पंद्रह दिन पुरानी बात है। बिटिया 7 दिन बाद जयपुर, दिल्ली, नासिक होकर जलगांव आई थी। “नासिक रेलवे स्टेशन” से ही उसका फोन आता है कहती है “पापा पेट दुख रहा है, आप स्टेशन पर सिर्फ लेने नहीं, प्लेटफार्म पर आना… सामान उठाने के लिए भी दिक्कत हो रही है।” मैंने हां भरी। उसका जलगांव पहुंचने पर फिर से फोन आता है “पापा आए क्या?” मैं हमेशा की तरह लेट स्टेशन पहुंचता हूं, गाड़ी पार्क करके उसे फोन करके पूछता हूं कि प्लेटफार्म पर कहां खड़ी है? पर वह तबतक समान के साथ बाहर आ चुकी होती है, कहती है “आपके सामने”। मैं उसकी एक बैग उठता हूं और हम गाड़ी में बैठ कर घर की और निकल पड़ते हैं।
मैं उसे ट्रिप के, इवेंट के हालचाल, हाल हवाल पूछता हुं। कहती है “इवेंट ठीक ठीक था पर बहुत सीखने को मिला” और यह भी बताती है कि “पापा ट्रेन में वक्त के पहले मेरे “पीरियडस” आ गए और ग्रेट बात… मेरे पास “पैड” नहीं थे। फिर क्या न करती… २/४ महिलाओं और लड़कियों को पूछती हूं और अंत में एक महिला के पास मिलजाते हैं।” हम दोनों गाड़ी में ही रिजॉल्यूशन बनाते हैं……
“सफर में मम्मी और तन्वी के बैग में एक “पैड” रखना “मस्ट”, खुद के लिए नहीं पर किसी और के लिए।
तन्वी को पेट के साथ कमर में भी दर्द हो रहा था। तबीयत भी थोड़ी खराब थी, थोड़ा बुखार भी आ गया था। । रात को घर में नया आया ऑक्सीमीटर, बीपी की मशीन, टेंपरेचर मोजने की गन इन सभी इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल कर लिया। BP की डिजिटल मशीन पर तीन चार बार चेक करने पर अंत में अलग अलग आए रीडिंग का एवरेज निकल कर खुद को नॉर्मल है समझना पड़ा। रात तक दर्द कम ना हुआ तो पेन किलर दे कर उसे सुला दिया।
दूसरे दिन सुबह भी कमर का दर्द बरकरार था।तनवी कह रही थी “यह दर्द नया है, ऐसा दर्द पहले नहीं हुआ।” सुनकर डर लगना तो स्वाभाविक ही था। और दोपहर 2:00 बजे उसे मैसेज आता है कि उस ब्यूटी पेजेंट की टीम “कोरोना” से इनफैक्ट हो गई है जहां से वो आई थी। यह सुनकर हम सब डर जाते हैं। तन्वी कितनी भी हंसकर बात करे, अंदर से वह भी सहम गई थी। रात को दर्द से राहत मिलने उसे फिर से पैन किलर और बुखार की गोली देते हैं। सोचते हैं…यदि सुबह भी बुखार नहीं उतरा तो “कोरोना” की टेस्ट करा ही लेंगे।
सुबह होती है, पर हालत में सुधार नहीं दिखता, और ना ही ज्यादा बिगड़ती है। सुबह से तन्वी को उसकी टीम के अलग अलग मेंबर्स के मैसेज आते रहते हैं.. “कोरोना पॉजिटिव” होने के। घर में टेंशन बढ़ता रहता है। प्लान के मुताबिक टेस्ट के लिए “अपोलो” से आदमी बुला लेते हैं। रिपोर्ट दूसरे दिन आने वाला होता है।
उसी दिन मुझे औरंगाबाद काम के सिलसिले में निकलना पड़ता है। रास्ते में ढाबे पर खाना खाना, खाने में तेल का ज्यादा होना। गले में खराश शुरू हो जाती है। शाम 5:00 बजे औरंगाबाद पहुंचता हूं और दिव्य मराठी में निशित बाबूजी से मिलकर वापसी के लिए तुरंत निकल पड़ता हूं। जाते वक्त गाड़ी में पीछे बैठा था, रास्ता खराब होने से काफी थकान महसूस हो रही थी। और गले में खराश तो थी ही। वीकनेस फील होता है।
रास्ते तन्वी से दो-तीन बार बातें होती है। आसार अच्छे नहीं थे। मालूम पड़ा तन्वी की दिल्ली तथा जयपुर की रूम मेट “आयुषी” और उसकी मम्मी भी कोरोना पॉजिटिव आए हैं। इतनाही नहीं वह नासिक में जिसे मिली थी उसकी भी तबीयत खराब होने का मैसेज आता है। इन सभी हालत को समझते हुए तन्वी ने खुद को घर में आइसोलेट कर लिया था। उधर बीवी की भी तबीयत नरम गरम थी। तनय को भी अच्छी खासी सर्दी हो रही थी। तन्वी ने खुद को कोरोना पॉजिटिव फील करना शुरू कर दिया था। बीबी अपने आप को कोस रही थी, कह रही थी क्यों भेजा हमने तनवी को दिल्ली में वगैरे वगैरे…?
मैं रात को 11:00 बजे जलगांव पहुंचता हूं। घर में सन्नाटा। सब सो गए होते हैं। मैं भी सोने बेडरूम ऊपर जाता हूं और बेड पर बीबी से थोड़ा दूर लेट जाता हूं। पर आज सोते वक्त “ठंड” होने के बावजूद भी में दूसरी रजाई लेकर सोता हूं। वैसे अलग रजाई लेकर सोने की नौबत शायद ही कभी आती है। यदि आपस में जोरदार झगड़ा भी हुआ होता है तब अक्सर बीवी पहले ऊपर बिस्तर पर जाकर लेट जाती है और मैं उस दिन काफी देर से बेडरूम में जाता हूं…तब जब उसका गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ होता है। पर एक ही “डबल बेड” की बड़ी रजाई में धीरेसे घुस जाता हूं। शायद बीवी भी वही चाहती हो..चलो झगड़ा खत्म हुआ।
पर उस रात मन में कोरोना का डर था। कहीं मेरे कारण उसे या कहीं उसके कारण मुझे ना हो जाए। रात भर अलग रजाई में सोए। थोड़ा तिरछा भी सोया था ताकि हमारे मुंह एक दूसरे से दूर रहे। सांस से सांस कहीं टकरा ना जाए। हां…
देर रात में हम दोनों के पैर एक दूसरे के करीब आ गए थे पर उस के बीच दो-दो रजाईयां थी। शायद तब केवल पैरों का पैरों को एहसास हो रहा था। पर सुबह तक हमारे पैरों की अंगुलिया एक दूसरे से रजाई को पार कर टकरा ही गए। शायद उन्हें मालूम था …पैरों के स्पर्श से कोरोना स्प्रेड नहीं होता।
खैर, सुबह से ही घर में कोरोना मय वातावरण तयार हो जाता है। नसीब से दिन “इतवार” का था। तनवी को अलग रूम दिया जाता है। तनय सभी को “मास्क” पहनना कंपल्सरी करता है।
सर्दी की वजह से उसका गरम पानी पीना, गरम पानी की भांप लेना शुरू था। बीबी का सबको “काढ़ा” देना शुरू था। काम से मैं बाहर जाता हूं तो बीबी घर पर बुला लेती है कहती है “घर पर बैठो, हर वक्त कहा भटकते रहते हो।”
घर में सबको रिपोर्ट का इंतजार लगा रहता है जो 3.00 बजे आने वाला होता है। मैं घर पर आता हूं। आराम करता हूं। सब लोग अपने अपने टेंशन के साथ अपने अपने रुम में लेटे हुए होते हैं। और ठीक 3:00 बजे तन्वीकी चिल्लाने की आवाज आती है, तन्वी भागते भागते नीचे आती है। कहती है “पापा मेरा कोरोना का रिपोर्ट आ गया है। मैं “निगेटिव” हूं, निगेटिव हुं पापा।” हम सबके चेहरे खिल जाते हैं । बीबी, तनय सब इक्कठा हो जाते हैं, तनय को भरोसा नहीं होता है तो वो ऑनलाइन आया रिपोर्ट फिर से चेक करता है। फिर हंसता है। हम सब एक दुसरे से हाई-फाई करते हैं ।
तन्वी खुशीसे कहती है “आई एम स्ट्रांग पापा ” टीम में सबको “कोरोना” हुआ पर मुझे नहीं… Ha ha ha। टेंशन खत्म होता है। चमत्कार होता है और केवल उस नेगेटिव रिपोर्ट से सभी को अपनी अपनी तबीयत ठीक महसूस होने लगती है।
है
है ना लाइफ मिस्टेरियस but beautiful?
देखी ना पॉजिटिविटी की ताकत?
आनंद मल्हारा
14 th Feb 2021


