मेरी सुंदर बैनी और वोसाला रोड छाप रोमियो।

मेरी सुंदर बैनी और वो
साला रोड छाप रोमियो।

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कल हम घर आ रहे थे, घर के दरवाजे के करीब पहुंचे तो देखा वही “रोडछाप रोमियो” फिर से घर के बाहर खड़ा था और दरवाजे की गैप में से अंदर झांक रहा था। “बैनी” को अपनीआवाज में बुला रहा था। यह देख मेरा गुस्सा दिमाग के उपर निकल गया और मैंने चढ़ा दी मेरी “नैनो कार” उस रोमियो पर। उसके जोर से चीखने की आवाज आई। लगा शायद उसका पैर गाड़ी के नीचे आ गया। गाड़ी के अंदर बैठी तन्नू और मेमसाब की सांस रुक गई। उन्हें कल्पना नहीं थी अचानक मुझे ये क्या हो गया। तन्नू बोल उठी “पापा आपने ये क्या कर दिया? ऐसा भी कोई करता है भला?”

मैंने कहा “कुछ नहीं हुआ है…भाग गया साला, देख वो “रोमियो” कैसे भाग रहा है?” उसे भरोसा नहीं हुआ तो वो डरते डरते गाड़ी के नीचे उतरी और झुक कर गाड़ी के नीचे देखा। कुछ नहीं दिखा तब दोनों शांत हुए, लंबी सांस ली और गेट खोल घर में चल पड़े।

मैं भी उनके पीछे पीछे घर की सीढ़ियां चढ़ने लगा। सीढ़ियों के साथ मेरा गुस्सा भी थोड़ा थोड़ा कम होता गया। मैंने उस हादसे को फिर से याद किया तो अंदर की “इंसानियत” ने मुझे झंजोड कर रख दिया।

मुझे पूछने लगा “आनंद बड़ी बड़ी बाते करते हो, आदर्श की बातें सिखाते हो, लव मैरिज, इंटरकास्ट मैरिज के पुरस्कर्ता बनते हो, पर असल में हो उसके विपरीत, खुद पर बीती तो सब आदर्श भूल गए। आखिर में तूने तेरी बंगले में रहने वाली सुंदर गोरी बैनी को गरीब रोमियो से, रोड छाप कृष्ण वर्णीय रोमियो से मिलने नहीं दिया। तुने बिलकुल वैसे ही किया जैसे अक्सर लैला मजनूं, हीर रांझा, रोमियो जूलियट में एक खलनायक करता है।”

मुझे भी मेरी असलियत का या कहो मेरे अहंकार का अहसास होने लगा। सोचने लगा… क्या गलती है उस रोमियो की? वह बैनी को चाहता है, रोज घर के बाहर उसका इंतजार करते रहता है। दिन रात कुछ नहीं देखता। कितनी बार हमने उसे भगाया, उसे अलग अलग यातनाएं दी फिर भी वो सर झुका के आ ही जाता।
उधर बैनी भी उसके लिए बैचेन, उसे मिलने बेकरार। दरवाजा खुला मिला कि भागी नीचे। बैनी है ही भोली.. ना उसे दुनियादारी की समझ, ना अपने स्टेटस की, ना ही उसे अपने जात पात का पता।

और घर में हम सब नहीं चाहते थे की वो किसी रोड छाप रोमियो के चक्कर में आए जिसके खानदान का पता ना हो, ना घर का। हम चाहते थे उसके लिए एक ऐसा संबंध जो उसीकी हम उम्र का हो, कोई अच्छे घर में पला बढ़ा हो, ऊंची बिरादरी का हो। हमने कोशिश भी की थी एक बार। एक अच्छा बराबरी वाला रिश्ता लाया था उसके लिए, पर योग बने नहीं। दोनों की बनी नहीं। वो बात करने की कोशिश करता तो “बैनी” मुंह फेर लेती। बेचारा अंत में निराश होकर चला गया। फिर हमने भी कोशिश नहीं की। सोचा रहने दो इसे अकेली मस्त। ना रिलेशनशिप की झंझट न बच्चों की परेशानी।

सच में हम कितने हिप्पोक्रेटिक होते हैं। हम कितनी भी बड़ी बड़ी बाते करें, कितने भी महंगे कपड़े पहने, गाड़ी में घूमें पर सोच तो वही दकियानूसी वाली ही रहेगी। दो प्यार करने वालों को आसानी से एक नहीं होने देते। दोनों एक दूसरे को कितना प्यार करते हैं यह नहीं देखते ,यही सोचते है की वो अपनी बिरादरी का , स्टेटस का है या नहीं।

क्रमशः


है ना प्यार करना कितना मुश्किल?
But लाइफ इस ब्यूटीफुल।


आनंद मल्हारा
7 फरवरी 2022, जलगांव