किस्मत लेकर बनती है कांच की खाली बॉटल!

किस्मत लेकर बनती है कांच की खाली बॉटल!

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एक दिन तालाब से तैर के आ रहा था तो सुबह घूमने वाला एक ग्रुप रुककर कहता है, “मल्हारा जी आपकी पेपर वालों से अच्छी पहचान है… प्लीज आप जरा इन “पार्टी” करने वालों का बंदोबस्त करो ना… देखो इधर उधर कितनी “बॉटल” बिखरी पड़ी है… आनंद भाई शाम को “फैमिली” के साथ घूमने में डर लगता है।”

मुझे भी मालूम था… सुबह ट्रैक पर पड़ा कचरा देखकर रोज तकलीफ होती थी। पर शाम को इन्हें जो घूमते वक्त डर लगता है उसकी मुझे कल्पना नहीं थी।

बात भी सही है। “मेहरून तालाब” के “पाल” पर लेट शाम को बहुत से युवा बच्चे ग्रुप में आते घरसे दिखते थे। वे आराम से पाल पर बने नए “कठड़े” पर बैठकर “पार्टी” करते । “पार्टी” है तो साथ में स्नैक्स के अलग अलग पाउचेज़ भी लाते, कागज की, प्लास्टिक की ग्लासेस भी लाते। सुबह हम जब वहां घूमते है तो ये सब कचरा रोज ट्रैक पर बिखरा पड़ा मिलता। अनेकों बार तो फूटी हुई बॉटल्स भी रास्ते पर बिखरी पड़ी दिखती।

सोचने लगा.. जो भी पार्टी करते हैं वो पार्टी करने ऐसीही एकांत की , प्राइवेसी वाली जगह ढूंढते है, और यहां तो ऊपर से ठंडी ठंडी हवा है, सामने पानी ही पानी, ऊपर खुला आकाश, चांदनी रात और क्या चाहिए पीने वाले को? उपरसे कोई खर्चा नहीं, कोई बोलने वाला, टोकने वाला भी नहीं। चुप चाप पीते, निकल जाते। हां कभी कभी हल्ला गुल्ला या जोर जोर से ठहाकों की आवाज भी आती।

सोचते सोचते एक और विचार मन में आया… यदि “कंप्लेन” करते है तो “पीने वाले” यहां कम आयेंगे। इससे हो सकता है “शराब” की बिक्री पर भी असर हो।
“शराब” कम बिकी तो “वाइन शॉप” का छोड़ो अपनी “सरकार” का क्या होगा? वो कैसे चलेगी? उसे तो दिक्कत हो जायेगी। वो तो चाहती हैं शराब ज्यादा बिके और उन्हें आसानी से टैक्स मिले। शायद इसीलिए कुछ राज्यों में तो शराब की होम डिलीवरी की योजना भी बनती दिख रही है…।

एक और मजेदार बात.. ट्रैक पर रोज “नई नई बॉटल” दिखती, जो आज दिखती वो दूसरे दिन गायब हो जाती। अगले दिन फिर से नई बॉटल पड़ी मिलती। लेकिन प्लास्टिक पाउचेस का कचरा वैसेही पड़ा मिलता, जबकि नगरपालिका यहां सप्ताह में एखाद बार सफाई करती हुई दिखती है। फिर मालूम पड़ा कि जो कचरा इक्कठा करके उसे बेचते हैं वो बच्चे, महिलाएं ये खाली बॉटल्स इक्कठा कर उसे बॉटल खरीदने वाले व्यापारी को बेच देते हैं.. जिससे उन्हें अच्छे पैसे मिलते हैं और उनका पेट भी पलता है।

ये है अपनी असली हकीकत… सरकार को भी शराब के “टैक्स” की जरूरत, कचरा इक्कठा करने वाले को भी खाली बॉटल की “पेट” भरने के लिए जरूरत।

फिर भी दिल और दिमाग ने कहा… शराब पब्लिक प्लेस पर पीना, इधर उधर कचरा डालना, बॉटल फोड़ना गलत ही है। कंप्लेन करना तो बनता है। जनता की यह तकलीफ सरकारी अधिकारियों तक, नगरसेवकों तक पहुंचना जरूरी है ताकि इसपर रोक लग सके और “आम जनता” मेहरून तालाब के पाल पर शाम को परिवार के साथ “बिन दिक्कत” घूम सके।

काश… खाली प्लास्टिक के पाउच को भी सरकार अच्छा भाव मिलवा पाती तो रास्ते में पड़ा “प्लास्टिक” का कचरा भी ऑटोमैटिक साफ हो जाता। वैसे घर में फूटे कांच को तो काई “भंगार” वाला भी नहीं लेता पर “खाली कांच की बॉटल” तो किस्मत लेकर बनती है।

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है ना… life is funny sometimes..

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आनंद मल्हारा
3rd oct 2021