इस दिवाली में सब कुछ था, प्यार था मनुहार थी पर सोफा सेट पर “आरसीबा” (भाईसाब) की कमी थी।

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मैं अक्सर लक्ष्मीपूजा के दिन, लेट शाम भाईसाब को मिलने आर सी बाफना शोरूम पर जरूर जाता। पिछले १५ से भी ज्यादा सालों से ये सिलसिला बिना टूटे शुरू था। ज्यादातर साथमेँ तनय होता या फिर तन्वी। उन्हें भी साथ आने में मजा ही आता। पहला कारण था उन्हें रास्ते पर फूट रहे पटाखे देखने को मिलते। कितनी बार तो पटाखे गाडी के आगे या पीछे या गाड़ी के नीचे फूट जाते.. कारण हमारे घर से शोरूम के रास्ते में दो जगह स्लम एरिया लगता था जहां छोटे_बड़े बच्चे रास्ते पर ही पटाखे छोड़ा करते। और दूसरा कारण था उन्हें शोरूम अच्छा लगता, भाईसाब को मिलने के बाद वहां रखे अलग अलग वेरायटी के ड्राई फ्रूट्स टेस्ट करने में भी उन्हें मजा आता।

अबकी बार तन्वी थी साथमें। सामने बाइजी, पप्पू भाई, शशि भाभी, सिद्धार्थ बाबू, बहु विभूति और जैविक सभी थे। वही प्रेम था, वही अपनापन था, बेशक मनुहार ज्यादा थी। बात करते करते बाईजी के चेहरे पर कभी खुशी तो कभी अचानक गम छलकते दिखता। पर मुझे उन सबमें भाईसाब दिख रहे थे, फील हो रहे थे। बाईजी की अपनत्व भरी उपस्थिति ने भाई साब की कमी को बहुत हद तक कम कर दी थी। तन्वी की आंखे ड्राई फ्रूट में ग्रीन अंजीर को ढूंढ रही थी।

भाईसाब “गए” या वो “नहीं है” ऐसा में नहीं मानता। वो “है” ऐसाही लगता है शोरूम में आज भी। पर यदि मैं केवल स्वार्थी बन कर सोचूं तो “हां”, जिनसे मैं शोरूम बातें किया करता, जो मुझे व्यवसाय में चल रही बाते बताते, नई योजनाएं शेयर करते, जरूर मिस करता हूं। मुझे याद नहीं मैं कभी उनसे वक्त लेकर मिलने गया हो। उनका दरवाजा मेरे लिए हमेशा खुला रहता। छोटा सा भी काम होता तो फोन करके बुला लेते, कहते “मल्हाराजी मिलने आ जाओ।” याद नहीं उन्होंने मुझे कभी डांटा हो।

अक्सर कहते.. ग्राहक हम पर कितना भरोसा रखता है.. शुद्धता, स्टोन_ मोती ई का वजन,भाव वगेरे… हमें उनके विश्वास को और मजबूत करना है। वे दावे के साथ कहते हमारे यहां का हिसाब ग्राहकों के लिए सबसे फायदेमंद है।

जब भी मिलते तो पहले खैरियत पूछते, कैसा कामकाज चल रहा है यह पूछते। मैने कभी उनके मुंह से किसी की बुराई नहीं सुनी। हरदम वे परिवार जनों की, मित्रों की तारीफ किया करते। पप्पू भाई को वे बहुत मानते थे। वे कहते एक बेटा भी जितनी सेवा नहीं करता उतनी पप्पू मेरी करता है। ग्राहकों को भी अच्छा संभाल लेता है। कहते.. सिद्धार्थ होशियार है, जिद्दी है पर बहुत समजदार है।

भाईसाब का जोश, उनका जुनून तारीफे काबिल था। वे जब शाकाहार का प्रसार करने गांवों की स्कूलो में जाते तब एक बार मुझे साथ जाने का मौका मिला। मेरा नंबर कैसे लगा मालूम नहीं कारण तब मेरा भाईसाब से खास परिचय भी नही था। भाषण देना, बच्चों से प्रतिज्ञा करवाना उन्हें किताबे, गणवेश बांटना अलग ही धुन थी उनकी। बादमें करुणा क्लब के कार्य में भी खुदको वैसेही झोंक दिया था। बच्चो को शाकाहार का महत्व, और हम इंसान जन्मजात शाकाहारी क्यों है बहुत मस्त उदाहरण दे दे कर समझाते। चिड़िया और कौवे की कहानी तो जैसे उनकी सबसे पसंदीदा कहानी थी।

और वही उत्साह, कामके प्रति लगन उनके अंतिम दिनों में भी मुझे देखने को मिला। कोरोना काल में वे उपर घर में ही रहते। पर वहां भी स्वस्थ नहीं बैठते, उनका लिखने का कार्य शुरू रहा। अच्छे सुविचारों का संकलन वे करते रहे। मुझे बता रहे थे “अभी मेरे पास दो साल का लिखने का कार्य पेंडिंग पड़ा है।”

भाईसाब जहां कहीं भी होंगे मस्त होंगे जरूर हसेंगे, सबको हसाएंगे।

धन्यवाद भाईसाब.. आपने मुझे अपने अंतिम समय तक आपके काम आने का मौका दिया। मैं कृतज्ञ हूं।


लाइफ इज सही में ब्यूटीफुल!


आनंद मल्हारा
१६/११/२१