गंगटोक भाग ३
हम गंगटोक से दार्जिलिंग और दार्जिलिंग से गंगटोक की पहाड़ियों को टैक्सी में बैठे बैठे निहारते _निहारते घूम रहे थे। उधर तन्वी एन एस डी के इंटरव्यू की प्रोसेस में सुबह से रात तक व्यस्त थी। उन्हें लगातार तीन दिन अलग अलग विषय, अलग अलग प्रोजेक्ट ग्रुप में पूरा करना होता था। पहला दिन उसका ठीक ठीक गया पर बादमें उसे उसमें मजा आने लगा।
जब वह चयन प्रक्रिया पूरी करके होटल पहुंची तब खुश थी। वहां के किस्से बता रही थी। पर कह रही थी.. “पापा, वहां एडमिशन होने के चांसेज न के बराबर है। हम 85 बच्चों में से ओपन कैटेगरी के केवल 4 बच्चे सिलेक्ट होने हैं। यहां आए 80 के 80 बच्चे जबरदस्त था, हर एक स्टूडेंट ड्रामा, एक्टिंग फील्ड से जुड़ा था, अनुभवी था। मैं अलग थी, फ्रेशर थी। पर पापा तीन दिन का अच्छा “वर्क शॉप” हो गया, अच्छी ट्रेनिंग मिल गई, Thank you पापा।”
दूसरे दिन हमारा बैक टू जलगांव का सफर शुरू होता है। ठंड से गरम क्षेत्र में जानेकी प्रोसेस शुरू होती है। गंगटोक से बारडोगरा फिर बारडोगरा से दिल्ली और फिर दिल्ली से मुंबई। साथका लगेज बारडोगरा में ही चेक इन कर लिया था। जो हमें मुंबई में मिलने वाला था।
दिल्ली उतरे और कनेक्टेड फ्लाइट के लिए फिर से सिक्योरिटी चेक करते समय मालूम पड़ा की तन्वी का टिकट कहीं गीर गया है। हाथों में ज्यादा सामान और फैशन वाले कपड़े के चक्कर में टिकट प्लेन में या उतरते वक्त या गाड़ी में कहीं तो गिर गया था। अब क्या करें ? सिक्योरिटी वाले को पूछा। उसने “गो एयर” काउंटर पर पूछने को कहा। “गो एयर” वाले ने कहा “ऑन लाइन बोर्डिंग पास” है क्या? हमें कनेक्टेड फ्लाइट का बोर्डिंग पास मोबाइल में मिला नहीं पर उसने जब अटैचमेंट चेक करने को कहा तब समझ में आया की वो वहां था।
अब वैसे भी ऑन लाइन चेक इन करना बोर्डिंग पास डाउन लोड करना जरूरी हो गया है। वो काम यदि हम खुद ही करते है तो सबसे अच्छा।
आराम से रात 9.00 बजे मुंबई पहुंच गए। लगेज 2 no के बेल्ट पर आएगा ऐसा बताया गया। हम वहां पहुंचे। तन्वी का मोबाइल डिस्चार्ज होने को था। उसे चार्जिंग को लगाया। दोनों को फ्रेश होने जाना था तो तन्वी ने मुझे मोबाइल के पास खड़ा रहने को कहा “रखवाली” करने, नया नया खरीदा एप्पल जो था।
फ्रेश होकर वे दोनों अपने लगेज को बेल्ट पर ढूंढने लगे। जस्ट लगेज आने शुरू हुए थे। हमारे कुल तीन बैग थे। करीब 5 मिनिट के बाद हमारी “लाल बैग” आती हुई दिखी। उसीके पीछे “काली बैग” भी आ रही थी। मैडम तन्वी को बोली “चलो दो बैग साथ में आ गई पर ऐसा बहुत कम बार होता है। लाल बैग के हैंडल पर रिबन बांधी थी, ताकि आसानी से उसे पहचाना जा सके। दोनों बैग उठा ली। कुछ देर में तीसरी तन्वी की बैग भी आ गई। उधर मोबाइल भी चार्ज हो गया। और हम बाहर के लिए “प्रस्थान” करने लगे।
हमें जाना था “थाना रेल्वे स्टेशन” और तन्वी को थाना की उसकी “फ्रेंड” के घर। Ola टैक्सी बुक कर रहे थे। सोचा स्टेशन पर हम उतर जायेंगे और तन्वी वहां से ऑटो कर फ्रेंड के यहां चली जायेगी। दो लोकेशन कैसे साथ बुक करते हैं आइडिया नहीं थी।
टैक्सी में ठिकसे समान रखा, और करीब 15 मिनिट में बांद्रा के “कला नगर” तक पहुंचे थे। कला नगर जहां मैंने मेरे “कॉलेज” के दिन बिताए थे। तभी मेरे मोबाइल की रिंग बजती है… फोन लेता हूं तो एक लेडी ऑफिसर की कड़क आवाज आती है। कहती है “गो एयर से बोल रही हुं, क्या आप आनंद मल्हारा हो?” “हां” मैं कहता हूं। “अभी आप कहां हो” वो फिर से पूछती है। “बांद्रा में है और थाना जा रहे हैं।” वो कहती है “आप ने किसी दूसरे पैसेंजर की बैग ले ली है, प्लीज चेक करें।” हम कहते हैं “नहीं भाई, हमें क्या जरूरत पड़ी दूसरे की बैग उठाने की।” “नहीं सर, सुनिए.. आपकी एक “काली बैग” यहीं बेल्ट पर पड़ी है और एक पैसेंजर की काली बैग “मिसिंग” है। यह सुनकर हम चौंक जाते हैं, गाड़ी रोकते हैं और देखते हैं “काली बैग” जो हमने साथ ली थी सचमुच वो हमारी नहीं थी, बिल्कुल हमारी बैग की नकल थी, पर थोड़ी “नई” थी।
उस “काली बैग” को बेल्ट से उठाया, उसे “ट्रॉली” में रखा, करीब 20_25मिनिट वो हम तीनों के सामने थी। फीरभी हम उसे पहचान नहीं पाए। उसे अपनीही समझी। जबकि “काली बैग” पर भी “रिबन” बांधी थी। आजकल वैसे हर बैग को कुछ न कुछ बंधा मिलता है। हमने क्या बांधा है यह हमें भी याद नहीं रहता।
“गो एयर” की मैडम कहती है “आप इनसे बात कर लीजिए जिनकी बैग आप ले गए हैं और मैटर सेटल कर लीजिए। हम तुम्हें पिछले 25 मिनिट से ट्राई कर रहे हैं, जो नंबर से आपका बुकिंग हुआ वो नंबर कोई उठा नहीं रहा था। फिर कोई निखिल व्यक्ति का फोन आया और उनसे तुम्हारा नंबर मिला।”
सही था, टिकट हमारे ऑफिस के “निखिल” ने बुक किए थे, उसने उसके नंबर डाल कर रखे थे। “गो एयर” वाले “बैग” और उसपर लगे “टैग” से वहां तक ही पहुंच सके। नसीब “निखिल” ने फिर से फोन किया “मिस्ड कॉल” पर नहीं तो वो “बैग” हमारे साथ “जलगांव” तक पहुंच जाती और हमारी बैग “मुंबई” में हवा खाती।
टैक्सी ड्राइवर समझदार था। वह कहता है सर हम फिर से एयर पोर्ट चलते हैं, वही सबसे आसान तरीका है बैग एक्सचेंज करने का। Ola में ट्रैवल करते करते “नया डेस्टिनेशन” कैसे “एड” करना वो हमें बताता है।
जिनकी बैग हम ले आए थे वे “मराठी” थे, लोअर परेल के निवासी थे। बात होती है। हम कहते हैं हम फिर से आते है एयर पोर्ट पर आपकी बैग देने कृपया आप एयर पोर्ट के बाहर आ जाओ, टैक्सी स्टैंड के पास ताकि वक्त बचेगा और हम समय पर स्टेशन पहुंच पाएंगे। सॉरी भी कहते हैं।
वे कहते हैं “नहीं, हम गेट के बाहर नहीं आयेंगे, पहले बैग चेक करेंगे फिर उसे एक्सचेंज।” शायद सिक्योरिटी वालों ने उन्हें ऐसे केस में क्या क्या गलत हो सकता है, बताया होगा।
हम उन्हें समझाते है, मराठी में बातें होती है, तन्वी उनसे बात करती है, समझती है। उन्हें जब यकीन होता है कि ये महज एक असावधानी से हुई गलती है तब वे टैक्सी स्टैंड तक आते है। वे बताते हैं लाल टी शर्ट पहना है मैंने। हम दोनों एक दूसरे को पहचान लेते है। बैग एक्सचेंज होती है। वे भी परिवार के साथ ही थे। शायद गंगटोक से ही आ रहे थे।
फिर से टैक्सी थाना की और दौड़ने लगती है। रात 11.50 कि ट्रैन थी। 10.50 बज चुके थे। ड्राइवर को कहते हैं भाई थोड़ी “भगा गड्डी” नहीं तो रुकना पड़ेगा “मुंबई” में एक और दिन। जैसे तैसे स्टेशन पहुंचते है, कुछ समय में ट्रेन आती है, हम हमारी सीट पर बैठते हैं । हम दोनों दो लंबी सांस लेते हैं , उपर वाले को शुक्रिया कहते हैं और एक दूसरे को देख हंसते हैं।
ट्रैन में कोई झगड़ा नहीं, कोई आरोप प्रत्यारोप नहीं कारण बैग मेरे हाथ से नहीं बदली गई थी।
समाप्त।
है ना.. life is full of Thrill n Learning even when We make some silly Mistakes’.
आनंद मल्हारा
26th dec 2021


