गीला बदन सुखाने
आदिवासी नुस्का “आग लगाओ”
***
पिछले सप्ताह ऑफिस की ट्रिप गई। हर वर्ष ट्रिप बारिश में जाती पर “कोरोना” ने उसे इस वर्ष सर्दी में तब्दील कर दी।
कम खर्चा करना था… पर नई जगह जाना था तो “आदिवासी इलाके” में दो दिन जाने की सोची।
जगह थी “शहादा” के आगे 50 किलोमीटर पर बसा “बिलगांव”। पहाड़ी पर बसा आदिवासी गांव। जहां मुश्किल से डेढ़ सौ घर होंगे।
वहां दोपहर करीब ३ बजे पहुंचे। आदिवासी के घर में.. वहां के सरपंच के घर में खाने का लुफ्त उठाया। कम मसाले, कम तेल में बनी सब्जी.. फिर भी अच्छी लगी। जो सब्जियां उनके यहां उगति वही खाने में बनती। जो दालें, धान वे बोते वही दाल, अनाज वे खाते।
शायद वह भोजन हम हमारे नित्य जीवन में ना पसंद करें, पर वहां तो हमें उसका इंतजार रहता… कब खाना आएगा? दो तीन बार पूछना पड़ता। कारण घूमते – थक जाते और भूख लग जाती और जब भूख लगती है तो सब “भा” जाता है। तब मसाला कम या तेल कम ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।
वहां गाय -भैंस न के बराबर थी। बकरिया जरूर थी पर उसका दूध उनके बच्चे ही पी जाते। इस वजह से वहां दूध नहीं था। दूध नहीं था तो चाय भी दूध के बगैर ही बनती.. पर गुड पूरा! मीठी मीठी बगैर दूध की चाय।
जहां हम टेंट में रुके थे.. सामने बड़ी-बड़ी पहाड़ियां थी, जगह जगह खेती दिख रही थी और नीचे “उदय” नदी खलखल बह रही थी। अच्छा खासा पानी था उसमें। वहीं एक बड़ा झरना भी था जो धो- धो बह रहा था। उस झरने के नीचे “टूरिस्ट” ना जाए इसलिए पहले ही गाईड बताती है “वहां बहुत अनहोनी होती है, वहां मत जाना! पानी अंदर खींचता है”… वगैरे वगैरे।
चाय निपटाकर हम सब नीचे उतरे… नदी का लुफ्त उठाने। पानी में पैर गीले किए। फिर नज़दीक से झरना देखने गए। मुझे तो तैरने का शौक… पर कोई साथ वाला नहीं था, बताने वाला नहीं था… कहां तैरे। तभी हमें वहां छोटे-छोटे आदिवासी बच्चे ७-८ साल की उम्र के मिल गए। उनसे पूछताछ की तो उन्होंने एक छोटा सा पॉइंट बताया, कहा “यहां पर पानी में छलांग लगा सकते हो, तैर सकते हो कारण यहां पानी गहरा है।” हमने उन्हें उकसाया और कहा “तुम पानी में जंप लगा कर बताओगे तो मैं भी पानी में जंप करूंगा। उन्हें भरोसा नहीं हुआ । जोश जोश में दो बच्चों ने कपड़े खोलें और छपाक कर पानी में सूर मार दीया और तैरने लगे और मुझे पानी में बुलाने लगे। मैं तो वहीं चाह रहा था। मैने भी कपड़े खोले और पानी जंप लगा दी। 10-15 मिनट पानी में हम तैरे।
शाम हो रही थी। ठंड भी बढ़ रही थी। नदी से बच्चे बाहर निकल गए कारण उनके घरवाले उन्हें पुकार रहे थे। बाहर निकले बच्चे “ठंड” से सिकुड़ भी रहे थे तो श्रीमती जी ने बच्चों को पुछा “अब क्या करोगे? गीले कैसे घर जाओगे?” तो उन्होंने कहा “आग लगाते हैं।” बीवी ने कहा ” लगाओ तो आग”। यह सुनकर वे बच्चे नदी के बीच में ऊपर आए बड़े पत्थर पर पेट के बल फटाक से सो गए। बीवी ने उन्हें पूछा “यह क्या कर रहे हो.. आग कहां है? तो उन्होंने कहा “हिच आग आहे, 2 मिनट में सुख जायेंगे”। वे सचमुच में सूख गए थे केवल निकर गिली थी। बीवी ने मुझे पानी के बाहर बुलाया और कहा “तुम भी पत्थर पर उल्टे लेट जाओ तो सुख जाओगे।” टॉवेल तो तब हमारे पास भी नहीं था। मैं भी दूसरे बड़े पत्थर पर उल्टा पेट के बल सो गया… सचमुच पत्थर गर्म थे। उस पर लेटना अच्छा लग रहा था। पत्थर पानी को सोक रहा था। तब सचमें ऐसे लग रहा था… जैसे पानी के बाहर निकल कर आग के सामने खड़े होकर हाथ सेक रहे हो।
बदन सुक गया था पर बच्चों की चड्डी गीली ही थी तो बीवी ने बच्चों को पूछा “अब चड्डी का क्या करोगे?” तो वह बोले “रुको” हाथ किया और बाजू के खड्डे में कूद गए… बीबी डर गई कारण बच्चे दिख नहीं रहे थे। पर 2 मिनट में बच्चे खड्डे में से ऊपर कपड़े पहन कर निकल आए। बीवी ने अचरज के साथ पूछा “क्या किया?” तो उन्होने हंसकर हाथ से कपड़े निचोडने की एक्शन करके बताई… तो हम भी हंसने लग गए। वे खड्डे में उतरे, चड्डी खोली, उसे निचोड कर, झटक कर पहन ली और ऊपर से हाफ पेंट और शर्ट पहन कर जाने को तैयार हो गए। बीवी ने मुझे भी हाथ के इशारों से कहा..आनंद अब तुम्हारी बारी है। मैंने भी वही किया जो बच्चों ने किया और कोई चारा भी नहीं था, पर आजू-बाजू में दूर तक देखा कोई आ तो नहीं रहा।
पर आदिवासी बच्चों ने एक नई बात सिखा दी… बदन सुखाने का नया तरीका बता दिया। उनकी भाषा में “आग लगाना” जो आज तक हमें मालूम नहीं था।
जब मैं तैर रहा था तो मेरे कपड़ों के पास बीवी और दूसरे आदीवासी बच्चे भी बैठे थे जिन्हें तैरना नहीं आता था। मैंने बीवी को इशारे से कहा था.. ध्यान रखना कपड़ों में पैसे रखें हैं। हम रात को जब गाइड के साथ बैठ आदिवासी नृत्य का लुफ्त उठा रहे थे…सभी आदिवासी.. एक ताल में… मस्ती में झूम रहे थे। उनके साथ मैंने भी झूमने की कोशिश की पर शर्म के कारण पैर रुक जाते। मैंने “गाइड प्रियंका” को सहज पूछा जो खुद आदिवासी समाज से थी पर आज वह पढ़ लिखकर शिरपुर में लेक्चरर थी…”सुना है आदिवासी लोग.. पारधी लोग.. चोरी- डकैती करते हैं.. क्या यह सच है? क्या यह जगह सेफ है?” तो उन्होंने कहा “यह गलत बात है।” यह भी कहा “यहां के लोग अनपढ़ है, गरीब है पर यहां चोरी नहीं होती और ना ही वे चोरी करते हैं। इनकी जरूरत है कम है, कम में भी खुश है।” यह भी कहा ” जहां पढ़ाई नहीं है, शिक्षा नहीं है वहां सच्चाई ज्यादा है, वो जगह ज्यादा सेफ होती है।”
पर हमारे दिमाग में अलग तस्वीर बनी है आदिवासी लोगों की।
कल हमारी टीम के आर्ट डायरेक्टर “दीपक” ने एक पोस्ट बनाकर वॉट्सएप पर पोस्ट की… लिखा था “आदिवासी के जीवन को देखकर लगता है, हमें भी अपनी जरूरतें कम करनी चाहिए और उनसे प्रेरित होकर मैं खुद सोच रहा हूं कौन सी ५-६ आदतें को त्याग सकता हूं।”
है ना लाइफ इस simple n ब्यूटीफुल?
आनंद मल्हारा
८-१-२१


