अंतिम भाग ६
*
अब तक इधर उधर की, विपश्यना के आजू बाजू की, मेरे मन की बहुत बातें हो गई, पर आज “विपश्यना” की ही बात करेंगे।
जानते हैं संक्षिप्त में साधना के १० दिन….शिबीर के पहले दो दिन सांस पर ध्यान देना होता है। बादमें सांस के स्पर्श को महसूस करना होता है। इन चार दिनों में अपना कोसंट्रेशन करने की ताकत बढ़ जाती है। मन थोड़ा एकाग्र हो जाता है।और फिर शुरू होती है “विपश्यना” की पढ़ाई… “विपश्यना के प्रैक्टिकल” ।
आ. गोयनकजी ने पहले दिन कहा “कल से विपश्यना सिखेंगे, कल मन का कठिन ऑपरेशन करेंगे, आपको पुरुषार्थ दिखाना होगा।” यह सुनकर हम भी “मन” पक्का करते हैं।
दूसरे दिन सुबह खाना खाने जाते है, तो देखते हैं आज का खाना खास था, एक मिठाई, पुलाव साथमें बूंदी रायता आदि। दिमाग फिर सोचने लग जाता है, आज ही क्यों मिठाई? फिर याद आया कल आ. गोयनकाजी कह रहे थे.. मन का कठिन ऑपरेशन है, पुरुषार्थ दिखाना होगा। तो शायद यह खाना “मन” को ऑपरेशन के लिए “स्वस्थ” करने का कोई प्रयोजन होगा। मुझे अचानक “बकरी ईद” याद आ गई, “बकरी” की कुर्बानी देने के पहले उसे अच्छा खिलाया जाता है। कुछ वैसा तो नहीं हो रहा अपने साथ या महज़ यह एक इत्तेफाक है? मालूम नहीं, किससे पूछें?
“विपश्यना” में हमें “आंखे” बंद करके अपने “शरीर” की “यात्रा” करनी होती है। “सर” से लेकर “पैरों की अंगुलियों तक”। शरीर के जीन अवयवों पर अपना बस नहीं चलता उसे देखना होता है। वहां होने वाली संवेदनाओं को महसूस करना होता है। जैसी है उसे स्वीकार करना होता है।
विपश्यना में हम महसूस करते हैं.. हर आनेवाली संवेदना “नश्वर” होती है, आती है जाती है। कैसे हर संवेदनाओं को साक्षी भाव से देखना, उससे राग या द्वेष नहीं करना यह समझाया जाता है। जितना मन निर्मल उतनी शरीर में ज्यादा संवेदनाएं ।
पर “विपश्यना” यह एक अनुभव की बात है। करके देखने की बात है। इसपर मैं ज्यादा लिख नहीं पा रहा हुं। आपको खुद कर के देखना होगा। पर विश्वास रहे यह आपके जीवन का एक “यादगार सफर” होगा। जीवन में कुछ “शुद्ध चीज” पानेका सफर होगा।
विपश्यना करते करते आप “बैठना” सीख जाओगे। यदि आप एक पोजिशन में १०_१५ मिनिट से ज्यादा बैठ नहीं सकते होंगे तो यहां धीरे धीरे “एक घंटे” तक बैठ सकोगे। कमर सीधी रख कर सुखासन में या कोई भी आसान में बैठना कितना मुश्किल होता है वह यहां समझ में आता है।
तब लगता है स्कूलों में जमीन पर सीधे कैसे बैठना सीखना कितना जरूरी होता है। आज तो कितने बच्चे ऐसे हैं जो जमीन पर बैठते ही नहीं।
कल एक वॉट्सएप पर मैसेज आया था, एक शिष्य “भगवान बुद्ध” को एक सवाल पूछता है कहता है “i want happiness… क्या करूं?” भगवान बुद्ध कहते हैं … “First remove I (अहंकार) फिर Want को हैप्पीनेस में से निकाल दो। यदि ये दोनों काम कर लेते हो तो तुम्हारे पास केवल happiness बचेगा।
बस यही बताते हैं , केवल बताते नहीं प्रैक्टिकल करवाते हैं १० दिनों तक ताकि हैप्पी रहने की प्रोसेस समझ में आ जाए और उसे जीवन में बसाने, उतारने की साधना जीवनमें निरंतर चलती रहे।
सबका मंगल हो।
*
समाप्त।
*
है ना सीधे बैठना अब जरूरी?
*
आनंद मल्हारा
२४_९_२१
Note .. विपश्यना के बारे में ये मेरे विचार है, मेरी समझ है। विपश्यना शायद इससे काफी परे हो। मैंने जो २ शिबीर में समझा, जो अनुभव किया उसे लिखने का
प्रयास किया है। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उससे जुड़ सके, अपना कल्याण कर सकें।
*.
***


