अज्ञान में मज्जा है और अमीर समझने का गुब्बारा अक्सर फूटता है…।
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पिछले सप्ताह की बात है,
ऑफिस में ट्रेनिंग सेशन शुरू था। ट्रेनर परिचित थी… मुझे पता था उन्हें चॉकलेट बहुत पसंद है। ट्रेनिंग का अंतिम दिन था।मैंने सोचा चलो उन्हें एक्सक्लूसिव चॉकलेट्स… ₹ 700-1000/- तक की गिफ्ट करेंगे।
1000/- रुपये की सीर्फ चॉकलेट्स खरीदना मेरे लिए बड़ी बात थी ..और चॉकलेट के लिए यह बड़ी अमाउंट भी। सोचा.. आदमी को भेजेंगे तो ना जाने वह क्या उठा लाएगा… तो खुद ही जाता हूं। सोचा.. डी मार्ट या अन्य जगह इंपोर्टेड चॉकलेट्स नहीं मिलेंगे तो खास “वसंत” में जाते हैं जो नई-नई एक्सक्लूसिव आइटम्स मेंटेन करते हैं और मेरे परिचित भी।
दुकान पहुंचता हूं। मास्क हरदम की तरह नहीं था, सिक्योरिटी गार्ड अडाता है, पर मालिक वहां होते हैं.. तो बुला लेते हैं। हाय हेलो करने के बाद मैं उन्हें कहता हूं “हेमंत भाई, मुझे आपकी मदद चाहिए… मुझे इंपोर्टेड चॉकलेट किसी को गिफ्ट देनी है,
₹ 800-1000 तक की चॉकलेट आप किसे कह कर निकाल कर देने को कहें।”
क्योंकि मुझे लग रहा था कि इन रुपए में इतनी चॉकलेट्स आएगी कि एक बड़ा बक्सा भर जाएगा। सच… झूठ नहीं लिख रहा हूं।
हेमंत भाई शांति से सुनते हैं और कहते हैं “आइए आनंद भाई…” और उनके चॉकलेट सेक्शन में लेकर जाते हैं… वहां “कैडबरी” चॉकलेट का एक बॉक्स बताते हैं और कहते हैं यह ₹600 का है। पैक बड़ा था..पर एकदम पतला था। फिर दूसरा बॉक्स दिखाते हैं.. कहते हैं “चॉकलेट के शौकीन इस ब्रांड को बहुत पसंद करते है, (ब्रांड मुझे याद नहीं) और इसकी कीमत कुछ
₹ 700 के करीब है।” उस बॉक्स की साइज थी केवल 4 ” बाय 5 ” बाय 4 “। याने अपने हाथों की हथेली में बैठे इतना छोटा पैक।
मेरी तो जैसे “हवा” ही निकल गई। खरीदने का जोश ही गायब हो गया। जहां मैं सोच रहा था.. आया था.. एक बड़ा कार्टून चॉकलेट के जाने और ले जा रहा हूं एक छोटा सा पैक। सोचा था 800- 1000 में ढेर सारी चॉकलेट खरीदेंगे पर आज चॉकलेट के सामने लगा ₹ 800-1000/- ने शर्म से मानो अपनी आंखें झुकाली हो। मन ही मन मैं खुद पर, अपनी नादानी पर हंस भी रहा था।
कारण साफ था, मैंने लाइफ में ज्यादा चॉकलेट खाई नहीं, नाही गिफ्ट दी। और नाही किसी चॉकलेट के शौकीन से खास पाला पड़ा।
ऐसा ही एक किस्सा मेरे साथ मुंबई में हुआ था जब में नया-नया मुंबई पढ़ने गया था। बांद्रा में रहता था और VT में कॉलेज था। पहला पहला मासिक पास निकालने जाता हूं… टिकट विंडो पर मैं अकेला होता हूं। जेब में ₹100/- की नोट थी। तब
₹ 300/- में महीना कट जाता था… नहीं अच्छा निकल जाता था… जिसमें एक या दो पिक्चर भी शामिल होते थे।
टिकट विंडो पर ₹100/- की नोट देता हूं और कहता हूं “साब “फर्स्ट क्लास” का पास “मत” बनाना।” कारण फर्स्ट क्लास की अलग लाइन होती थी.. मैं जब खिड़की पर गया था तब केवल अकेला मैं ही था। सोचा.. कहीं वह ₹ 100/- की नोट देख कर या मुझे देखकर यह न समझले कि मुझे “फर्स्ट क्लास” का पास निकालना है। , अच्छे मार्क्स मिला कर मुंबई में पढ़ना.. तो खुद को स्पेशल क्यों ना समझु ? विंडो के बाबू ने मुझे रुक कर.. ध्यान से देखा और कहां “फर्स्टक्लास” के पास का ₹ 165/- लगता है।” तब शायद ₹ 45/- में 3 महीने का सेकंड क्लास का पास बनता था।
तब भी कुछ ऐसी ही हंसी आईं थी जैसे आज हंस रहा था।
ऐसा ही एक और किस्सा है… करीब 20 साल पुराना। बिजनेस अच्छा चल रहा था। जेब में पैसे भी रहते थे। मुंबई गया हुआ था। मुझे चश्मे की फ्रेम में ग्लास लगवाना था। फ्लोरा फाउंटेन पर “गंगाधर ऑप्टिकल्स” करके एक चश्में की फेमस दुकान है। कॉलेज के वक्त से उसे देखते आया हूं पर कभी अंदर गया नहीं। सोचा चलो अबकी बार स्टैंडर्ड दुकान से चश्मा बनाते हैं…तो उस खास दुकान में ग्लास लगवाने जाता हूं। जेब में पैसे भी थे, और खुद को अमीर भी समजने लगा था।
दुकान में गया… उन्हें फ्रेम बताई, नंबर बताया। पासका और दूर दोनों नंबर थे। …और हमारा वार्तालाप शुरू होता है।..सबसे पहले उन्होंने पूछा “आपको प्रोग्रेसिव ग्लास चाहिए या कटलाइन या टिकली वाला?” मैंने पूछा “कितना फर्क पड़ेगा?” फर्क काफी था फिर भी मैंने सोचा जेब गरम है…” महंगा वाला प्रोग्रेसिव बनाओ” मैंने कहा। फिर उन्होंने पूछा ” काच का चाहिए या फाइबर का लाइट वेट? मैंने रूबाब से कहा “लाइट वेट।” फिर वो पूछता है…uv कोटिंग करें क्या? आपको uv लाईट से प्रोटेक्शन मिलेगा। मैंने अब पैसे पूछ ही लिए। बजट बढ़ते ही जा रहा था। मजबूरन हां कह दिया। पर हवा गुल हो रही थी। लग रहा था अब बहुत हो गया। पर सेल्समैन कहां रुकने को तैयार था.. वो फिर से प्यार से कहता है.. “साब ये कंपनी का ग्लास एकदम हाई क्लास होता है, ड्राइविंग में तकलीफ नहीं होगी, महंगा है पर सब बड़े लोग ये ही लेते है। फिर से कीमत का फर्क पुछा तो अमीरी का गुब्बारा पंचर हो चुका था। उसके कुछ और पूछने से पहले ही मैंने परेशान होकर कह दिया “यार सादा वाला ही ग्लास लगा दो… अगले बार भारी वाला देखेंगे।”
और मायूसी के साथ वहां से बिदा होता हूं।
तब महसूस हुआ… अपनी जेब में कितने भी पैसे क्यों ना हो अंत में हम गरीब ही है, असहाय हो ही जाते हैं। किसीने सच ही कहा है… यदि इच्छाओं पर काबू है तो हम अमीर.. नहीं तो परमानेंट फकीर। और शायद इसिलिए इंसान की पैसे कमाने की भुक खत्म होती ही नहीं।
But life is beautiful if it’s simple।
आनंद मल्हारा
18 Jan 2021
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