पगड़ी न पहनने वाले एक सच्चे सरदार की कहानी…

पगड़ी न पहनने वाले एक सच्चे सरदार की कहानी…

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पगड़ी न पहनने वाले
एक सच्चे सरदार की कहानी…

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बागी कहो या जिद्दी था एक सरदार, नाम था “त्रिलोचन”। पंजाब में अमृतसर के पास जन्मा…पहचान हुई मुंबई के “जे जे कॉलेज” के बांद्रा के हॉस्टल में। मुझसे काफी सीनियर था। वो कमर्शियल आर्ट का डिप्लोमा कर रहा था। उम्र ज्यादा थी तो पता चला उसने पहले “पेंटिंग” में डिप्लोमा कर लिया था और अब “कमर्शियल” में डिप्लोमा कर रहा है।

उसका काम बहुत अच्छा था, हम बच्चे अक्सर उसका काम देखने उसके रूम में जाते। फिगर ड्राइंग बहुत अच्छी थी। पढ़ते पढ़ते वो बाहर का काम करता और अच्छे खासे पैसे कमाता। हॉस्टल में हम ऊपर एक ही थर्ड फ्लोर पर रहते थे तो बीच बीच में बात होती रहती। कभी कभी साथ खाना खाने भी बाहर जाते थे।

हॉस्टल में एक दिन मालूम पड़ा.. वो घर जाताही नहीं था। छुट्टी में भी नहीं। उसने शायद एक आध साल के बाद ही दाढ़ी, बाल कटवा लिए थे। पगड़ी बांधना छोड़ दिया था। कारण मालूम नहीं पड़ा।
उसे हॉस्टल में ही रहना होता था तो वो एक कोर्स खत्म हुआ की दुसरे कोर्स में एडमिशन ले लेता और हॉस्टल में एक ही रूम में डटा रहता।

हां पर उसका स्वभाव शांत, मितभाषी, अपने आप में मस्त, ना किसी के लेने में ना देने में। अप टू डेट रहन सहन। शर्ट इन करना, बेल्ट लगाना, शूज को रोजाना पॉलिश करने की उसकी आदत आज भी याद है। एक दोस्त कह रहा था उसका चेहरा “दारासिंग” से मिलता जुलता था।

मेरा डिप्लोमा हो गया, मैंने हॉस्टल छोड़ दी, फिर एक साल अंधेरी के एस पी कॉलेज के बड़े भाई के हॉस्टल में रहा और फिर जलगांव आ गया। पिताजी ने बुला जो लिया था। जलगांव में छोटा स्क्रीन प्रिंटिंग, डिजाइन का व्यवसाय शुरू किया। मुझे याद है शुरू के एक दो साल मैंने “दिवाली ग्रीटिंग्स” के डिजाइन्स खास “त्रिलोचन” से ही बनाए थे। “एक सुंदर गृह लक्ष्मी हाथ में दिया लेकर स्वागत के लिए खड़ी है”, उसके इस डिजाइन से मुझे काफी पहचान मिली। इस काम के लिए जब में मुंबई गया था तब भी वो हॉस्टल में ही रहता था।

वर्ष बीतते गए, संपर्क कम होता गया, पर बीच बीच में “उसकी” दोस्तों के साथ बात निकलती और हाल हवाल मालूम पड़ते रहते थे। और २० साल बाद एक दिन अचानक उसका फोन आता है और पूछता है “आनंद मैं जलगांव आऊ क्या, तेरे साथ काम करूंगा।”

मैंने कारण पूछा तो समझ आया कि मुंबई में तब अकेले रह रहे लोगों की तलाशी , पूछताछ ज्यादा होती थी। आतंकवादियों का आतंक मुंबई में छाया था। और वो भी ११ महीने में घर बदल बदल कर परेशान हो गया था। तबीयत का भी इश्यू था।

उसने पूछा तो मैंने “हां” भर दी। “जलगांव” को और “मल्हार” को हमेशा अच्छे आर्टिस्ट की जरूरत रही है। पहले उसे CMYK press में रखा, वो हाथ से अच्छा काम कर सकता था पर कंप्यूटर पर धीरे धीरे करता था। कुछ साल बाद उसे “मल्हार” में बुला लिया। वो “लोगोज” अच्छे बनाता था। लाइन वर्क में अच्छे “पोट्रेट” बनाता था। उसके बने यूनिक लाइन स्केच के पोट्रेट हम अक्सर “ग्रीटिंग्स” के लिए इस्तेमाल करते जो ग्राहकों द्वारा काफी सराहे जाते।

काम में परफेक्शन था, नखरे भी थे, यही पेंसिल चाहिए, वोही पेपर चाहिए तभी सही काम होगा कहता था। उम्र के हिसाब से थोड़ा निगेटिव भी हो रहा था।
बहुत बार हमारा झगड़ा हो जाता। मैं गुस्से में अक्सर कहता “काम के वक्त प्रोब्लम नहीं सॉल्यूशन ढूंढो कारण क्लाइंट को कमिटेड वर्क पूरा कर कर देना है।” मेरा कहा सुन लेता पर वो शायद ही पलटकर कभी जवाब देता। वो मुझसे करीब १३ वर्ष बड़ा था, ऑफिस में एक वो ही था जो मुझे सबके सामने “आनंद” कहकर बुलाता था। अच्छा लगता था, उम्र कम होने का अहसास होता था।

देखते देखते उसे जलगांव में भी काफी साल हो गए थे। कोई कह रहा था उसे जो मुंबई में पाइल्स की तकलीफ थी वो जलगांव आकर बिलकुल खत्म हो गई।
कंपनी के फ्लैट में “करण” के साथ रहता था । खान पान का पूरा खयाल रखता, वक्त पर खाना, नाश्ते में फल के साथ ५ बादाम खाना । समय पर आना, समय पर जाना उसका नित्य क्रम था। उसे मालूम था… उसेही खुद को संभालना है। उसका कोई भी सगा नहीं है।

पिछले वर्ष जब कोरोना आया था, लोक डाउन लगा था तबसे उसे फ्लैट से ही काम करने को कहा था। वो घर से ही काम करके ऑनलाइन भेजा करता। वक्त पड़ने पर, जरूरत पड़ने पर वो फोन कर देता और काम चल रहा था।

पिछले सप्ताह निखिल बता रहा था.. “त्रिलोचन” की तबियत खराब है । मैंने कहा “रोज बात करते रहो।” तीन दिन पहले मैंने खुद बात की तो बता रहा था “अब तबीयत ठीक है, केवल अंदर से बुखार लगता है। खांसी ने परेशान कर दिया था। हॉस्पिटल गया था, dr Hirani की होमियोपैथी की गोलियां खा रहा हूं, अच्छा लग रहा है।” सुनकर मेरी चिंता कम हो गई, सोचा चलो korona तो नहीं है। जल्द ही अच्छा हो जायेगा।

कल “निखिल” करीब आता है और कहता है “आज त्रिलोचन ने दरवाजा खोला नहीं, दोपहर में आदमी अंगूर देने गया था तो उसने अंगूर पड़ोसी के यहां रख दिए है। करण गया है देखने।” मुझे चिंता होने लगी। मैंने निखिल को कहा “त्रिलोचन का आगे क्या होगा? कौन संभालेगा उसे? अभीतो केवल ७० साल की उम्र है। क्यों न उसे वृद्धाश्रम में रखा जाए? वहीसे वो काम भी करेगा और लोग भी साथ रहेंगे।” निखिल का जवाब था “वो नहीं रहेंगे, वे तो फिट है।” पर फिर भी मेरा मानना था वही सही निर्णय होगा।

बात वहीं रुक गई कारण तब “करण” का फोन आ गया। वह बोला “भाऊ त्रिलोचन रूम में औंधे गिरे हुए है। चड्डी भी भर गई है।” मैंने निखिल को तुरंत जाने को कहा। वो गया और कुछ देर में फोन आता है और कहता है “सर त्रिलोचन सर नहीं रहे। पुलिस को इत्तिला कर दिया है । थोड़ी देर में पुलिस आएगी, आप भी प्लीज आ जाना।”

मैं फ्लैट पर जाता हूं, पुलिस आती है। लाश को देखती है, तलाशती है.. कहां कुछ डाउट तो नहीं, अलग अलग लोगों का जवाब लेती है। फोन चेक करती है, कॉल लिस्ट देखती है। कुछ नंबर पर फोन करती है। सगे संबंधियों को घटना बताती है। और उन्हें आने को कहती है। पर कोई आनेको तयार नहीं होता। एक सगा कह रहा था “पिछले ५० सालों में कभी उसका फोन नहीं आया। उसकी मां, भाई की डेथ हुई तो भी वो नहीं आया। हम आने में असमर्थ है, कृपया फोन मत करो।” पुलिस ने एक को कहा “त्रिलोचन के ३/४ लाख रुपए पड़े है” तो भी वे आनेमें असमर्थता दिखाते है।

मैं सोचने लग गया.. क्यों इतनी नफरत बढ़ती है? क्या ऐसी बचपन में अनबन हो जाती है, या ऐसी कौनसी घटना घटती है जिससे एक लड़का जवानी में घर छोड़ देता है और पूरी उम्र अकेले रहने का फैसला करता है। इतना ही नहीं वो शादी भी नहीं करता है। ऊपर से शराब भी नहीं पिता। सच में उसका जीवन मेरे लिए एक मिस्ट्री बन कर रह गई थी।

मैं बदकिस्मत, मैं उसके साथ सालों रहा,पर प्यार से या जबरदस्ती से, या फिल्मी स्टाइल में शराब पिलाकर भी क्यों न हो…ऐसा क्या हुआ, क्यों वो ऐसा बना जान नहीं पाया।

पर एक बात को नकारा नहीं जा सकता, वह अकेला जिया, मस्त जिया, अंत तक अकेले रहा। मौत की सीढ़ी भी अकेले चढ़ गया। किसके सामने झुका नहीं, मजबूर हुआ नहीं, किसी बैसाखी की मदद ली नहीं। अच्छी सेहत के साथ, अंतिम दिनों तक पसंदीदा “आर्ट” का काम करता रहा, पसंद का खेल “कैरम” खेलता रहा और अंत में उसकी लाश के पास एक थैली में सेब की और दरवाजे के पास अंगूर की पेटी मिली।

कहते है न “ऊपरवाला” सबका हिसाब रखता है, उसने जरूर “यमराज” को कहा होगा “त्रिलोचन” अपना खास बंदा है, वह उम्रभर अकेले रहा है, उसे बगैर तकलीफ दिए vip ट्रीटमेंट के साथ उपर लेकर आना।” और “यमराज” ने भी आदेश का पालन कर सिर्फ एक हार्ट अटैक का धक्का देकर “त्रिलोचन” को परलोक लेकर चला गया।

मानना पड़ेगा, त्रिलोचन ने भलेही पगड़ी न पहनी हो पर था वो सच्चा “सरदार”।

यह थी त्रिलोचन की अपनी, खुदके जीवन की कहानी। अब सुनाऊंगा उसके दफनाने की दर्दनाक आंखो देखी नई कहानी…. क्रमशः

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है ना लाइफ मिस्टीरियस? but also beautiful.

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Anand MALHARA
२१/३/२०२१

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