मजबूरी का नाम महात्मा गांधी…

मजबूरी का नाम महात्मा गांधी…

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(भाऊ ना आदरांजलि…
परिवर्तन संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में शेयर की मेरी एक आप बीती कहानी।)

नमस्ते…
बड़े भाऊ.. आदरणीय “भवरलालजी जैन” मेरे पिताजी के पक्के दोस्त थे। हमारे लिए  पितृतुल्य थे। मुझे याद है मेरे व्यवसाय के लिए लगनेवाली शुरुवाती पूंजी ₹१६,०००/ भाऊ ने ही दी थी। मुझे याद नहीं मैने वे पैसे चुकाए भी या नहीं।

बड़े भाऊ को विविध कला से और कलाकारों से बहुत लगाव था। वे अच्छे अच्छे कलाकार हमेशा साथ रखते थे, उन्हें उचित सम्मान भी देते थे।
“भाऊ ना आदरांजलि” इस कार्यक्रम में तीन दिन तक लगातार अलग अलग कलाकार “बड़े भाऊ” को अपनी अपनी कला के माध्यम से आदरांजलि देने वाले हैं.. तो मैंने सोचा क्यों न मैं भी अपनी एक आपबीती कहानी आपके सामने रखकर बड़े भाऊ को आदरांजलि अर्पित करू?
वही कहानी जिसने मेरे “दिमाग का दही” बनाकर रखा है पिछले २_३ महीनों से।

किस्सा है हमारी कंपनी “मल्हार कम्यूनिकेशंस” और “लोकमत न्यूज पेपर्स” का। हमारे एडवरटाइजिंग के व्यवसाय में पेपर में विज्ञापन देना यह एक महत्वपूर्ण सर्विस होती है। इसी काम के लिए”लोकमत” ने हमें वार्षिक व्यवसाय पर एक “इंसेंटिव स्कीम” दी थी। साल के अंत में  “इंसेंटिव” कैलकुलेट हो रहा था, अकाउंट टैली करना जारी था। ३० साल में पहली बार ऐसा हो रहा था कि हम दोनों के फिगर्स में फर्क आ रहा था। टैली करने के बादमें मालूम पड़ता है कि “लोकमत” ने उनकी स्टेटमेंट में एक बिल लिया नहीं था। एक प्रकाशित विज्ञापन का उन्होंने बिल बनाया नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उस एक विज्ञापन को किसी खास वजहसे “लोकमत” द्वारा “फ्री” में प्रकाशित हुआ था।

हमारे सीनियर अकाउंटेंट “शाहजी” मेरे पास आते हैं और दबी हुई आवाज में कहते हैं…कारण ऑफिस में केबिन नहीं है.. और शायद दूसरा कोई सुन न पाए इसलिए भी।
“भैया, “रमेश दादा” का जो ७ महीने पहले “लोकमत” में विज्ञापन डाला था उसका बिल “लोकमत” ने नहीं दिया है, उसे “फ्री” में प्रकाशित किया गया है जबकि उसका पेमेंट “रमेश दादा” ने हमें कर दिया है।

मैं पूछता हूं “कौनसी एड ? कितने रुपए की थी ?”
वह कहता है “दु:खद निधन वाला विज्ञापन का और उसकी बिल राशि है ₹ ३.०० लाख।”

मैं भी सोचने लग जाता हूं, उसे पूछता हूं “क्या करना है?” वह गर्दन झुका कर चुप चाप खड़ा रहता है।
“लौटा दे… पैसे है क्या देने?” मैं कहता हूं। तो वह कहता है “हालात तो खराब है भैया।” बात भी सही थी कोरोना… लोक डाउन का समय… बिजनेस में लॉसेस शुरू थे। जबकि स्टाफ कम कर दिया था। जो आ रहे थे उन्हें भी आधा पगार दिया जा रहा था। मैंने कहा “ठीक है..चलो, बादमें देखते हैं।” वह चला जाता है।

देखते देखते ढाई महीने गुजर गये पर हालात के सुधरनेके आसार नहीं नजर आए। वापस एक दिन “शाह” को टोकता हूं, पूछता हूं “पैसों की व्यवस्था हुई क्या?” तो वो कहता है… “आर सी का पेमेंट आएगा तो उसमें से पेमेंट कर देंगे।” सुनकर सकून मिलता है।

वैसे ३ लाख की अमाउंट बड़ी नहीं थी पर ३ लाख का मुनाफा कमाना हमारे व्यवसाय में काफी बड़ी बात थी। ३ लाख कमाने के लिए कमसे कम ३० लाख का व्यवसाय करना जरूरी होता है।

पैसे देने थे… पर मजबूरी थी। इसलिए दादा को कह नहीं पाया कि “दादा” आपका विज्ञापन “लोकमत” ने “फ्री” में प्रकाशित किया था, आपसे लिए पैसे जल्द ही लौटा दूंगा.. अभी तंगी है। क्या मालूम.. क्यों  “तंगी है या पैसे नहीं है” कहने में संकोच हो रहा था… या शायद कहीं छुपी हुई, दबी हुई स्वार्थी नियत आड़े आ रही हो। खैर…

पर दिमाग में पैसे लौटाने के विचार अक्सर हर रोज सुबह आते जब मैं “मेहरून तालाब” के बीच में तैर रहा होता जहां से “दादा का बंगला” साफ दिखाई देता। कैसे दादा को पैसे देंगे, क्या दादा को ऑफिस में बुलाया जाए और सबके सामने अकाउंटेंट “शाह” के हाथों से “दादा” को चेक दिया जाए… लोकमत के साब को भी बुला लेंगे  ताकि उन्हें भी जानकारी रहे वगैरे वगैरे सोचते रहता।

और ४ दिन पहले “भाऊ ना आदरांजलि” कार्यक्रम का मैसेज पढ़ता हुं… २ दिन पहले मैं भी इसके आयोजन समिति में हूं समझता है। तो दिमाग भागने लगता है, सोचता है… कहता है…. एक कलाकार के नाते “क्यों ना यह “किस्सा” यह “स्टोरी” “परिवर्तन” के मंच से, “भाऊ ना आदरांजलि” कार्यक्रम के माध्यम से जलगांव के सामने रखूं और सबके सामने दादा से माफी मांगू। लोग रहेंगे तो हिम्मत भी रहेगी”।

अब आप सोचेंगे… मेरी इस निजी कहानी का और इस “भाऊ ना आदरांजलि” कार्यक्रम से क्या संबंध? तो मेरा मानना है कि बड़े भाऊ आदरणीय भवरलालजी जैन एक सच्चे इंसान थे, अपने आप से ईमानदार थे। सच बोलने का, गलती स्वीकारने का साहस रखते थे। मुझे याद है एक बार उन्होंने ऑल इंडिया में एक विज्ञापन प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने कंपनी के सभी स्टेक होल्डर्स से माफी मांगी थी और लिखा था…” i am sorry, मेरी कुछ गलत निर्णयों से कंपनी का काफी सारा नुकसान हुआ है। इन गलतियों ने काफी कुछ सिखाया है जिससे भविष्य सूखकर होगा।”

तो मैंने भी सोचा… क्या हर्ज है यदि मैं भी एक कड़वी सच्चाई सबके साथ शेयर करू और अपने मन को हल्का कर लूं? और ऊपर से देख रहे श्रद्धेय  बड़े भाऊ और उनके दोस्त अर्थात मेरे  पिताजी को यह कहूं कि “हम भी आपके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे हैं।”

आज इसी मंच पर मैं इस स्टोरी का 
“दी एंड” करना चाहता हूं। मैंने साथमें ₹ २.५ लाख का चेक लाया है और मैं मंच पर बैठे “भरत दादा” को इसे देता हूं और बिनती करता हूं कि वे इस चेक को “रमेश दादा” को देवे और मेरी और से “क्षमायाचना” करे कि मुझे पैसे लौटाने में ३ महीने का अतिरिक्त समय लग गया जिस पर मेरा नैतिक अधिकार नहीं था।

(फिर लिफाफा बंद चेक भरत दादा को दिया जाता है)

थैंक यू।

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Yes if we dare We can make our life beautiful.
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आनंद मल्हारा
२ मई २०२१, जलगांव

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नोट.. उपरोक्त “स्क्रिप्ट” का लिखा मेरा कागज मुझे मेरी बैग में आज फिर से मिला तो सोचा क्यों न इसे भी मैं मेरे ब्लॉग पर डाल दूं।

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