मा. स्व. पृथ्वीराज कपूर साब “जलगांव” को प्लीज माफ करें।

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बात है…हकीकत है…
जलगांव के “मेहरून तालाब” के किनारे बसा “शिवाजी उद्यान” आज खंडहर सा दिखता है, बेंचेस टूटे है, बच्चों के खेल का सामान गायब है, बच्चों का छोटा, अनोखा, प्यारासा “स्विमिंग पूल” के केवल अवशेष आज वहां मौजूद है। “हट” की छत गायब है। छोटा “माउंटेन” है पर उसका झरना बंद है। फूल पौधे का सवाल ही नहीं। फॉरेस्ट विभाग का बना तार का कंपाउंड भैसों के लिए टूटा पड़ा है। जगह जगह कूड़ा कचरा पड़ा है। कहां पाउचिस तो कहीं बॉटल्स पड़ी है। और विशेष वहां नगरपालिका का छोटा कार्यालय भी है।

पर यदि आज भी हम शिवाजी उद्यान को गौर से देखें, हर टूटे हुए पार्ट को देखें, उसकी डिजाइन को, उसके आर्किटेक्चर को देखें तो उसकी खूबसूरती छुपाए न छुपेगी । जब वह बना होगा, तो सचमुच वह एक महाराष्ट्र का “अनोखा विशेष बगीचा” रहा होगा और शायद इसीलिए 60 वर्ष पूर्व 1957 में उसका उद्घाटन मा. स्व. सिनेस्टार पृथ्वीराज कपूर के कर कमलों द्वारा स्व.भीकमचंदजी जैन (तत्कालीन नगराध्यक्ष) ने करवाया होगा।

तब के लगाए गए वृक्ष आज यहां आसमान छू रहे हैं। ठंडी हवा और घनी छांव देते है। मुझे याद है बचपन में हमें यही हमारे पिताजी घूमाने लाते थे, यहां अनेकों पार्टियां हुआ करती थी।

यहां मुझे कुछ खास बातें दिखी जिसे मैं आपसे शेयर कर रहा हुं। इस पूरे इलाके में, करीब २०_२५ एकड़ में केवल तीन जगह ऐसी थी जो एकदम साफ सफाई वाली थी। वहां की दिवालो को कलर लगा था…

पहली थी… एक छोटा “शिवजी का मंदिर”, दूसरा… बगीचे से लगी “मस्जिद” और
तीसरी थी… प्रवेश द्वार पर स्थित “छत्रपति शिवाजी महाराज” का स्टेच्यू।

इन तीनों जगह पर सफाई थी और सही कलर लगा था। कारण भी है हम सबके श्रद्धेय और भगवानजी जो विराजीत थे वहां पर।

सोचने लगा…क्या “निसर्ग” “फूल पत्ती” देवता नहीं होते? क्या “बगीचा” भगवान नहीं हो सकता? क्यों उसके नसीब में अक्सर गंदगी होती है? क्या उसे साफ रखना हमारा धर्म नहीं बन सकता ? जबकि वहां के बड़े बड़े वृक्ष जो हमें दिन रात ऑक्सीजन देते हैं, दे रहे हैं। ऑक्सीजन की कीमत क्या होती है यह भी जाना है हम सबने पिछले १८ महीनों में। खैर, जल्द ही वो वक्त आएगा जब हम नेचर को पूजेंगे, उसका सम्मान करेंगे।

एक और मजेदार बात.. शिवाजी उद्यान में ही करीब 20 साल पहले शुरू हुआ था JK park जिसने बगीचे में फिरसे “जान” डाली थी। राइड्स, बोटिंग, रेस्टोरेंट शुरू हुआ था। कुछ वर्ष वो जोर शोर से चला.. फिर धीरे धीरे बंद हो गया और पिछले कुछ सालों से वहां पर केवल शादियां_ फंक्शन होते थे। हाल में शायद वो भी बंद हो गया और उसका गेट पूरा बूंद हो गया, गेट पर नोटिस का बोर्ड लग गया और गेट पर एक “वॉचमैन” बैठा मिला।
बस बैठा था। रखवाली कर रहा था।

सोचता हूं… बगीचे में जहां आज भी सेकड़ो लोग आते हैं, तालाब के पाल पर, गणेश घाट पर जहां सुबह से रात तक लोग बाग आते है, तालाब में पूजा का सामान “श्रद्धा” के साथ डालते हैं। घूमने वाले खाद्य पदार्थ खाकर पाउचेस, कागज के टुकड़े, भेल की प्लेट्स, चम्मच इधर उधर फेकते हैं। रात को “रंगीन” लोग पाल पर बैठकर ठंडी ठंडी हवा खाते “पार्टी” करते है। “बॉटल” भी मस्ती में फोड़ते हैं। कितने लोग वहां “सुसाइड” करते हैं पर उन्हें रोकने के लिए “नगरपालिका” के पास एक भी “वॉचमैन” नहीं या उसके लिए बजट नहीं पर “बंद गेट” की रखवाली करने एक वॉचमन जरूर बिठाया है!

“शिवाजी उद्यान” को देखकर आज भी लगता है यदि संभव है तो पूरा नूतनीकरण करें या बजट नहीं है तो जो स्ट्रक्चर टूटा है उसे सिर्फ रिपेयर और कलर करेंगे और फूल पत्ते लगा देंगे तो भी बगीचा चमक उठेगा। एक साथ नहीं कर सकते तो हर महीने थोड़ा थोड़ा काम कर सकते हैं और उसे नया जीवन दे सकते है….

यदि ये भी हो जाता है तो ऊपर बैठे “मा. पृथ्वीराज कपूरजी” से हमें मुंह नहीं छुपाना पड़ेगा। वे जरूर जलगांव को माफ कर देंगे।

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है ना… लाइफ इज कन्फ्यूजिंग बट ब्यूटीफुल?

आनंद मल्हारा
25th जुलाई 2021, जलगांव