पिछले सप्ताह की बात है, मैं ज्योति भाभी को पूछता हूं “भाभी आपके मम्मी की तबियत अब कैसी है?” वे कहती है ” ठीक है, पहलेसे बेहतर है, अब उन्हें घर पर लाया है, पर बहुत वीक हो गई है, उसे अब पकड़कर उठाना पड़ता है, एक सिस्टर को घर पर रखा है।”
भाभी की मां जो की अब ८२ वर्ष की है, नासिक में बेटे के साथ रहती है, थोड़े दिन पहले तबियत ज्यादा खराब हो गई थी तो भाभी नासिक गई थी मां के साथ रहने, उसका साथ पाने करीब १५ दिनों के लिए।
मैंने भाभी को कहा हमें तो डर लग रहा था कहां कुछ अनहोनी न हो जाए कारण उम्र के साथ काफी कॉम्प्लिकेशंस भी थे उनके साथ। वो बोली “हां हमे भी डर था।” मैंने पूछा “मां की कुछ इच्छा बाकी रही है क्या?” बोली “कुछ भी नहीं, वो खुश है। समाधानी है। मम्मी ने ही कहा.. ” मुझे घर ले चलो” और खास बात उसने दादा ( भैया ) से लिखवाकर लिया है “यदि मेरी तबियत ज्यादा खराब होती है तो मुझे अस्पताल में सलाइन तक तो ठीक है पर वेंटीलेटर मत लगाना, मेरे मुंह में, नाक में नली मत डालना, मुझे घर ले आना और आराम से जिंदगी से बीदा होने देना।”
सुनकर सच में अच्छा लगा। लोग अपने अंतिम समय के बारे में सोच रहे है और उसे शेयर कर रहे है।
दो दिन पहले ऑफिस में बैठा था, हमारे परिचित आर्टिस्ट दोस्त “जोशीजी” आते है। बातों बातों में सेहत के बारे में बात चलती है…
तो उनकी श्रीमतीजी को डायबिटीज का प्रोब्लम है । डायबिटीज की गोली खाती है, उस गोलीसे एसिडिटी बढाती है, पर वो एसिडिटी को कम करने गोली नहीं खाती क्योंकि उसके साइड इफेक्ट्स ऑक्सीजन से रिलेटेड थे। उन्हें अस्थमा का भी प्रोब्लम था, लंग्स 15% कम काम कर रहे थे। डॉक्टर ने उन्हें रातको ऑक्सीजन सिलेंडर लगाने की सलाह दी, पर उन्होंने वो करने से इंकार कर दिया कहा “उससे मेरी नेचुरल breathing की ताकत जीवनभर के लिए कम हो जायेगी, मैं उसपर डिपेंड हो जाऊंगी, मैं जैसी हूं उसमें ही अच्छा रहना है।”
जोशिजी ने खुद भी उनकी बेटियों को कहकर रखा है की “I am more than happy with my life। मुझे मेरे अंतिम समय में हॉस्पिटल नही, क्रिटिकल सेंटर नहीं किसी जंगल में, पानी के करीब, जहां पक्षियों की किलकिलाहट हो… वहां ले जाना, अच्छासा मेरे पसंद का म्यूजिक लगाना ताकि मैं आपके साथ बाते करता करता या आपको देखते देखते मौत को गले लगाऊं.. इस दुनिया को अलविदा कहूं।
सच में लोग अब अच्छा जीना चाहने लगे हैं। और उनमें से भी अनेकों अपना अंतिम समय भी अच्छे तरीके से, निसर्ग के नियम का सम्मान करते अपनाना चाहते हैं ना कि टेक्नोलॉजी के सहारे उससे झगड़ा करते।लोग मौतके बारे में सोचते हैं, सपने बुनते हैं, बोलते हैं।
सच है किसीने लिखा है ..
जिंदा रहने के मौसम बहुत है मगर
जान जाने की ऋतु रोज आती नहीं ।
मुझे याद है मेरे पिताजी का अंतिम समय। अंतिम 8 _10 दिन , पैरालिसिस का दूसरा अटैक, फिर ब्रेन में ऑपरेशन, वेंटीलेटर पर 6_8 दिन और फिर अल बिदा।
हम इस बीच हमारे श्रद्धेय “भाऊ” से मिलने गए थे, जो पिताजी के विशेष दोस्तों में से एक थे। हमने पूछा की अब क्या करें? पिताजी वेंटीलेटर पर है। रिकवर भी होते है तो ज्यादा इम्प्रूवमेंट की आशा नहीं, हैंडीकैप ही रहेंगे। जो इंसान जिंदगी को जश्न मानकर जीता रहा वो ऐसी हारी हुई लाइफ जीएगा क्या? कठिन सवाल था।
वे भी क्या कहते.. वही कहा जो अक्सर हम कहते है ” जितनी कोशिश संभव है करना अपना काम है।” हमने भी वही किया।
पर उन 10 दिनों में वे “कोमा” में ही रहे और हम सब हॉस्पिटल के बाहर चमत्कार की आशा में बैठे रहते । और अंदर से मिलते रिपोर्ट (आंखे खुली , गर्दन हिलाई, हाथ हिलाया इ.) को सुन कर खुश होते रहते। ना हम उनके पास बैठकर उन्हें देख पाए न वो हमें। ना उनकी सांस थमने की घड़ी को अनुभव कर पाए। ICU में जो थे।खैर….।
हमारे जाने के बाद हमारे अपनो को तकलीफ न हो इसलिए बहुत कुछ प्लान करते है, पर अपने खुद के अंतिम समय को कैसा सुंदर, यादगार बनाया जाए इसपर भी विचार किया जा सकता है।
बाबू मोशाय… जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं। सही लिखा है किसी ने।
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है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल !
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आनंद मल्हारा
जलगांव, 4 अगस्त 21


