इरादे नेक हो तो मुमकिन है हर काम करना !

इरादे नेक हो तो मुमकिन है हर काम करना !

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क्रमशः
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पूर्वार्ध …

“मुझे भी देना है
कोविड विपदा में मेरा सामाजिक योगदान”!

कोविड पेशंट्स के निकटतम परिचितों के लिए “सेवा भाव” से भोजन उपलब्ध कराने की इच्छा दोस्त “प्रल्हादभाई” ने जताई थी। वे भोजन उनके होटल के किचन में बनाकर देने वाले थे। भोजन को बांटने की जिम्मेवारी “दिलीपभाई” ने ली थी, अब सवाल था फाइनेंसर का, आर्थिक सहयोग देने वाले दाताओं का । हर महीने ५० से ६० हजार के खर्चे का बजट बना था।

मैंने सबसे पहले हमारेही परिवार के दो युवाओं के सामने यह प्रपोजल रखा, कहा यदि तुम तुम्हारी एक पगार इस प्रोजेक्ट के लिए देते हो तो यह प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है। पर उसमे सफलता नहीं मिली।

फिर मैंने सोशल पोस्ट द्वारा सभीसे अपील की थी। पोस्ट  इतवार को सुबह १०.०० बजे वॉट्सएप पर डाली।
और १० बजकर १५ मिनिट पर फोन आता है । “पप्पूभाई” कहते है “आनंदजी १ महीने का खाना मेरी तरफसे।”
इस खुशी को लिखकर बयां करना मुश्किल है। १०.२५ पर शुभचिंतक मित्र (मनमौजी)  CA अभयराजजी का फोन आता है और कहते हैं “हमारे २० लिख लेना, वीरुभाई और मेरी तरफ से”।तभी शायद सुनीलभाई का भी मैसेज आता है उनके सहयोग का। ठीक से याद नहीं पर दोपहर में एक फोन आता है.. कहते हैं ” मैं मदनलाल, तुम जो अच्छा काम करने की सोच रहे हो तो मुथा परिवार की तरफ से १० लिख लेना।” वानखेड़े सर, ईसाई सर,अनिल भाई ने भी मदद करने की इच्छा मैसेज कर जाहिर की। मैं निश्चिंत हो गया। दिल खुश हो गया।

दो_ तीन दिन बाद अचानक एक दोपहर एस.के. ऑईल मिल से हमारे परम स्नेही “विनोदभाई का फोन आता है और वे कहते है “रोज के ५० टिफिन हमारे तरफ से लिख लेना। कबसे यह सेवा देने की मेरी इच्छा थी पर कैसे करे समझ नहीं आ रहा था, तुम कर रहे हो तो निश्चिंत हो गया।”

मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया। लगा अब योजना को कार्यान्वित करने में कोई रुकावट नहीं है।
फिर मीटिंग हुई। कहां, कैसे, कब खाना बाटेंगे इसपर विचार हुआ, निस्वार्थ फाउंडेशन, रॉबिनहुड , युवा ब्रिगेडियर आदि स्वयं सेवकों से भी बात हुई, सभीने दिल से मदद करने की ग्वाही दी। हमारे निखिल ने हर अस्पताल में भोजन के समय जाकर सर्वे किया। कहां कितनी जरूरत है जानने की कोशिश की। मेरी यह भी इच्छा रही की “मल्हार” का स्टाफ खुद जाकर भोजन को बांटे। बाटेंगे तो कुछ समझेंगे,सीखेंगे।

फिर एक सवाल मेरे ही दिमाग में घर करने लगा की हम क्या कहेंगे लोगों से? कौन बाट रहा है इसे ? यह मिलिजुली सरकार थी। सच में नाम का, प्रोटोकॉल का चक्कर बहुत पेचीदा होता है, जटिल होता है। इस मामले में हमारे एक दोस्त की तारीफ करनी होगी, उसने ट्रस्ट का नाम ही “अबोली” रखा , और बेस लाइन रखी
“जनसेवा काहीही न बोलता।”

नया काम था, प्लानिंग में वक्त लग रहा था और उधर कोविड के पेशंट्स कम हो रहे थे। रोज़ कम हो रहे थे।
एक दाता को फोन लगाया तो उन्होंने भी यही कहा तो सोचने लग गए क्या करें? फिर से सर्वे किया तो सचमुच कोविड से संबंधित लोगों के भोजन की जरूरत बहुत कम हो गई थी।

अब क्या करें, रुक जावे या और कुछ अलग करने का प्रयास करें? ऑफिस में चर्चा हुई, किसने कहा अभी वैक्सीन का दौर चल रहा है, क्यों न वैक्सीन सेंटर पर कोई सेवा दी जाए? चाय, पानी वगेरे। मैंने हाल ही में रेड क्रॉस में दूसरा डोस लिया था। गर्दी देखी थी। सोचा चलो उनके पदाधिकारी से बात करते हैं। गनी भाई को फोन लगाया तो उन्होंने कहा “अच्छी बात है”। साथ में एक और नया प्रस्ताव उन्होंने रखा जिसकी जलगांव जिले को सही मायनो में जरूरत थी।

प्रस्ताव था..  “ऑटोमेटेड रिपोर्टिंग सिस्टम फॉर कोविड्  आरटी पीसीआर टेस्ट” को “गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज” में कार्यान्वित करना। इसके तहत कोविड के रिपोर्ट को लगने वाला ३ दिन का समय केवल  ६ घंटों में तबदील होने वाला था। यदि रिपोर्ट जल्दी आता है तो पेशेंट के मनोबल के लिए, डॉक्टर्स की ट्रैटमेंट के लिए बहुत लाभदाई सिद्ध होगा। जिसका खर्चा करीब १ लाख ६० हजार था (१ लाख रिपोर्ट्स के लिए)। प्रस्ताव सही लगा। अच्छा लगा।

सभी दाताओं से फिर से बात की , उन्होंने फिर विश्वास दिखाया, सम्मति दे दी। विनोद भाई ने तो खुले दिल से कहा कितनी अमाउंट भेजनी है बताना। पप्पू भाई ने बगैर ज्यादा बोले कह दिया ५१ लेकर जाना।

और दो दिन पहले यह प्राणली कॉलेज में शुरू हो गई।

है ना मजेदार  कहानी.. कहां से शुरू हुई और कहां खत्म, समज ही नहीं आया! पर एक बात समझ में आई, अच्छी सोच के साथ वैसी सोच रखने वाले बहुत लोग… छोटे_ बड़े सब जुड़ जाते हैं। हर व्यक्ति अच्छा करना चाहता है,  उसे सिर्फ भरोसे की जरूरत होती है। केवल जरूरी है उसकी वो तार को कोई छेड़े।

दूसरा “नाम” का चक्कर बहुत ही पेचीदा होता है। हर कोई , हम सब नाम के दीवाने होते है। नाम से ऊपर उठना सचमें बहुत मुश्किल लगता है।

कहते है.. सुना है…मदद ऐसी करो की दाए हाथ से
दिया दान बाए हाथ को ना समझे।

मुझे देखना है ..मैं खुद भी कब नाम से बाहर निकल पाता हूं?

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धन्यवाद ।
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Yes…लाइफ इस ब्यूटीफुल। जितना स्वार्थ कम उतनी ज्यादा खूबसूरत।

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आनंद मल्हारा।
७ मई २०२१

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