किस्सा… मेरी “डायरी” का मेरी आसक्ति का, मोह का मेरी व्याकुलता एवम दुःख के कारण का ।

किस्सा… मेरी “डायरी” का मेरी आसक्ति का, मोह का मेरी व्याकुलता एवम दुःख के कारण का ।

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विपश्यना भाग ५
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पिछली पोस्ट में मैंने जिक्र किया था…
चौथे या पांचवे दिन हमारे “टीचर” मुझे पास बुलाते हैं और पूछते हैं… “तुम्हारे पास कोई किताब है क्या?” मैंने कहा.. “नहीं”! “कुछ डायरी पेन? मैंने “हां” कहा। उन्होंने कहा “उसे रिसेप्शन में जमा कर दो,”। मैंने चुपचाप उसे सुना। कुछ बोल नहीं पाया। मालूम नहीं मेरे पास डायरी है यह मैसेज टीचर तक कैसे पहुंची?

पर मैं डिस्टर्ब हो जाता हुं। मन में बस वही विचार आने शुरू हो जाते हैं। किसी पर भी ध्यान लगता नहीं। आंखे बंद की नहीं की “डायरी” के विचार आने शुरू हो जाते है। लग रहा था जैसे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

एक दिन और गुजर जाता है, मैं डायरी जमा नहीं कराता। दूसरे दिन “सेवक” पुनः मुझे “डायरी” की याद दिलाते हैं। मैं सेवक को कहता हूं “मुझे डायरी मेरे पास ही रखनी है, किससे अनुमति लेनी पड़ेगी यह बताओ”। उन्होंने कहा “सर को बता दो”।मैं वहां के सीनियर सेवक के पास भी जाता हुं, उन्हें मेरी समस्या बताता हुं, कहता हुं “मुझे डायरी रखने की अनुमति चाहिए, मैं लिख लेता हूं तो मुक्त होता हूं उस “विचार” से। मेरी “साधना” अच्छी होती है। वे कहते हैं “तुमने पहले नियम पढ़े नहीं थे क्या?” मैं गर्दन हिलाता हुं। “मैं अनुमति नहीं दे सकता पर तुम तुम्हारे टीचर से उनके रूम में जाकर बात कर लो, साधना शुरू होने में १० मिनिट बाकी है।”

मैंने उनसे पूछा ” वे कौनसे रूम में रहते हैं ?” उन्होंने कहा.. “8 4” !,
मैं 5_7 मिनिट ढूंढता रहता हूं पर.. 8 4 मिलता नहीं। फिरसे एक “सेवक” को पूछता हुं.. “रूम 8 4” कहा है? वो कहता है “शुरू में ही वो रूम है।” में फिर से पीछे जल्दी जल्दी जाता हुं जहां से में एकबार गुजर चुका हुं और वहां AT4 का बोर्ड दिखता है, फिर दिमाग की बत्ती जलती है..समज में आता है 8 4 का मतलब 84 नहीं…AT4 है। ऐसे पहेली जैसे रूम नं देने की वजह अंत तक जान नहीं पाया।

टीचर के रुम में जाता हुं, उन्हें कहता हूं.. “सर, मैं डायरी मेरे पास रखना चाहता हूं। मैं डायरी में रोज दिन भर में आए “नए विचार” लिख लेता हूं, जो बादमें अक्सर याद नहीं रहते।” वे कहते हैं “अब अच्छे याद रहेंगे, ट्राई करो।” मैं कहता हूं “डायरी जमा करना याने मेरी फ्रीडम खत्म हो गई, ऐसा फील हो रहा है, मुझे लग रहा जैसे में जेल में आ गया हुं…जहां मैं लिख भी नहीं सकता। मैं बहुत डिस्टर्ब हो रहा हूं इस विचारसे। मेरी साधना में ध्यान लग नहीं लग रहा है। यदि आप कहते हो तो मैं वापस “घर” लौट जाता हुं यदि मेरी “डायरी” से आपको इतनी परेशानी हो रही हो तो।” टीचर कहते है “तुम्हें उस चीज से बहुत ज्यादा लगाव हो गया है, उससे अटैच्ड हो गए हो इसलिए तुम्हें ऐसा फील हो रहा है, हमें बंधनों में से मुक्त होना है।”

मैं एक और दलील पेश करता हुं.. कहता हूं “साधना के दरम्यान यदि मैं “कालवश” हो जाता हुं तो मैं क्या सोच रहा था, मेरे मन में क्या चल रहा था ये कैसे मेरे घर वालों को मालूम पड़ेगा?” उसका वे कोई जवाब नहीं देते, कहते हैं.. “यदि तुम पहले इसकी अनुमति मांगते तो तुम्हें यहां प्रवेश ही नहीं मिलता।” फिर कहते है..”ऐसा सोचो.. तुम्हारी डायरी गुम गई है।” मैं फिर चुप हो गया। मैं उन्हें यह भी कहता हूं “तुम लगे तो मेरी डायरी चेक कर लो.. यदि उसमें तुम्हें कुछ गलत लगता है, अनुचित लगता है तो आप डायरी ले लो।” उससे भी बात बनी नहीं तो मैं हमारे जलगांव के मित्र “श्री मूचरिकर साब” का नाम लेता हूं और कहता हूं “आप उन्हें मेरे बारे में पूछ सकते हैं।” वे उत्सुकता से पूछते हैं “आप कैसे जानते हैं उन्हें?” वगैरे वगैरे, “आपके वो परिचित है यह हमारे लिए भी गर्व की बात है । जब आप उनसे मिलोगे तो वे भी आपको बताएंगे क्यों यहां किताब, नोटबुक, पेन,रेडियो आदि वस्तुएं वज्र है।”

इतनी सब बात होने के बाद मैं थोड़ा “निराश” पर थोड़ा “हल्के” मन से धम्म हॉल में लौट आता हुं और साधना के लिए बैठ जाता हुं।

“समस्या” पर बात होती है तो मन जरूर “हल्का” हो जाता है। कहते है ना “खुदकुशी” करने वाले व्यक्ति से यदि उस घड़ी कोई बात कर ले तो वो “खुदकुशी” टल जाती है।

शाम को जब में रूम में आराम कर रहा होता हुं तब कोई “दरवाजे पर दस्तक देता है! दरवाजा खोलता हुं.. देखता हुं वही “धम्म सेवक हाथ जोड़कर चेहरे पर मुस्कराहट लिए खड़ा होता है। उसकी मुस्कराहट तब मुझे “जेलर” जैसी लगती है..। मजबूरन मैं मेरी डायरी उसे दे देता हुं, वो पूछता है.. “पेन” ? मैं बैग की चैन से “पेन” भी निकाल कर देता हुं। वो पूछता है “और कुछ”? “नहीं” मैं कहता हुं। मन में आता है चिल्लाकर बोलू “ये हाथ भी ले जा.. जो लिखने काम आते हैं।”

मैंने वैसे एक दिन पहलेही “डायरी” के तीन पन्ने फाड़ लिए थे और उसे बैग में नीचे छुपा कर रख दिए थे, उन्होंने “पेन मांगा, पेन दे दिया, “पेंसिल” नहीं पूछी तो वो “नहीं” दी।

आगेके शायद ४_५ दिन “पेंसिल और पेपर” से काम चलाया, जहां पहले दिन भर में एक “पन्ना” लिखता था वहां बादमें “५_६ लाइन” में लिखना निपटा लेता था। पर हां “कागज” को कभी “गादी” के नीचे, कभी “तकिए” के नीचे तो कभी “पेंट की जेब” में छुपाकर रखता था। डर था कहीं कोई सेवक आकर रूम चेक न करले। और हां दिन में या रात को कुछ लिखता भी था तो अब दरवाजा, खिड़की बंद करके लिखता था। मन ही मन में डर था नियम के खिलाफ कर रहा हूं.. मानो कोई चोरी कर रहा हूं।

वैसे वहां “शील” का पालन करना होता है उसमे एक शील “झूठ नहीं बोलना” होता है, मैं “झूठ” बोला पर मेरा मानना था यह झूठ “झूठ” नहीं है, उनका एक दकियानूसी नियम है जिसे बदलना जरूरी है।

पर गौर करने का विषय है। हम किसी चीज से कैसे चिपक जाते हैं, कितनी अहम हो जाती है वो हमारे लिए, कितना अहंकार होता है हमें हमारी सोच पर, हमारे प्वाइंट ऑफ व्यूज पर। इतना ही नहीं हम उसके लिए कोई भी कुर्बानी देने तैयार हो जाते है, मैंने तो मेरी मौत को भी वहां जोड़ दिया, शिविर को बीच में से छोड़ने तक का विचार कर लिया। और यही हमारा स्वभाव हमें व्याकुल करता है, दुःखी करता है। ऐसा आ. गोयनकाजी बताते है।

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क्रमशः
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but लाइफ is full ऑफ learnings।

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आनंद मल्हारा
२२_९_२१

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