“सांस” के साथ “रोमांस” करते “नानी” याद आ गई…

“सांस” के साथ “रोमांस” करते “नानी” याद आ गई…

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भाग_ ३
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इन दस दिनों में “शुद्ध धर्म” क्या होता है, “धर्म” का मतलब क्या है, थोड़ा समज आया। आ.गोयनकाजी ने समझाया.. धर्म माने मन को शुद्ध, निर्मल रखने की कला, राग द्वेष से परे रहने का मार्ग। धर्म के मार्ग पर चलना माने “मन” को “विकारों” से मुक्त करते जाना। कारण पहले “मन” में विकार जगता है, फिर वह “वाणी” से व्यक्त होता है और फिर वह “कृति” में आता है।

“मन” पर कैसे काबू पाए इसलिए यहां रोज करीब ७_८ घंटे साधना कराई जाती है। टाइमावली कुछ ऐसी होती है..सुबह ४.३० से ६.३० तक फिर ८.०० से ११.०० , दोपहर में १.०० से ४.३० तक , शाम को ६.०० से ७.३० और रात को ९.०० से ९.३० तक।

“साधना” में सबसे पहले दो दिन वे हमें आंखे बंद कर अपनी “सांस” को देखने कहते हैं। “सांस” कहां से आ रही है, कहां जा रही है देखने को कहते है। सांस पर से ध्यान भटका की फिर से सांस की और जाने को कहते है।

दो दिन बाद “सांस” नाक में या बाहर कहां स्पर्श कर रही है, ठंडी है, गर्म है, किस नासिका से आ रही है उसे महसूस करने के लिए कहते हैं।

बहुत मुश्किल होता है “सांस” को देखना, कॉन्सनट्रेट करना। उसके स्पर्श को महसूस करना और लगातार करते रहना। मिनिट हुआ नहीं कि हमारा ध्यान कहीं और भटक जाता है। फिर से उसे सांस पर लाया कि फिर मन में कोई नया विचार घर कर लेता है।

ये साधना करते करते कितनी नई कल्पनाएं, विचार मन में रुक रुक कर आते_ जाते रहते है। हमारे जीवन की जो तकलीफे है, नए विषय है सब “आंखे” बंद हुई की सामने आती रहती है। हां उस समस्या के हल भी सामने आते रहते हैं। कभी कभी तो सांस को देखते देखते नींद भी आ जाती।

पर लगातार साधना करते करते धीरे धीरे मेरा कासंट्रेशन बढ़ रहा था,”सांस” पर ध्यान देना बढ़ रहा था।

“सांस” को देखते देखते मुझे तो लगने लगा था असली “भगवान” तो अपनी “सांस” ही है। कितनी अनमोल है। वो है तो हम है। सचमेे “सांस” की “पूजा” होनी चाहिए, उसे खुश रखना चाहिए, उसे सलामत रखना चाहिए। उसकी सलामती के लिए हमें धर्म पालना होगा। क्योंकि वह सांस रूपी “भगवान” कर्म काण्ड, पूजा पाठ, व्रत, प्रसाद आदि से खुश होने वाला नहीं है। हां.. वो खुश होगा तो शायद हमारे निर्मल, राग द्वेष से परे सेवा भाव वाले व्यवहार से। हमारे पुरुषार्थ से।

“सांस” से ही एक “जोक” याद आ रहा है…करीब चार दिन की साधना के बाद जब मन थोड़ा स्थिर हो रहा था.. सुबह के एक ब्रेक के समय.. मैं बाहर आसमान की और देख रहा था। सुंदर आसमान अलग अलग कलर बिखेरे हुए था। उसकी सुंदरता देखी और वहां की आदत के मुताबिक आंखे बंद हो गई और मैंने जोर से सांस लेना शुरू किया और उसे महसूस करने की कोशिश की। जब आंखे खुली तो अचानक मन में एक रोमांटिक खयाल आया, और जोर से “हंसी” आ गई।

खयाल था…विपश्यना कर १२ दिन बाद मैं रात को बेड रूम में अपने बेड पर कुछ रोमांटिक गाने सुनते पैर फैला कर बैठा हूं और तभी वहां नया खरीदा हुआ “खास गाउन” पहनकर “मेमसाब” रूम में आकर सामने बैठ जाती है। हंसती है, मैं भी उन्हें उस स्पेशल गाऊन को देखता हूं.. हंसता हूं और अचानक आंखे बंद हो जाती है और मैं सांस को देखना शुरू कर देता हूं। और सांस को देखते देखते वहीं बेड पर ढूलक जाता हूं।

क्रमशः
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है ना “सांस” is भगवान!
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आनंद मल्हारा
१६_९_२१

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