मेंढक को कराहते हुएकभी सुना है?

मेंढक को कराहते हुए
कभी सुना है?

  • 79 Views

दिवाली का दूसरा दिन, भाई दूज का दिन , हम सभी परिवार के सदस्य “नाइट आउटिंग” के लिए पद्मालय के पास के एक फार्म हाउस पर गए थे।

दूसरे दिन सुबह सुबह बाहर घूमने निकले। थोड़ी दूरी पर “मूकपाट” नामक “बैक वाटर” का विशाल जल पात्र था। हम सब वहां स्नान या स्विम कर सके इस अपेक्षा के साथ जाते हैं। आगे जाते हैं तो देखते है वहां जा रहा कच्चा पक्का रस्ता पानी में डूब गया था। दोनों ओर की खेती भी पानी में डूबी थी। थोड़ा साहस कर पानी में डूबे रास्ते को टटोलते टटोलते चलने की कोशिश कर रहा था। धीरे धीरे घुटने तक पानी आ गया तो फिर से पीछे आ गया कारण आगे न तो रास्ता समझ आ रहा था.. ना ही कहीं उसकी गहराई का अंदाजा आ रहा था। पानी के अंदर से अनेकों जगह झाड़िया बाहर निकली हुई थी। थोड़ा डर भी लग रहा था।

पलट जाता हूं, और उसी पानी में डूबी सड़क से धीरे धीरे बाहर आता हु। जैसे ही रास्ते पर आता हूं.. वहां कुछ पतली
की.. ईइ , की… ईइ…आवाज सुनाई देती है। रास्ते के साइड में जो छोटे बड़े पौधे थे वहां से वो आवाज आ रही थी। पहले लगा किसी पंछी की आवाज होगी। थोड़ा और आवाज की और ध्यान देता हूं तो दिल धक_ धक हो जाता है।

देखता हुं, पानी के किनारे..छोटी छोटी जंगली झाड़ियो में एक मेंढक उल्टा पड़ा कराह रहा था। मेंढक की जो नॉर्मल आवाज होती है.. टरर..टर्र की वो पूरी बदल चुकी थी। की ई इ.. की ई इ.. की आवाज से लग रहा था जैसे वो “रो” रहा है, दर्द से “कराह” रहा है। थोड़ा करीब जाकर ध्यान से देखता हूं तो आंखे खुली रह जाती है, आगे आए दो कदम डर से अचानक पीछे हो जाते हैं।

एक बड़ा मटमेला “सांप” करीब २ इंच मोटा झाड़ियों में हिलते दिखता है। उसका केवल २_३ फिट का हिस्सा पानी के बाहर गोलाकार जीग जैग शेप में हिलता हुआ दिखता है। ध्यान देने पर समझता है की सांप के मुंह में मेंढक का एक पैर था, सांप ने मेंढक के एक पैर को अपने मुंह में दबोच के रखा है और वो शायद उसे निगलने का प्रयास कर रहा हो। सांप का पूरा शरीर धीरे धीरे हिल रहा था और मेंढक मरने के डर से या हो रहे दर्द से कराह रहा था, अपने पैर को छुड़ाने छटपटा रहा था, जोर जोर से कराह रहा था।

घरवाले भी सभी वहां पहुंच जाते हैं। सभी उस दृश्य को देख डर जाते हैं, स्तंभित हो जाते हैं। सबके चेहरे पर अलग अलग भाव दिखते हैं। बच्चे पार्टी अपने मोबाइल से उस दृश्य को कैद करने की कोशिश करते हैं। हम सब बड़े भी सांप को “हाड़.. हाड़” करने की या उसे “ए सांप चुपचाप मेंढक को छोड़” ऐसा कहने की जुर्रत नहीं कर पाते.. जैसे हम अक्सर कुत्ते के होते झगड़े के वक्त करते हैं। कारण “डर” था.. सांप कहीं बाहर हमारी और न आ जाए।

पर सांप स्मार्ट था। उसे हमारी “बू” आ जाती है। उसकी कंपन, उसकी हलचल तेज हो जाती है। मालूम नहीं उसने २_३ मिनिट में मेंढक का कितना “पैर” और मुंह में खींच लिया..पर उसका रिवर्स (उल्टे पैर) पानी में सरकना शुरू हो जाता है और पल भर में वो पानी में डूब जाता है, निकल लेता है। तभी पानी में “छपाक” की आवाज आती है। वो आवाज मेंढक के छलांग की थी। और दोनों अदृश्य हो जाते है। जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो और हम सब होश में आ जाते हैं।

लगता है जब “सांप” पानी में मेंढक के पैर पकड़ कर गया होगा तो शायद उसे मुंह खोलना पड़ा होगा। या उसे मेंढक को मुंह में दबोचे स्थिति में पानी में रहना संभव नहीं रहा होगा, और जैसेही सांप ने पानी में मुंह खोला होगा मेंढक ने अपना बाहर खींच लिया होगा और जोर से छलांग लगा दी होगी… मौत के मुंह से बचने।

परिवार के एक महिला सदस्य कहती है “चलो अपने कारण एक प्राणी को जीवन दान मिल गया.. सुबह सुबह एक पुण्य का काम हो गया।” तो दूसरी महिला सदस्य बोल उठती है “नहीं.. हमने सुबह सुबह एक प्राणी का भोजन छीन लिया है.. हम पाप के भागीदार बन गए हैं।” सच कहो तो हमने कुछ किया ही नहीं था। सांप को मेंढक को दबोचना और हमारा उधर से निकलना एक महज इत्तफाक था, पर वो सांप की बदकिस्मती बन गई और मेंढक की खुश किस्मती।

खैर, कहानी का यहीं अंत करते हैं, शायद जो होता है अच्छे के लिए ही होता है यह मानने में ही मुझे समझदारी लगती है। आपकी क्या राय है?


पर मानना पड़ेगा… लाइफ है ब्यूटीफुल n थ्रिलिंग।


आनंद मल्हारा
११/११/२१, जलगांव