हाथ जोड़ “देह बोली” बोल कर “धम्म सेवक” देते हैं “अनुशासित” सेवा।

हाथ जोड़ “देह बोली” बोल कर “धम्म सेवक” देते हैं “अनुशासित” सेवा।

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विपश्यना भाग ४
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इगतपुरी के धम्म सेंटर पर “सेवा” देने अनेक साधक आते हैं जो अलग अलग विभाग में अपनी.. वैसे कहो तो “निस्वार्थ सेवा” देते हैं। पर सही मायनों में वे ज्यादा फायदे में रहते हैं। सेवा देते हैं तो सेवा देनेका उन्हें लाभ मिलता है, खुशी मिलती है। और उपर साधना भी करते हैं… तो वो एक्स्ट्रा लाभ के भी हकदार बनते हैं।

धम्म सेवकों की ट्रेनिंग बड़ी जबरदस्त होती होगी। धम्म सेवक का लेबल उनके गले में लटका होता है। सेंटर के नियम कानून का खुद पूरा पालन करते हैं और हाथ जोड़कर साधकों द्वारा करवाते भी है। वे साधकों का पूरा ध्यान रखते हैं, उन्हें पूरा सम्मान देते हैं।

कुछ किस्से याद हैं…शेयर कर रहा हुं…

पहला….जब मुझे “रूम” मिली तो देखा गादी गीली थी। दो बार कंप्लेन की। सेवक आए गादी देखी और नई गादी दूसरे खाली रूम से निकालने का प्लान बना , मैंने गाड़ी निकालने में मदत करनी चाही, पर उन्होंने कहा “नहीं नहीं” आप “साधक” हो, यह काम “सेवक” का है और दूसरे सेवक ने “गादी” उठाकर मेरे रूम में लगाकर दे दी और दोनों हाथ जोड़कर चले गए।

एक और किस्सा याद आ रहा है, मैंने मेरा टॉवल और अंडरवेयर को बाहर लगे रोप पर सुखाने रखा था। बारिश के कारण कपड़े सूखते नहीं थे। कपड़े सुखाने छोड़कर मैं साधना करने चला गया। साधना के वक्त धुंआधार बारिश हुई। मुझे कपड़े की याद आई। सोचा पूरे गीले हो गए होंगे। साधना पूरी कर जब रूम पर पहुंचा तो देखता हुं मेरे कपड़े किसीने उठाकर रूम के दरवाजे पर रख दिए थे। निश्चित ही यह काम किसी सेवक ने ही किया होगा।

एक दिन हमारे “टीचर” ने साधना के बाद मुझे खास पास बुलाया और पूछा तुम्हारे पास रूम में कोई “किताब” है क्या? मैंने कहा “नहीं”। “कुछ डायरी,पेन?” मैंने “हां” कहा। उन्होंने कहा “उसे रिसेप्शन में जमा कर दो,” मैं कुछ बोल नहीं पाया। मालूम नहीं मेरे पास “डायरी” है और में कुछ लिखता हूं यह मैसेज “टीचर” तक कैसे पहुंची? शायद ये भी किसी सेवक का ही काम होगा। कारण मेरी डायरी गादी पर ही रखी होती, रूम को में ताला लगता नहीं था।

एक और किस्सा है… छटे दिन रात को जब सोने लगा तो “सीने” में बैचेनी होने लगी, कुछ अलग फील हो रहा था, छाती में झन झनाहट हो रही थी। रूम में अकेला, रात का समय,बाहर अंधेरा, उपर से बारिश। उठकर बैठा तो थोड़ा चक्कर जैसे फील हुआ, डर गया। मुझे लगा शायद यह हार्ट अटैक हो…शायद “अंत” करीब आ गय हो। ज्यादा न रुकते हुए रूम से बाहर निकल आया और “धम्म हाल” की और निकल पड़ा जहां टीचर, सेवक आदि की डेली मीटिंग चल रही थी।

मैंने उन्हें बीच में रोककर मेरी तकलीफ बताई। टीचर ने पूछा “बीपी है क्या”? “नहीं” मैंने कहा, और भी कुछ पूछा.. ठीकसे याद नहीं, उन्होंने एक सेवक को कहा शायद ये “विपश्यना” का “इंपैक्ट” है, उन्हें फलां फलां गोली दे दो। मीटिंग छोड़ दो “सेवक” मेरे साथ आते हैं। मैं उन्हें कहता हूं “मेरे समधी इस इस रूम में है, उन्हें साथ ले लेते हैं, यदि जरूरत पड़ी, कहां बाहर डॉक्टर के पास जाना पड़ा तो आसानी रहेगी…” तो वे उस बात को नजरंदाज कर देते हैं, “जरूरत नहीं” कहते है। वे मेरा “बीपी” चेक करते हैं, वो नॉर्मल निकलता है। वे चुसनेकी दो गोलियां देते है । गरम पानी भी भरकर देते है। कहते है सब ठीक है।

तब तक वहां जलगांव के सेवक मित्र “उदयजी” भी आ जाते हैं। वे भी कहते है ऐसा होता है अनेकों के साथ, यह अच्छा साइन है। वे मुझे रूम तक छोड़ने आते है।और आश्वस्त करते है “रात को कोई भी तकलीफ होती है तो मेरा यहां रूम है आवाज दे देना।” सोने की कोशिश करता हूं, कुछ समय बाद नींद आ जाती है। सुबह सब नॉर्मल फील होता है।

यहां सेवक “बोली भाषा”नहीं “देह भाषा” के सहारे ज्यादा काम करता है। देह भाषा केवल दो ही प्रकार की दिखती थी… एक “हाथ जोड़कर साधक को मार्गस्त करना”, दूसरी “झुकी गर्दन और चेहरे पर हंसी लाकर निर्देश देना।” बहुत ही जरूरी रहा तो ही “जबान” का इस्तेमाल करना।

वहां समज में आया..हाथ जोड़ते वक्त जुड़े हुए हाथ में “१०” अंगुलियों की ताकत ही नहीं ५ और ५.. “५५” की ताकत आ जाती है। सामने वाले को सुनना ही पड़ता था। और चेहरे की “मुस्कान” की ताकत दूसरे सब “भाव मुद्रा” से ज्यादा असरकारक सिद्ध होती है।

मुस्कराकर यदि कोई हमें निर्देश देता है तो उसे नजरंदाज करना , टालना संभव नहीं होता। ऊपर से किसीने हाथ जोड़कर, गर्दन झुकाकर निर्देश दिए तो फिर वो काम समझो होना ही है।

क्रमशः

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लाइफ is full ऑफ learnings।

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आनंद मल्हारा
१९_९_२१