आज घर में छोटी पार्टी थी, बीबी की पार्टी थी। कमाने वाली बीबी, सर्विस करने वाली बीबी की पार्टी थी। उनके स्कूल के टीचर फ्रेंड्स आनेवाले थे। नाश्ता करवाना था। तो “कैटरिंग” का कॉन्ट्रैक्ट “हसबैंड” को अर्थात मुझे ही मिलना था, जो मिला।
“कम मेहनत” और “दिमाग को आराम” देना है तो मुझे लगता है …जलगांव का सबसे आसान एवम हिट मेनू याने “मिसल पाव” साथ में स्वीट गुलाबजामुन या जलेबी और कुछ फल.. n done। मैंने यह मेनू बीबी को सुनाया, उसके फायदे बताए, उसके गुण गान गाए कारण उसे आज भी, जलगांव में रहते ३५ साल के बाद भी “मिसल” से प्यार नहीं हुआ बल्कि उसके नाम से ही गुस्सा आता है। अंत में बीबी ने “नाक मुरडते” मेनू को हा भरी। मेरा जोर “मिसल” पर ही था कारण इसी बहाने मेरा अपना भी “संडे मिसल” का शौक पूरा होने वाला था।
गेस्ट कम ही थे तो “मिसल वाला” घर आकर सर्व करने राजी नहीं हुआ। ऑफिस के योगेश को पिंपराला से मिसल, और गुजरात से गुलाब जाम लाने का काम सौंपा गया।
नाश्ता किसमे देंगे ? तो सोचा “यूज न थ्रो” वाली प्लेट्स ले लेते हैं। यह सोचते वक्त शनिवार के दोपहर के ३.४५ बज चुके थे। ४.०० बजे दुकानें बंद होनी थी। गया आदमी मार्केट में , मिली “कागज” की प्लेट्स, पर जैसे सोचा वैसी “कड़क” नहीं थी। चाय के छोटे छोटे कप भी लिए जो मुझे पसंद नहीं आए। वैसे भी मुझे कागज के “छोटू कप” में चाय पीने का मज़ा ही नहीं आता , शायद आपको भी नहीं आता होगा।
रात को फिर से “प्लेट्स” के लिए पूछताछ की तो मालूम पड़ा “रविवार” को किराना दुकान सुबह ७ बजे से खुलती है और “वसंत” में वैसी प्लेट मिलेगी यह कन्फर्म किया।
सुबह ७ बजे जाता हूं , पसंद की “कड़क प्लेट्स” खरीदता हूं। करीब ५० प्लेट, ५० बाउल,, ५० ग्लास और चाय के ठीक ठाक कप खरीदता हूं … बिल पूछता हूं तो करीब ९९५/का बनता है। खूप अखरता है। मैंने मजाक में कैशियर को कहा “१००० रुपए में तो पार्टी हो जाती है, और आज सिर्फ प्लेट्स के लिए १०००/ रुपए। वो भी हंसने लग गया। पर मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। एक घंटे बाद पार्टी जो शुरू होने वाली थी। बीबी ने पहलेसेही वार्निंग दी थी, कहा था “काम “स्टैंडर्ड” मंगता है, स्कूल में नाम खराब नहीं होना चाहिए.. तुम हो कंजुस, स्कूल में फला फला मैडम ने पिछले सप्ताह पार्टी दी थी, ये ये मेनू में था, मेरी पार्टी उससे अच्छी दिखनी चाहिए, बस।” में बीबी की बात अच्छी तरह से समज गया था।
पार्टी शुरू होती है, सब लोक एंजॉय करते हैं, प्लेट में तेज लाल लाल गर्म मिसल, उपर कटा कांदा और उसके उपर सफेद ठंडा दही, साइड में दो पाव_ नींबू , उसके एक खाचे में गुलाबजामुन, बाउल में फल आदि दिए जाते हैं। चाय_ कॉफी का भी दौर चलता है। केक कटता है, कोई गाना गाता है, कोई नाचता है तो कोई शेर सुनाता है। सब खुब हंसते हैं फोटो, सेल्फी का दौर चलता है और दो घंटों में पार्टी खत्म हो जाती है।
में उपर से नीचे “लॉन” में देखता हुं जहां पार्टी हुई थी, तो मेरा ध्यान वहीं साइड में पड़ी बड़ी “डस्ट बिन” पर जाती है…. जिसमें वही सब सुबह खरीदी हुई “कड़क प्लेट्स,कप आदि ” “कचरा” बन कर पड़ी होती है। यूज n थ्रो । उसका “यूज” हो गया था अब “थ्रो” भी हो गया।
पर उसे देखकर दिल और दिमाग दोनों को दर्द होता है। तकलीफ होती। है। खाने पर खर्चा हुआ तो फिरभी सुकून मिला, कारण लोग खुश हुए, खाते खाते हंसे खिलखिलाए। पर “प्लेट्स, बाउल, ग्लास, कप” आदि पर १/४ खर्चा करना और बादमें उसीका “वेस्ट” क्रिएट करना और उसे “नष्ट” करने या “ठिकाने” लगाने कॉर्पोरेशन को काम पर लगाना… ठीक नहीं लगा।
एक तरफ हम पर्यावरण की बात करते हैं, वहीं दूसरी और “यूज न थ्रो” का अति वापर भी करते है। कहीं तो फिर से सोचने की जरूरत महसूस हुई।
मन ही मन निश्चय करता हुं…घर में उतनी स्टील की प्लेट नहीं रख सका तो टेंट से ही सही, रेंट पर लूंगा पर ऐसी “यूज न थ्रो” वाली प्लेटस को कमसे कम इस्तेमाल करूंगा।
मुझे याद है.. एक बार हमारे दामादजी घर आए थे और बता रहे थे.. यूरोपियन देशों में अब “लंबे” समय तक चलने वाली वस्तुओं का फिर से चलन शुरू हुआ है.. प्रोडक्ट के टैग पर प्रोडक्ट की “लाइफ” अंकित की होती है। This all to protect our Valuable Nature.
लाइफ इस ब्यूटीफुल न also round n It comes back.
आनंद मल्हारा
४ जुलाई २१, जलगांव


