“मेरे छाती में दर्द होता है, कल तकलीफ बढ़ गई तो आप ही संभालना।”

“मेरे छाती में दर्द होता है, कल तकलीफ बढ़ गई तो आप ही संभालना।”

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परसों रात बच्चों के साथ “गरबा” खेलने का प्रयास किया, थोड़ा सीखा, मज्जा आया, पर “पैर” ने जवाब दे दिये। थकान की वजह से सुबह “देरी” से नींद खुली। जब घड़ी देखी तो सुबह के 6.45 बज चुके थे। नीचे योगा चल रहा था या कहो करीब खत्म होने को था। वैसे रोज सुबह 7.15 तक योगा क्लास खत्म हो जाता है।

सोचने लगा… जाऊ या न जाऊ? 20_25 मिनट ही बाकी रहे है। लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे? मुजपर हंसेंगे।

फिर अचानक मेरे दिमाग में हमारी “कांता मैडम” (एक साधक) की याद आई।
जो कभी कभी क्लास में 7.00 बजे भी बेधड़क आ जाती। लेट आओ या जल्दी जब भी वे आती.. अक्सर उनकी गर्दन झुकी हुई ही होती। तो मालूम नहीं पड़ता उन्हें लेट आने में कोई संकोच होता भी है या नहीं।

पर मैं उस दिन “कांता मैडम” का नाम लेकर नीचे चालू क्लास में चला गया और नीचे जाकर सबसे कहा “नीचे आनेकी हिम्मत मुझे आज अपने “कांता मैडम” से मिली है।” सुनकर सभी साधक हंसने लग गए। कांता मैडम भी हंसने लग गई।

पर उस दिन “कांता मैडम” जल्दी आई थी। उस दिन उन्होंने बातों ही बातों में एक नया “राज” सबको बताया। वे लेट इसलिए होती थी कि उन्हें सुबह जल्दी उठकर घर की सारी जिम्मेदारियां पूरी करके क्लास आना होता था। काम पूरा करते करते वे लेट हो जाती। उनके मिस्टर को सोना ज्यादा पसंद है। वैसे सोना, सुबह नींद निकालना किस हसबैंड को पसंद नही होता?

तो उस दिन मैडम ने अपने मिस्टर से कह ही दिया “देखो, मेरे छाती में दर्द रहता है, और भी फला फला तकलीफ बढ़ गई है, डॉक्टर ने “योगा” रैगुलर करने को कहा है। बादमें मेरी तकलीफ बढ़ गई तो मुझे मत दोष देना, फिर आपको ही सब संभालना पड़ेगा।” यह सुनकर उनके “साब” डर गए, तपाक से उठ गए, अपने “डोगी” को घूमाने ले गए। और मैडम यहां योगा क्लास आ गई। अंत में कांता मैडम ने कहा “जब हसबंड सुनते नहीं है तो उन्हें झूठ बोलकर डराना पड़ता है, नहीं तो वे बीबी की सुनते ही नहीं।”

ये सुनकर सभी साधक हंसने लग गए। पर साथ में हम सभी के कान भी खड़े हो गए। सोचने लगे… कहीं ये हमारे साथ भी तो नहीं हो रहा ?…हमारे ही घर में ?

मैं खुद की और देखने लगा, मैं भी अक्सर १५२० मिनिट देर से ही पहुंचता क्लास में। कारण क्या तो नीचे जब १४ की आवाज आती तब नींद खुलती। उठकर फ्रेश होने टेरेस पर जाता… जहां ५७ मिनिट लग ही जाते। टेरेस पर कुछ सब्जियां लगाई है। फ्रेश होते होते सोचता चलो ऊपर आए ही हैं तो थोड़ा पानी पिला देते हैं पौधों को। पानी पिलाने लग जाता। पानी पिलाने में न दिमाग लगता, ना कुछ मेहनत। ५७ मिनिट और लेट हो जाता। फिर नीचे जाता तब तक करीब ३०% योगा हो चुका होता।

सोचता हुं.. दूसरे काम थे इसलिए लेट हुआ या योगा करने के आलस के कारण?

सच ही है…यदि हम अपने निर्धारित काम के प्रति कमिटेड नहीं होते हैं तब हम उसे न करने के, उसे टालने के अनेक बहाने ढूंढ लेते हैं और उससे खुद को जस्टिफाईड भी करते रहते हैं।

उधर “कांता मैडम” को देखो.. योगा करना था तो उन्होंने रास्ता ढूंढ ही लिया, हसबैंड से भी अच्छा झूठ बोला पर “योगा करने आ ही गई।


है ना लाइफ इज फनी n runs after easy ?


आनंद मल्हारा
15/10/2021