहा ” PSI काकांशी बोलून घे, त्यांना एकदा “मोरे सरांशी” बोलण्यास सांग। ” उसने कहा “फोन वर त्यांची बोलनी झाली आहे।”
उधर “साजिद” सुबह 10:00 बजे पुलिस स्टेशन पहुंच गया… “कल्पेश” भी पहुंच गया..। 11:00 बजे “ब्रोकर डिसूज़ा” और “मालिक शेट्टी” दोनों पहुंचे पुलिस स्टेशन..। मोरे साहब के सामने दोनों ने खूब बहाने बनाए… कहने लगे.. यह बाकी है, वह बाकी है..यह खर्चा हुआ, वह खर्चा हुआ। और प्रेशर डालने वहां के नगरसेवक से फोन भी करवाया। तब “मोरे साहब” ने उन्हें फटकारा और कहा कि “तुमने किराया मिलने के 2 महीने बाद डिपॉज़िट वापस किया है.. इसका मतलब क्या है? तुम्हारे पैसे का व्यवहार क्लियर है… इनका सामान दे दो नहीं तो फिर हम इनकी कंप्लेंट लिख लेते हैं।
फिर वे डर गए और अंत में सामान देने राजी हुए पर सफाई, पार्किंग, ट्रांसपोर्ट के ₹ 6000 की मांग रखी। “मोरे साहब” ने मुझे फोन पर कहा कि 6000 दे दो। मैं उनकी आर्डर को नकार नहीं पाया। मैंने साजिद को पैसे देनेको कहा। पर वह पैसे क्यों देने पड़े मुझे अंत तक समझ नहीं आया। शायद ऐसी गलती फिर से ना करू इसलिए।
दूसरे दिन सामान जलगांव पहुंच गया।
धन्यवाद _ आणि मोरे सर।
सच है… पुलिस “सही व्यक्ति” को जरुरत पड़ने पर या उनसे मदद मांगने पर जरूर मदद करते हैं…चाहे कोई भी सिटी या गांव ही क्यों ना हो। एक और बात… ऐसे मुश्किल के वक्त उस एरिया के “नगरसेवक” की भी मदद ली जा सकती है। जैसे इस केस में मालक मि.शेट्टी उनकी गलत बात को छुपाने नगरसेवक की मदद लेने की कोशिश कर रहा था।
तो “आनंद” अब सुधर जा, “आ बैल मुझे मार” थोड़ा कम कर…। क्लियर काम करा कर। हर चीज को, बात को take it granted मत ले। फिर भी इच्छा बाकी है… तो यूं ही चलने दे…
पर life is mysterious फिर भी सच्ची और खूबसूरत है।
आनंद मल्हारा
20/12/20


