20 साल बाद एक बार फिर “विपश्यना”।

20 साल बाद एक बार फिर “विपश्यना”।

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भाग१
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हां, 20 वर्ष पहले गए थे दोनों साथ में विपश्यना करने इगतपुरी में। वह मेरे लिए एक “लाइफ टाइम” एक्सपीरियंस रहा था। फिर से इच्छा जाग रही थी… पर पूरे 10 नहीं 12 दिन निकलना …संभव नहीं कर पा रहा था। बीबी भी तैयार नहीं थी।
अबकी बार जब बीबी ने भी हां भर दी तो तुरंत बुकिंग कर ली। असल में बीबी को उनके “बीपी” पर कंट्रोल मिलाना था। बुकिंग में कुछ दिक्कत आई तो मित्र “अनिलजी” ने काम कर दिया। पर अबकी बार विशेष याने साथमें हमारे समधीजी “वीरूभाई” एवम “भारतीजी” को भी साथ ले लिया।

वहां पहुंचे, एंटीजन टेस्ट हुई, सभी को अलग अलग रूम अलॉट हुए। अचानक वहां हमें “तनय” की दोस्त “ऊर्जा” के पापा उदय जी मिले..वे स्वागत में हाथ जोड़े “सेवक” बनकर खड़े थे। वे जलगांव से वहां “साधना” करने और साथ में “सेवा” देने आए थे। गर्व हुआ उनपर और जलगांव पर। तब अचानक क्लिक हुआ जो “बाप” अपनी बेटी का नाम “ऊर्जा” रख सकता है.. अलग तो होगा ही।

वहां पहुंचतेही सबसे पहले “बीबी” को बाय बाय करना पड़ा पूरे 10 दिनों के लिए। ऐसा करते हुए अबकी बार शायद अंदर से थोड़ी थोड़ी खुशी भी हो रही थी ..चलो अब अकेले रहेंगे। थोड़े फ्री रहेंगे। और उन्हें भी प्रैक्टिस होगी खुद के साथ रहने की। पिछली बार जब विपश्यना करने आए थे तब जवान थे, तब 10 दिनों में केवल एक बार हम दोनों “बाय लक” एक दूसरे को देख पाए थे। अबकी बार मालूम नहीं क्या होता है।

रूल के मुताबिक “मोबाइल” जमा करना पड़ा, वैल्युएबल्स, किताब आदि जमा करनी पड़ी। “आर्य मौन” रखने को कहा गया। बिलकुल “खाली” हो गए ऐसा लग रहा था। शंभूजी का “कबीर” याद आ गया, लग रहा था जैसे असली “फकीर” बन गए हैं।

….क्रमशः….

but लाइफ इज ब्यूटीफुल

आनंद मल्हारा
१३_९_२१

(१० दिन का शिविर था, एक पोस्ट में लिख पाना संभव नहीं… २_३ अलग अलग पोस्ट द्वारा विपश्यना की सैर करेंगे।)