इस दीवाली..हमने नहीं तो हमारीSUV गाड़ी नेपटाखें फोड़ ही लिए।

इस दीवाली..
हमने नहीं तो हमारी
SUV गाड़ी ने
पटाखें फोड़ ही लिए।

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इस दीवाली..
हमने नहीं तो हमारी
SUV गाड़ी ने
पटाखें फोड़ ही लिए।



दिवाली का दूसरा दिन… परिवार जनों ने दोपहर 2:00 बजे आउटिंग के लिए ‘निंबादेवी डैम’ जाने का प्लान बनाया… जो करीब घर से 30 कि.मी. की दूरी पर था। अंतर ज्यादा नहीं था तो सोचा जाकर शाम 6:00 बजे तक आराम से लौट आएंगे… डेढ़ घंटा जाना.. डेढ़ घंटा आना और एक घंटा पानी में चील करना.. यानी 6:00 बजे घर पर… और फिर तनय को 7:30 की मुंबई की बस में बिठा देंगे. उसे मुंबई किसी अर्जेंट काम से जाना जो था।

गाड़ियों में निकल पड़े.. 20 कि.मी. तक का रास्ता ठीक था.. Goggle Map की मदद से चल रहे थे.. पतले सकड़े रास्ते से सफर शुरू था। पर अंत के 12 कि.मी. का रास्ता खराब रहा.. ना डायरेक्शन बोर्ड, ना कोई बताने वाला.. रुक रुक कर कोई मिलता उससे पूछकर आगे बढ़ रहे थे। रास्ता कच्चा था – पथरीला था।
जैसे तैसे डैम के ऊपर तक पहुंचे। तब करीब 4:00 बज चुके थे। पूरे 2 घंटे लग गए थे पहुंचने में। 6:00 बजे घर पहुंचने के हिसाब से तो फिर से लौटना जरूरी हो गया था। क्या करें, समज नहीं आ रहा था। फिर घर वालों ने कहा “आए ही हो तो पानी में डुबकी तो लगा लो”… तो हम फटाफट उतरे पाने में और 10 मि. में ही बाहर निकल गए और भाइयों को कहा आप आराम से निकलो पर हम निकलते हैं। मैं, तनय और बीवी निकल पड़े, सोचा वक्त पर पहुंच जाएंगे।

गाड़ी शुरू की… पहली बार आए थे… रास्ते कच्चे थे…अनजाने थे। ठीक से याद भी नहीं था। पहला मोड़ ही चूक गए। थोड़ा आगे गए तो सामने तीन रास्ते आ गए, जो आते वक्त दिखे ही नहीं थे। याददाश्त के हिसाब से सीधे रास्ते आगे गए तो Google Map गलत बता रहा था। फिर से पीछे वही, उसी जगह आए। तभी मोटरसाइकिल पर 5-6 जवान आते दिखे… उन्हें जलगांव का रास्ता पूछा तो उन्होंने कहा “आगे जाकर पहला left टर्न ले लेना…। फिर से आगे बढ़े और left टर्न लिया तो 400 मि. आगे goggle बाबा डेड एंड बता रहा था… । पर सोचा.. थोड़ा जाकर देखते हैं, चेक करते हैं…। रस्ता उतार का था.. संकरा भी और रास्ते पर केवल छोटे छोटे पत्थर ही पत्थर, या बड़े साइज की खड़ी कहो। जैसे तैसे गाड़ी चलते फिसलते नीचे आ गई.. और अंत में रास्ता खत्म और आगे बहती नदी ..। अरे बाप रे.. फिर से रास्ता चुके।

सोचने लगे गांव के लड़कों ने गलत रस्ता बताया या हमारे समझने में गलती हो गई? पता नहीं.. हम आमने सामने थे, उनका लेफ्ट शायद हमारा राइट रहा होगा। बीवी बोली “अब क्या करें?” मैंने कहा “फिर से वहीं जाते है..।” अब गाड़ी रिवर्स लेनी थी..पतला रास्ता, सामने नदी, दोनों साइड में घनी झाड़ियां। वैसे ड्राइविंग करते करते २० साल हो गए फिर भी रिवर्स लेते वक्त आज भी मेरी…… हैं।
तनय को नीचे उतारा और फिर आगे – पीछे… पीछे – आगे करते करते गाड़ी का
यू – टर्न पूरा हो गया..

तनय अंदर बैठ गया और अब गाड़ी को चढ़ाव पर चढ़ाना था। गाड़ी ECO SPORT थी, मेरे लिए तो वहीं मर्सिडीज़ थी। लगा निकल जाएंगे..। फर्स्ट गियर में गाड़ी को ऊपर लेना शुरू किया… केवल तीन चार फीट ऊपर जाते ही गाड़ी गुरु र- गुरु र करने लग गई। एक्सीलेटर दबाया तो पहिए घूमने की आवाज आई पर गाड़ी ऊपर 1- 2 फीट से ज्यादा नहीं गई.. ।गाड़ी बंद करके फिर से कोशिश की तो गाड़ी 3-4 फीट ही ऊपर सरकी और फिर से वही के वही पहिए घूमने लग गए। जितना एक्सीलेटर दबाता उतने जोर से पहिए घूमते.. पत्थर उड़ते.. धूल उड़ती पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ती.. पत्थर जोर से उड़ते और गाड़ी के बेस से टकराते और आवाज इतना जोर से आता की लगता गाड़ी अब टूटी- तब टूटी।

तनय ने कहा “पापा मैं नीचे उतरता हूं… और टायर के नीचे अटके पत्थर निकलता हूं.. आप गाड़ी चलाओ “… उसने पहिए के आगे के पत्थर निकाले और कहा,” पापा अब ट्राई करो… मैंने फिर से गाड़ी स्टार्ट की, एक्सीलेटर दबाया… गाड़ी वही गुर र गुर र गुर र करती 3-4 फीट ऊपर गई और उछलकर रस्ते के साइड में आ गई। गाड़ी की आवाज, धूल ही धूल उड़ना, पत्थर उड़ना और उसका गाड़ी से टकराना और शाम का समय, सुनसान रास्ता सब कुछ डरावना था। मुझे तो लगा आज गाड़ी का एक्सेल या कुछ ना कुछ तो टूटना ही है। तभी तनय ने डरते डरते कहा “पापा गाड़ी में से “धुआं” निकल रहा है।”

मैं भी डर गया। बीवी तो रोने लग गई रोते-रोते बोलने लगी “कहां फंस गए… अब क्या करेंगे, कैसे ऊपर जाएंगे..? मैं तो कब से बोल रही थी, क्या जरूरत है ऐसी जगह जाने की।” जंगल था तो अंधेरा भी होने को था.. 5:00 के करीब बज गए थे। मैं भी नीचे उतरा.. बोनट को हाथ लगाया तो वह भी काफी गरम हो गया था.. लगा शायद इंजन में कुछ प्रॉब्लम हो गया हो। नेट वर्क भी नहीं मिल रहा था। करीब 20 -25 मि. हमने कोशिश की थी। अंत में मैंने भी सरेंडर कर दिया।

बीवी को कहा “रोना बंद करो और तुम तनय को लेकर ऊपर जाओ.. भाइयों को ऊपर जाकर फोन करो, उन्हें जल्दी बुलाओ, जम सके तो “तनय” को दूसरी गाड़ी से जाने दो ताकि उसे बस मिल सके और कोई दूसरा भी मिलता है तो उसे मदद के लिए लेकर आओ.. मैं यहीं रुकता हुं। वे दोनों ऊपर पैदल निकल पड़े। फिर मैंने गाड़ी की मैन्युअल बुक निकाली और देखने की कोशिश की क्या कोई उपाय मिलता है? पर इतने टेंशन में कहां हमारा दिमाग चलता है? 3-4 मिनट इधर उधर पेजेस पलट कर मैन्युअल को फिर से रख दी और सोचने लगा कौन आता है मदद के लिए और कैसे गाड़ी ऊपर जाती है। क्या क्रेन लानी पड़ेगी? करीब आधा कि.मी की चढ़ाई चढ़नी थी।

कुछ ही देर में लोगों की आवाज आने लगती है… और फिर लोग दिखते हैं तो जान में जान आती है। जब बीवी की आवाज आती है तो लगता है चलो कोई आया है मदद करने…। ऐसे संकट के समय बीबी डर जाती है पर अक्सर ” झांसी की रानी” भी बन जाती है। बीवी उन्हें सब बताती है और मदद के लिए कहती है।

सभी आगंतुक जवान थे, उत्साही थे, कॉन्फिडेंट थे.. मैंने उन्हें सब किस्सा बताया। गाड़ी फ्रंट व्हील ड्राइव है इसीलिए सिर्फ आगे के पहिए घूम रहे हैं… वे बता रहे थे। उनमें से एक व्यक्ति ड्राइविंग सीट पर बैठता है, दूसरा उसे कुछ सुझाव देता है.. गाड़ी साइड से उपर लो… और सभी को कहते हैं “चलो धक्का लगाओ”… और गाड़ी शुरू होती है.. एक्सीलेटर दबता है। हम सब धक्का लगाते हैं…गाड़ी थोड़े ऊपर जाकर फिर से फंस जाती है…

गाड़ी के चलते वक्त पत्थर का उड़ना , गाड़ी के तल पर टकराना जारी रहता है.. लगता है जैसे दीवाली के पटाखे फूट रहे हो… छोटे बड़े पत्थर गाड़ी के अलग-अलग पार्ट पर टकराने से बिल्कुल पटाखे फूटने सी आवाज आती है कभी जोर से.. तो कभी धीमे..तो कभी फुस्स।

फिर से उनका आपस में विचार-विमर्श होता है। फिर से गाड़ी स्टार्ट होती है.. हम लोग जोर से धक्का लगाते हैं..गाड़ी के साथ भागते है। गाड़ी धीरे धीरे ऊपर की ओर बढ़ती है.. ऊपर पत्थर कम हो जाते हैं और गाड़ी सही सलामत ऊपर आ जाती है… और हम भी चलते,भागते, हाफते हाफते अंत में रुक जाते हैं..
और घुटनों पर हाथ रख जोर जोर से
सांस भरने लगते हैं।

गाड़ी में से ड्राइवर बाहर निकलता है। मैं उन्हें धन्यवाद कहता हूं, कहता हूं “आप थे तो गाड़ी निकल गई, नहीं तो मुश्किल हो जाती।” यह सुनकर उनमें से एक ने हंसते हंसते कहा… ” गाड़ी नहीं निकलती तो इस घटना का आपका “आर्टिकल” वॉट्सएप पर पढ़ने को मिल ही जाता..” यह सुनकर मैं चौक गया.. हंसने लगा और उत्सुकता से पूछा.. “भाई साहब, मैंने आपको पहचाना नहीं “.. तो उन्होंने भी शॉर्टकट में कहा “फर्नीचर मॉल”…। तब मुझे समझा वे “पटेल परिवार” के सदस्य थे। वैसे भी “पटेल” लोग “डैशिंग – स्पोर्टी” होते ही हैं। हर एक का नाम नहीं पूछ पाया। वे सभी परिवार के साथ इसी “निंबा देवी” डैम पर आए थे। वे भी रास्ता चुके थे इसीलिए नसीब से हमें मिले थे।

हमने उन्हें धन्यवाद दिया। आगे उनके परिवार के अन्य सदस्य भी मिल गए.. उनके बच्चों ने “तनय” को पहचान लिया फोटो शोटो निकाले।
तब तक हमारे भाई भी पहुंच गए थे और वापसी का सफर शुरू हुआ। रिस्क नहीं होना इसलिए “तनय” को दूसरी गाड़ी में बिठाया कारण यदि मेरी गाड़ी को रास्ते में कुछ प्रॉब्लम आता है तो उसकी गाड़ी ना चुके… पर सुख साता से घर पहुंच जाते हैं।

2 दिन बाद गाड़ी का एक पहिया पंचर दिखता है… गाड़ी को जब पंचर के लिए भेजते है तब पता चलता है… आगे के दोनों टायर खत्म हो चुके हैं, उसके “तार” दिखने लग गए थे… दोनों बदलने पड़े..। ट्रिप पास की थी पर महंगी पड़ी।

उस रात सपने में “होम अलोन” इस अंग्रेजी पिक्चर के सीन दिखते हैं… जिसमें छोटा स्मार्ट बच्चा “केविन” चोरों का रास्ता रोकने फर्श पर कांच के कंचे को फेंकता है और चोरों का उस पर जैसेही पैर पड़ता है वे गिरते जाते है.. फिसलते जाते हैं। कुछ वैसा ही हमारी गाड़ी के साथ हुआ था। गाड़ी के पहिए घूमने पर रास्ते के पत्थर उसके साथ घूम जाते और गाड़ी वहीं के वहीं रह जाती। गाड़ी जितनी ताकत लगाती , पहिए उतने ही जोर से घूमते..पत्थर उतने जोर से पीछे फेंके जाते… गाड़ी के तल से टकराते..और गाड़ी वहीं के वहीं।

सही है.. रास्ते के छोटे छोटे पत्थर भी यदि साथ में है तो SUV जैसी गाड़ी को भी आगे जाने से रोक सकते हैं।

अफसोस रहा धक्का मारकर गाड़ी ऊपर लनेका यह एपिसोड ” तनय ” ने मिस किया।

एक और खास बात “प्रोपर साइनेज” न होने से सफर में कितनी मुश्किल हो सकती है। यदि किसी ऑर्गनाइजेशन को “सोशल काम” करना है तो ऐसे आस- पास के सभी खूबसूरत “डैम” के रास्ते पर प्रोपर साइनेज लगा सकते है। लोग धन्यवाद कहेंगे।


पर Life is always misterious but beautiful.


आनंद मल्हारा
१३-१२-२०२०