“मर महीना”और “मंगल कार्य”

“मर महीना”
और “मंगल कार्य”

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कुछ दिनों पहले आर सी बाफना शोरूम में “सिद्धार्थ भाई” के पास बैठा था, व्यापार की बात निकली, कह रहे थे “ठीक है, पर “मर महीने” के हिसाब से अच्छा है। पर इसे मानने वाले लोग बहुत ज्यादा हैं। लोग या तो इस महीने के पहले या बादमें सोना खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं।

तब मुझे ३५ साल पुरानी बात याद आ गई…मुझे मेरी शादी याद आ गया। लड़की वालों ने शादी का मुहूर्त निकाला था, तारीख निकली थी 22 जनवरी। “हां” भी हो गई। शायद सामने वालों ने पत्रिका भी छपवा ली थी। तब क्या मालूम मेरे दिल ने कहा.. शादी किसी खास दिन होनी चाहिए। On the eve of new year याद आ गया। शादी किसी और दिन नहीं “31 दिसंबर की रात 12 बजे” नए साल में ही करेंगे पक्का कर लिया।

“31 दिसंबर” इस दिन के लिए मन पर मुंबई के “कॉलेज लाइफ” का गहरा इंपैक्ट था। स्कूल लाइफ में तो “नया साल, happy new year” क्या होता है मालूम ही नहीं था। पर कॉलेज के दिनों मुंबई में 31 दिसंबर की रात का काफी बोलबाला था। हम अक्सर दोस्तों के साथ “गेट वे ऑफ इंडिया” पटाखों की आतिश बाजी देखने जाते थे। तब VT स्टेशन के बाहर रास्तों पर अच्छी खासी गर्दी हुआ करती थी। एक दो बार “जुहू चौपाटी” भी new year का स्वागत करने रात को गए थे। नए साल के स्वागत में मुंबई शहर में बहुत से कार्यक्रम का आयोजन हुआ करता था, कहीं डांस पार्टी, कहीं ऑर्केस्ट्रा तो कहां नाटक। होटल्स भी फूल होती, वहां भी खाने के साथ कुछ एक्स्ट्रा एंटरटेनमेंट हुआ करता था।

खैर, मैंने पिताजी को तारीख के बारेमें कहा, पिताजी ने कोई आपत्ती नहीं जताई। वैसे मेरे पिताजी मुहरत में विश्वास नहीं करते थे। वे हर दिन को जीने वालों में से थे। समधी भी पिताजी के खास दोस्त। उपरसे दोनों “ओशो” के अनुयायी। फिर क्या घर में थोड़ी बातें हुई पर तारीख बदल गई, शादी pre pone हो गई। शादी के लिए “31दिसंबर, रात 12 बजे का दिन और समय फाइनल हो गया।

यहां तक तो सब आसानी से हो गया, समस्या शुरू हुई जब ससुरजीने उनके परिचीत “पंडितजी” को मिले और तारीख बताई। पंडितजी ने साफ मना कर दिया। उन्होंने ससुरजी को साफ कहा “माड़साब, मर महीना में कोई ब्याव करे की ? मु तो यो ब्याव नी लगाई सकूं। यो पाप नी कर सकूं।

“अब क्या करें? छोटा गांव था, वहां पंडितजी भी गिने चुने ही थे। आखिर में समधिजी को एक पंडित मिल ही गया। शादी हो गई। शादी के कुछ दिन बाद मुझे मालूम पड़ा… “जिसने शादी लगाई वे पंडित नहीं थे, वे एक ब्राम्हण थे। उन्होंने पहले शायद ही कोई शादी लगाई हो। मुझे आज भी याद है.. वो श्लोक पुस्तिका में से पढ़ पढ़ कर बोल रहे थे। और पास बैठे बच्चे हंस रहे थे।

पर शादी रचाने अच्छे पंडितजी क्यों नहीं मिले.. इसके पीछे एक गहरा कारण था, हमारे गांव में ऐसी मान्यता थी कि जो पंडित “मर महीने” में शादी लगाता है वो या तो “परलोक” सिधार जाता है या “नरक में” जाता है। अब बोलो ऐसी मान्यता होने के बाद कौनसा पंडित शादी लगाएगा?

उपर से हम दोनों की “कुंडली” भी नहीं मिलाई गई थी। पर हमारे पिताजी ने समधिजी को अर्थात दोनों दोस्तों ने एक दूसरे को “एक शब्द” दिया था। इधर हम पिताजी के पांच लड़के थे और उधर समधिजी की तीन बेटियां। पिताजी ने उन्हें कहा था “सोहन, चिंता मत करो, तुम्हारी एक लड़की हम लेंगे। याने हमारी तो कुंडली वैसेभी बुजुर्गो द्वारा जुड़ी हुई ही थी। टेंशन की बात नहीं थी।

शादी हो गई। लाइफ की गाड़ी भी सही चल रही थी। और शायद छह महीने बाद ससुर जी का बीबी को फोन आता है और वे कहते हैं “नल्लू…अपने परिचित वो पंडितजी थे न.. वो “शांत” हो गए। “लीवर कैंसर” था उन्हें, बहुत बुरा हुआ। एक बात बोलूं… उन्होंने तुम्हारी शादी नहीं लगाई यह ठीक ही हुआ। नहीं तो हो सकता था कुछ लोग मुझे दोषी ठहराते या कहते “मर महीने” में “ब्याह” रचाते हो तो ये तो होना ही था।

असल में जिसने शादी लगाई वो ब्राम्हण मस्त जी रहा था और जिसने शादी लगाने मना किया वे पंडितजी परलोक सिधार गये। है ना अजीब मजेदार बात।

पर कुंडली, मुहूरत पर आज भी लोगों का उतनाही विश्वास है जितना पहले होता था या कहो वो और बढ़ ही रहा है। जितना जमाना मॉडर्न होता जा रहा है शायद उतना ही डर भी बढ़ रहा है, श्रद्धा, अंध श्रद्धा बढ़ रही है।

मेरे ही घर का एक और किस्सा, मेरी बड़ी बेटी की के लिए लड़का देखा, पसंद किया, एक ही प्रोफेशन के थे। कुंडली को बाजुमें रखा, सगाई हुई। एक महीने बाद सामने वालों के यहां से फोन आता है और कहते हैं ” एक नाजुक बात कहना चाहते हैं… हमने दोनों की कुंडली पंडितजी को बताई… पंडितजी ने जो कहा सुनकर हमारी नींद उड़ गई है.. वे कह रहे थे यह विवाह “अशुभ” होगा… अब क्या करें? मैंने शांति से बात सुनी और कहा “यदि ऐसा मन में आ ही गया है तो “ठीक है”, कुछ बिगड़ा नहीं है, हम अलग हो जाते हैं। सगाई ब्रेक कर देते हैं और हम अलग हो गए।

यदि हम गौर देते हैं इन सब किस्सों पर तो एक बात सामने आती है.. मैं और केवल मैं। हम हमारी खुशी के लिए, हमारे फायदे के लिए आसान, shortcut रास्ते ढूंढते रहते हैं। कभी खुद के स्वार्थ के लिए हम गलत काम भी कर लेते हैं, कभी खुशी मिलाने हम लोगों की सेवा करते हैं। कभी इच्छा पूरी होने भगवान को दक्षिणा भी दे देते हैं। और कभी खुद को सही सलामत रखने अपनों की लाश को भी दूर से अलविदा कर देते हैं। स्वार्थ अक्सर दुःख का कारण बनता है, पर कभी कभी यही स्वार्थ खुशी मिलाने का जरिया भी बनता है।


है ना लाइफ इज selfish लेकिन ब्यूटीफुल !


आनंद मल्हारा
16 जनवरी 22, जलगांव